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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 530 में से

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पृष्ठ 475

अनुपलम्भवादः ४२५
ततः सिद्धैवास्य ज्ञानचिकीर्षाप्रयत्नशक्तिर्यद्गोचरा तज्जातीय-
समस्तगोचरेति सार्वज्ञ्यसिद्धिः ।
शरीरापाय एव कथमिति चेत् , दृश्यस्य प्रत्यक्षबाधित-
तत्त्वात् , अदृश्यस्यापि सावयवतया मूर्ततया च निबिडतर-
पाषाणमध्यवर्त्तिनि भेकादौ¹ कार्ये कर्त्तव्ये नाभग्नस्य प्रवेशः ।
न च परमाणुरूपं तच्छरीरम् , अनन्तरालत्वेन निर्मनस्कतया
इन्द्रियाश्रयत्वानुपपत्तेः । न च बहिर्वृत्ति मनो ज्ञानजननोप-
योगि, शरीरवैयर्थ्यप्रसङ्गात् ।
नहीं होता । इसलिये ईश्वरकी ज्ञानशक्ति, चिकीर्षाशक्ति और
प्रयत्नशक्ति स्वतः सिद्ध अर्थात् नित्य ही है । तथा वह ज्ञानादिशक्ति
यद्विषयक होती है, वह उस जातिकी समस्त वस्तुओंको विषय करती
है । इस प्रकार ईश्वरमे सर्वज्ञताकी सिद्धि हो जाती है ।
यदि पूछो कि—ईश्वरको शरीराभाव ही क्यों है ?—तो इसलिये कि
ईश्वरमें दृश्य शरीरका होना प्रत्यक्षप्रमाणसे बाधित है । यदि अदृश्य
शरीर हो तो उस शरीरके सावयव और मूर्त होनेके कारण अत्यन्त
सघन पत्थरके भीतर रहनेवाले मेंढक आदिको पैदा करनेके
ईश्वरका वह अदृश्य शरीर भग्न हुए बिना पत्थरमें प्रविष्ट नहीं हो
सकेगा । यह भी नहीं कह सकते कि—परमाणुरूप वह शरीर है,
इसलिये पत्थरमें प्रवेशके लिये उसके भङ्गका प्रसङ्ग नहीं आता—क्योंकि
परमाणुरूप शरीरके निश्छिद्र होनेके कारण उसमें मन नहीं रह सकेगा
तथा शरीरका इन्द्रियाश्रयत्वरूप लक्षण उसमें नहीं मिल सकेगा । यह
भी नहीं हो सकता कि—शरीरके अन्दर बिना रहे ही बाहर ही रहता
हुआ मन ज्ञानादिकार्य करने मे उपयोगी होगा—क्योंकि उस स्थितिमें
शरीरका मानना ही व्यर्थ हो जायगा । अर्थात् शरीरकी यही उपयोगिता
है कि मन आदि इन्द्रिया उसमें रहती हुईं कार्य उत्पन्न कर सकें ।
अतः शरीरके बाहर मनका रहना माना जाय तो शरीर मानना व्यर्थ
होगा ।
१. भेकशरीरादौ इति १ पु० पा०