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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 474, कुल 530 में से

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पृष्ठ 474

८४ आत्मतत्त्वविवेके
ऽपि सहकार्यसन्निधेर्न कुर्यान्न जानीयात्। तत्र प्रथममिष्यते,
कार्यस्य कालदेशनियमोपलम्भात्।
द्वितीयस्तु सम्भवेदपि यदि कार्यमस्य ज्ञानं स्यात्, न च
तत्तथा। कथमिति चेत्, शरीरापाये तदाश्रितानामिन्द्रियादीना-
मपायात्।
न चान्वयव्यतिरेकसिद्धहेतुभावस्याभावेऽपि हेत्वन्तरात्
कार्यजन्म, निर्हेतुकत्वप्रसङ्गात्। न चाहेतुकं कार्यं नाम।
जातिनियत होती है। इसलिये एक आत्मामें सब कार्यके करने या
जाननेमें भले ही व्यभिचार हो, फिर भी लाघववश आत्मत्वरूपसे ही
कार्यमात्रको करने या जाननेमें आत्माको योग्य माना जाता है। अकेले
करने या जाननेमें समर्थ होता हुआ भी सहकारीका सन्निधान नहीं होने-
के कारण ही नहीं करेगा और नहीं जानेगा। यहाँ ईश्वरके सम्बन्धमें
पहली बात तो मानते हैं, क्योंकि किसी कार्यकी उत्पत्तिमें काल और
देशका नियम देखा जाता है। अर्थात् कोई भी कार्य किसी नियत
काल देश (स्थान) में ही उत्पन्न होता है। अतः जबतक वह समय
और स्थान नहीं प्राप्त होगा तबतक समर्थ होता हुआ भी ईश्वर उस
कार्यको नहीं करेगा।
द्वितीय बात तो संभव भी होती यदि ईश्वरीय ज्ञान कार्य (जन्य)
होता। अर्थात् जन्यज्ञान ही सहकारीके असन्निधानमें नहीं हो सकेगा।
ईश्वरीयज्ञान तो जन्य है नहीं किन्तु नित्य है। यदि पूछो कि-ईश्वर-
का ज्ञान जन्य क्यों नहीं है? तो इसलिये कि शरीरके नहीं होनेसे
शरीराश्रित इन्द्रियोंका ईश्वरमें अभाव है और ज्ञान उत्पन्न होनेके हेतु
इन्द्रियाँ ही हैं।
और यह भी नहीं हो सकता है कि-जिनकी (इन्द्रियोंकी) हेतुता
अन्वय व्यतिरेकसे सिद्ध है, उनके अभावमें भी अन्य हेतुसे कार्यकी
(ज्ञानकी) उत्पत्ति हो जाय--क्योंकि अन्वय व्यतिरेकसे सिद्ध हेतुके
अभावमें भी कार्यकी उत्पत्ति होनेपर वह ज्ञानादि कार्य निर्हेतुक हो
जायगा। जब कि संसारमें कोई भी कार्य अहेतुक (बिना हेतुका)