आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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अस्तु तावदसौ सर्वज्ञः कर्ता, वक्ता तुकथमिति चेत्,
न, बचनशक्तौ सत्यां परार्थैकतानत्वात् । यो हिताहितविभागं
विद्वान्, परार्थाभिप्रायः सन्(स)स्थानकरणपाटवे सत्यविदुषेऽ-
वश्यमुपदिशेत्, यथा अन्धाय दक्षिणेन याहि वामेन मा गाः
इति पृथग्जनोऽपि, तथा भगवानिति ।
स्थानकरणपाटवमसिद्धं देहाभावात्, तेषां ताल्वादिविवृ-
त्तादिरूपत्वात् । न च तदन्तरेण वर्णनिष्पत्तिः, तदुत्पत्ते-
रवधारणात् ।
न च तत्कारणान्यनधितिष्ठतः तत्कर्तृत्वमीश्वरस्यापीति
होनेवाला विषयविशेषका प्रतिबन्ध (नियम) भी हट जाता है।
इसप्रकार ईश्वरकी सर्वज्ञता स्वतः सिद्ध हो जाती है।
ईश्वरमे वेदवक्तृत्वसिद्धि
यदि कहो कि—जगत्का कर्त्ता सर्वज्ञ भले ही हो, किन्तु वेदका
वक्ता वह कैसे है?—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि ईश्वरमें बचन
की शक्ति है तथा वह परार्थमें ही सदा निरत है, इसलिये वह वेदका
उपदेश करता है। क्योंकि जो हित और अहितके विभागको जानता
है, तथा जिसके कण्ठ-तालु आदि स्थान एव संवृत-विवृत आदि प्रयत्न
ठीक हैं, वह परोपकारके अभिप्रायसे अज्ञानी व्यक्तिको अवश्य ही
उपदेश देगा। जैसे, किसी अन्धे व्यक्तिको "दाहिनेसे जावो बायेंसे
मत जावो" ऐसा पामर जन भी उपदेश देता है। इसीप्रकार भगवान्
भी अज्ञानी जनके लिये उपदेश करता है।
यदि कहो कि—ईश्वरको देह नहीं होनेसे उसमें स्थान और प्रयत्न
की पटुता असिद्ध है। क्योंकि तालु आदिक ही स्थान है और उसका
विवृत आदि होना ही प्रयत्न है, जो ईश्वरमें नहीं है। एव, स्थान-
प्रयत्नके अभावमें ककारादिवर्णोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है। क्योंकि
वर्णोत्पत्ति और तालु आदि स्थानोंमे कार्यकारणभावका निश्चय है।
वर्णोत्पत्तिके कारणभूत ताल्वादिका अधिष्ठाता हुए विना वर्णोंका कर्त्तृ...