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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

ऽभावत्वात् अतदाक्षेपकत्वाच्च । न हि मातृत्वस्य वन्ध्यात्ववत्
नित्यत्वस्याभावो ज्ञानत्वम्, अचेतनानामपि चेतनत्वप्रसङ्गात् ।
नापि नित्यत्वं ज्ञानत्वाभावमाक्षिपेत्, ज्ञानत्वेनाविरोधात्,
विरोधमूलस्य विपक्षे बाधकस्याभावात्, दर्शनादर्शनयोश्चार्थप्रव-
भावरूप है और न तो नित्यत्वाभावका आक्षेपक (उपस्थापक) है।
ऐसे ही नित्यत्व भी न तो ज्ञानत्वाभावरूप है और न तो ज्ञानत्वाभावका
आक्षेपक ही है। क्योंकि जिस प्रकार मातृत्व वन्ध्यात्वका अभावरूप
है, उस प्रकार ज्ञानत्व नित्यत्वका अभावरूप नहीं है। क्योंकि यदि वैसा
हो तो अचेतन वस्तु भी यदि अनित्य हो जैसे घटपटादि, तो उसमें
चेतनत्व (ज्ञानाधिकरणत्व) का प्रसङ्ग हो जायगा। क्योंकि चेतन
होनेके लिये अपेक्षित जो नित्यत्वाभाव, वह उसमें है।
एवं, नित्यत्व ज्ञानत्वाभावको या ज्ञानत्व नित्यत्वाभावको आक्षिप्त
भी नहीं कर सकता। क्योंकि न तो नित्यत्वको ज्ञानत्वके साथ विरोध
है और न ज्ञानत्वको नित्यत्वके साथ। कारण, विरोधका मूल है विपक्ष-
में बाधक होना, जिसका यहाँ अभाव है। अर्थात् "ज्ञान अनित्य ही
होता है, यह तुम्हारा पक्ष है। किन्तु "नित्य भी हो और ज्ञान भी हो"
इस विपक्षमें कोई बाधक नहीं होनेसे ज्ञानत्व और नित्यत्वमें कोई
विरोध नहीं है।
यह कहना कि—जो जो ज्ञान होता है, वह सब अनित्य ही देखा
जाता है तथा जो नित्य आकाशादि है, वह ज्ञानात्मक भी नहीं देखा
जाता, इसलिये ज्ञान होना और नित्य होना परस्पर विरोधी है—तो
इसप्रकारका दर्शन और अदर्शन अर्थप्रवणत्व और अर्थाप्रवणत्वरूप
उपाधिसे प्रयुक्त है। अर्थात् नित्य हो या अनित्य हो, जो सीधे अर्थ
(विषय) से सम्बद्ध है वह ज्ञान है, और जो सीधे विषयसे सम्बद्ध
नहीं है, वह ज्ञान नहीं है, जैसे इच्छा आदि। क्योंकि इच्छा
सीधे विषयसे सम्बद्ध न होकर ज्ञानके माध्यमसे ही विषयसम्बद्ध
होती है। इसीलिये यद्विषयक ज्ञान होता है, तद्विषयक ही इच्छा
होती है।
उक्त उपाधि उसी प्रकार है, जैसे रूपत्व और अनित्यत्वके सम्बन्ध-

४२० आत्मतत्त्वविवेके

णत्वाप्रवणत्वोपाधिग्रस्तत्वात्, रूपत्वानित्यत्वयोश्चक्षुर्मात्रग्राह्य-
व्यक्तिस्थवत् ।
न चेन्द्रियादिविकारो ज्ञानत्वाभिव्यक्तिहेतुः, अर्थप्रवण-
व्यक्तिमात्रस्यैव तन्निरपेक्षस्य तथाभावात् । एतदनपेक्षस्य तस्या-
तिप्रसञ्जकत्वादिति ।
अथ क्षुद्रोपद्रवाः—केवलस्य कर्तृत्वे विश्वस्य वैश्वरूप्य-
व्याघातः, सततोत्पत्तिप्रसङ्गश्च । अदृष्टापेक्षायां कल्पनागौरवम्,
मे चक्षुर्मात्रग्राह्यत्व उपाधि है । अर्थात् अनित्य होनेके कारण रूपत्व-
का व्यवहार नहीं होता किन्तु चक्षुर्मात्रग्राह्य होनेके कारण ही रूपत्वका
व्यवहार होता है । क्योंकि यदि अनित्य ही रूप हो तो नित्य होनेके
कारण जलपरमाणुका रूप भी असिद्ध हो जायगा । अतः चक्षुर्मात्रग्राह्य
जो रूपत्वजाति, उससे युक्त होनेके कारण ही जलीयपरमाणुका भी
रूप सिद्ध होता है । उसीप्रकार ज्ञानके बारेमे जानना चाहिये ।
और यह कहना कि—इन्द्रियादिविकार ही ज्ञानत्वकी अभिव्यक्ति-
का हेतु है—ठीक नहीं है। क्योंकि इन्द्रियादिविकारोंसे निरपेक्ष अर्थ-
प्रवणतामात्र ( साक्षात् विषयसम्बन्धमात्र ) ही ज्ञानत्वाभिव्यक्तिका
हेतु है। इसके विपरीत यदि अर्थप्रवणतासे निरपेक्ष इन्द्रियादिविकारों-
को ही ज्ञानत्वका अभिव्यञ्जक माना जाय तो सुखादिमें अतिव्याप्ति हो
जायगी । अर्थात् सुख भी मनरूप इन्द्रियसे सम्बद्ध है, अतः वह भी
ज्ञान कहलाने लगेगा । मेरे मतानुसार तो अर्थप्रवणताका अभाव होने
से ही सुखादिमें ज्ञानत्वकी प्रसक्ति नहीं हो सकेगी ।
ईश्वरसम्बन्धी कुछ क्षुद्र शङ्काओंका समाधान
इसके बाद ईश्वरसम्बन्धी कुछ क्षुद्र उपद्रवोंका वर्णन एव उनका
समाधान किया जा रहा है । जैसे, केवल ईश्वरको कर्त्ता माननेपर
सृष्टिमें विचित्रता नहीं हो सकेगी तथा ईश्वरके नित्य होनेसे प्रत्येक
वस्तुकी सदा उत्पत्ति होने लगेगी । अर्थात् ससारकी सब वस्तु एक जाति-
की हो जायगी तथा वस्तुओंकी उत्पत्तिमें कोई क्रम नहीं रह सकेगा ।
यदि उक्त दोषोंके परिहारके लिये कारणके रूपमें अदृष्टकी भी अपेक्षा

अनुपलम्भवादः ४२१

तत एव तदुत्पत्तेः । स्वार्थं प्रवृत्तावनीश्वरत्वप्रसङ्गः । परार्थ-
प्रवृत्तावदुःखमयसर्गप्रसङ्गः । एवमेव प्रवृत्तावचैतन्यम् । एकत्वे
प्रमाणाभावः । अनेकत्वे त्वमार्वज्ञ्यम्, प्रतिनियतसामग्रीविज्ञ-
त्वादित्येवमादयः ।
तत्र कारणचक्रस्यैकमुपादाय शेषवैयर्थ्यप्रमञ्जने सर्ववैयर्थ्य-
प्रसङ्गः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां सिद्धकारणभावस्य न वैयर्थ्य-
मिति चेत्, अनुमितकारणभावस्याप्येवम् , प्रमाणसिद्धत्वाविशेषात् ।
की जाय तो ईश्वरकी कल्पना करनेमें गौरव दोष है । क्योंकि उस अदृष्ट-
से ही सृष्टिकी उत्पत्ति मान लेनेमें लाघव है । एवं सृष्टि करनेमें ईश्वर-
का अपना कोई प्रयोजन हो तो अपूर्ण होनेके कारण उसका ईश्वरत्व ही
नहीं रह जायगा । अर्थात् वह हम लोगोंके समान संसारी हो जायगा ।
यदि दूसरे दूसरोंकी प्रयोजनसिद्धिके लिये सृष्टिमें ईश्वरकी प्रवृत्ति
हो तो उसे दुःखमय सृष्टि नहीं करनी चाहिये । किन्तु परहितकी
दृष्टिसे सबको सुखी ही उत्पन्न करना चाहिये । यदि अपने या
दूसरोंके किसी प्रयोजनके बिना ही सृष्टिमें उसकी प्रवृत्ति हो तो वह
जड़ या उन्मत्त हो जायगा । एवं उस ईश्वरके एक होनेमें कोई प्रमाण
नहीं है । अर्थात् ईश्वरको सिद्ध करनेवाले प्रमाण उसके एकत्व
को नहीं बताते हैं । अतः यदि ईश्वर अनेक हो तो सबके सब पृथक्
पृथक् नियत सामग्रीके ज्ञाता होनेके कारण असर्वज्ञ हो जायेंगे । अर्थात्
पृथिवीका निर्माता ईश्वर केवल पृथिवीके ही उपादानोंका ज्ञाता होगा
और अङ्कुरका निर्माता केवल अङ्कुरके ही उपादानोंका ज्ञाता होगा ।
इस प्रकार सभी ईश्वर अल्पज्ञ हो जायेंगे ।
यहाँ यदि कारणसमूहके अन्तर्गत किसी एक कारणको लेकर शेष-
कारणको व्यर्थ कहा जाय तो उसी न्यायसे सभी कारणोंमें वैयर्थ्यका प्रसङ्ग
हो जायगा । अर्थात् अदृष्टको लेकर ईश्वरमे वैयर्थ्यका आपादन यदि
उक्त प्रकारसे किया जाय तो कारणको लेकर कर्ममें और कर्मको लेकर
करणमें तथा इसीप्रकारसे और और कारकोंमें भी वैयर्थ्यका प्रसङ्ग हो
जायगा ।

यच्च यदनुगुणत्वेन कल्पितं तस्य तेनैव विफलीकरणे सर्वत्रादृष्ट-
मुपादाय दृष्टवैफल्यप्रसङ्गः । तथा च तदपि न स्यात्, प्रमाणा-
भावात् । दृष्टेन ह्यदृष्टमुन्नीयते ।
परार्थे च प्रवृत्तिः स्वार्थाभावात् । न च दुःखसृष्ट्या
कारुण्यापवादः, जनकाध्यापकचिकित्सकादिषु व्यभिचारात् ।
अथ दौर्जन्यादेव किं नैवमिति चेत् , न, दोषाभावात् ,
यदि कहो कि—प्रत्यक्ष अन्वय और व्यतिरेकद्वारा जिसमे कारणत्व
सिद्ध है, उसमे वैयर्थ्यका प्रसङ्ग नहीं होगा—तो अनुमानसे जिसमे
(ईश्वरमे) कारणता सिद्ध है, उसमे भी इसीप्रकार वैयर्थ्य नहीं
होगा। क्योंकि दोनोंमे समानरूपसे कारणता सिद्ध है । एव, जो
जिसके उपजीव्यके रूपमें कल्पित होता है, वह यदि उसीके द्वारा
व्यर्थ कर दिया जाय तो सर्वत्र अदृष्टको लेकर दृष्टकारणोंमें वैफल्यका
प्रसङ्ग हो जायगा । अन्तत वह अदृष्ट भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि
उसे सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण नहीं है । कारण, दृष्टसे ही तो
अदृष्टकी कल्पना की जाती है । तात्पर्य यह है कि अदृष्ट का अधिष्ठाता-
रूपमे ही ईश्वर सिद्ध होता है । अतः उसीके द्वारा ईश्वरको अन्यथा-
सिद्ध नहीं किया जा सकता है । क्योंकि ऐसा करनेपर उपजीव्य-
विरोध होता है । अदृष्टका अधिष्ठाता होनेके कारण ईश्वर अदृष्टका
उपजीव्य है ।
एव, सृष्टिमे ईश्वरकी प्रवृत्ति परार्थ होती है । क्योंकि पूर्णकाम
होनेसे उसे अपना कोई स्वार्थ नहीं है । यहाँ यह नहीं कह सकते कि-
दुःखमय सृष्टि करनेके कारण ईश्वरमें कारुण्यका अभाव हो गया-क्योंकि
पिता, अध्यापक और चिकित्सकमे उक्त कथनका व्यभिचार देखा जाता
है । अर्थात् पिता आदि अपने पुत्र, शिष्य और रोगीके हितके लिये
उनमें ताडनादिद्वारा दुःख उत्पन्न करते ही हैं, फिर भी उनमें कारुण्यका
अभाव कोई नहीं मानता है ।
यदि कहो कि—कुटिलतावश ही ईश्वरद्वारा दुःखमय सृष्टिका किया
जाना क्यों न माना जाय—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि कुटिलता
का कारण रागद्वेषात्मक दोष है और ईश्वरमें उस दोषका अभाव है।

अनुपलम्भवादः ४२३

तदभावश्च मोहाभावात, तदभावोऽपि सर्वज्ञत्वादिति ।
एकद्व्यणुककारी च१ परमाणुमदृष्टमुपकार्यत्र्यणुकादिभोग-
पर्यन्तं द्रव्यादिषट्कं च जानाति नूनमित्यविवादम्, एषामुपादा-
नादिरूपत्वात् ।
अवच्छेद्यावच्छेदकभावापरिज्ञानेन घोपादानादिपरिज्ञानानु-
पपत्तेः । यश्च यज्जातीयमेकं कर्तुं ज्ञातुं वा समर्थः स तज्जातीयं
सर्वमेवेति नियमः, सामर्थ्यस्य जातिनियतत्वात् । केवलं समर्थो-
तथा दोषका अभाव भी उसमें इसलिए है कि उसमें मोह ( अज्ञानता )
का अभाव है । और मोहका अभाव भी उसके सर्वज्ञ होनेके कारण
है । अर्थात् सर्वज्ञ ईश्वरमें अज्ञानता आ कैसे सकती है ?
एवं, एक द्व्यणुक बनानेवाला ईश्वर परमाणु, अदृष्ट तथा द्व्यणुक-
से किये जानेवाले त्र्यणुकादि-वस्तुओंके भोगपर्यन्त द्रव्य, गुण, कर्म,
सामान्य, विशेष और समवायरूप छहों पदार्थोंको निश्चित ही जानता है,
यह निर्विवाद है । जैसे, कुम्भकार कपाल चक्रादिसे लेकर बनाये जाने
वाले घटके उपभोगतककी सम्पूर्ण प्रक्रियासे अवगत रहता है । यहाँ
द्व्यणुकरूप कार्यके प्रति परमाणु उपादानरूप है और अदृष्टादिक
निमित्त रूप हैं । अर्थात् उपादान-निमित्तादिके ज्ञानके बिना कोई
कर्ता हो ही नहीं सकता हैं ।
षट् पदार्थांन्तर्गत सामान्य ( जाति ) का भी ज्ञान इसलिये रहता है
कि व्यक्ति और जातिके पारस्परिक अवच्छेद्यावच्छेदकभावका ज्ञान हुए
बिना “अमुकका उपादान या निमित्त कारण अमुक है” इसका भी परि-
ज्ञान असंभव है । अर्थात् किसी कार्यको करनेवालेके लिये अनुगतरूप
( जाति ) से अवच्छिन्न (युक्त) कार्य-कारणका ज्ञान आवश्यक है । इस
प्रकार कार्यतावच्छेदक और कारणतावच्छेदकरूपमें सामान्य ( जाति )
का भी ज्ञान रहता है । एवं, जो कर्ता जिस जातिके एक कार्यको करने-
में या जाननेमे समर्थ रहता है, वह उस जातिके समस्त कार्यको ही
करने या जाननेमें समर्थ रहता है, यह नियम है । कर्तृगत सामर्थ्य भी
१. मु इति १ पु० पा०

८४ आत्मतत्त्वविवेके
ऽपि सहकार्यसन्निधेर्न कुर्यान्न जानीयात्। तत्र प्रथममिष्यते,
कार्यस्य कालदेशनियमोपलम्भात्।
द्वितीयस्तु सम्भवेदपि यदि कार्यमस्य ज्ञानं स्यात्, न च
तत्तथा। कथमिति चेत्, शरीरापाये तदाश्रितानामिन्द्रियादीना-
मपायात्।
न चान्वयव्यतिरेकसिद्धहेतुभावस्याभावेऽपि हेत्वन्तरात्
कार्यजन्म, निर्हेतुकत्वप्रसङ्गात्। न चाहेतुकं कार्यं नाम।
जातिनियत होती है। इसलिये एक आत्मामें सब कार्यके करने या
जाननेमें भले ही व्यभिचार हो, फिर भी लाघववश आत्मत्वरूपसे ही
कार्यमात्रको करने या जाननेमें आत्माको योग्य माना जाता है। अकेले
करने या जाननेमें समर्थ होता हुआ भी सहकारीका सन्निधान नहीं होने-
के कारण ही नहीं करेगा और नहीं जानेगा। यहाँ ईश्वरके सम्बन्धमें
पहली बात तो मानते हैं, क्योंकि किसी कार्यकी उत्पत्तिमें काल और
देशका नियम देखा जाता है। अर्थात् कोई भी कार्य किसी नियत
काल देश (स्थान) में ही उत्पन्न होता है। अतः जबतक वह समय
और स्थान नहीं प्राप्त होगा तबतक समर्थ होता हुआ भी ईश्वर उस
कार्यको नहीं करेगा।
द्वितीय बात तो संभव भी होती यदि ईश्वरीय ज्ञान कार्य (जन्य)
होता। अर्थात् जन्यज्ञान ही सहकारीके असन्निधानमें नहीं हो सकेगा।
ईश्वरीयज्ञान तो जन्य है नहीं किन्तु नित्य है। यदि पूछो कि-ईश्वर-
का ज्ञान जन्य क्यों नहीं है? तो इसलिये कि शरीरके नहीं होनेसे
शरीराश्रित इन्द्रियोंका ईश्वरमें अभाव है और ज्ञान उत्पन्न होनेके हेतु
इन्द्रियाँ ही हैं।
और यह भी नहीं हो सकता है कि-जिनकी (इन्द्रियोंकी) हेतुता
अन्वय व्यतिरेकसे सिद्ध है, उनके अभावमें भी अन्य हेतुसे कार्यकी
(ज्ञानकी) उत्पत्ति हो जाय--क्योंकि अन्वय व्यतिरेकसे सिद्ध हेतुके
अभावमें भी कार्यकी उत्पत्ति होनेपर वह ज्ञानादि कार्य निर्हेतुक हो
जायगा। जब कि संसारमें कोई भी कार्य अहेतुक (बिना हेतुका)

अनुपलम्भवादः ४२५
ततः सिद्धैवास्य ज्ञानचिकीर्षाप्रयत्नशक्तिर्यद्गोचरा तज्जातीय-
समस्तगोचरेति सार्वज्ञ्यसिद्धिः ।
शरीरापाय एव कथमिति चेत् , दृश्यस्य प्रत्यक्षबाधित-
तत्त्वात् , अदृश्यस्यापि सावयवतया मूर्ततया च निबिडतर-
पाषाणमध्यवर्त्तिनि भेकादौ¹ कार्ये कर्त्तव्ये नाभग्नस्य प्रवेशः ।
न च परमाणुरूपं तच्छरीरम् , अनन्तरालत्वेन निर्मनस्कतया
इन्द्रियाश्रयत्वानुपपत्तेः । न च बहिर्वृत्ति मनो ज्ञानजननोप-
योगि, शरीरवैयर्थ्यप्रसङ्गात् ।
नहीं होता । इसलिये ईश्वरकी ज्ञानशक्ति, चिकीर्षाशक्ति और
प्रयत्नशक्ति स्वतः सिद्ध अर्थात् नित्य ही है । तथा वह ज्ञानादिशक्ति
यद्विषयक होती है, वह उस जातिकी समस्त वस्तुओंको विषय करती
है । इस प्रकार ईश्वरमे सर्वज्ञताकी सिद्धि हो जाती है ।
यदि पूछो कि—ईश्वरको शरीराभाव ही क्यों है ?—तो इसलिये कि
ईश्वरमें दृश्य शरीरका होना प्रत्यक्षप्रमाणसे बाधित है । यदि अदृश्य
शरीर हो तो उस शरीरके सावयव और मूर्त होनेके कारण अत्यन्त
सघन पत्थरके भीतर रहनेवाले मेंढक आदिको पैदा करनेके
ईश्वरका वह अदृश्य शरीर भग्न हुए बिना पत्थरमें प्रविष्ट नहीं हो
सकेगा । यह भी नहीं कह सकते कि—परमाणुरूप वह शरीर है,
इसलिये पत्थरमें प्रवेशके लिये उसके भङ्गका प्रसङ्ग नहीं आता—क्योंकि
परमाणुरूप शरीरके निश्छिद्र होनेके कारण उसमें मन नहीं रह सकेगा
तथा शरीरका इन्द्रियाश्रयत्वरूप लक्षण उसमें नहीं मिल सकेगा । यह
भी नहीं हो सकता कि—शरीरके अन्दर बिना रहे ही बाहर ही रहता
हुआ मन ज्ञानादिकार्य करने मे उपयोगी होगा—क्योंकि उस स्थितिमें
शरीरका मानना ही व्यर्थ हो जायगा । अर्थात् शरीरकी यही उपयोगिता
है कि मन आदि इन्द्रिया उसमें रहती हुईं कार्य उत्पन्न कर सकें ।
अतः शरीरके बाहर मनका रहना माना जाय तो शरीर मानना व्यर्थ
होगा ।
१. भेकशरीरादौ इति १ पु० पा०

४२६ आत्मतत्त्वविवेके
न च दविष्ठ एव सूर्यादिस्तत् कुर्यादिति साम्प्रतम्,
कारकानधिष्ठानात्, शरीरस्य तदायतनतया प्रयत्नस्याव्या-
पकत्वात् । तथापि व्यापकत्वे त्वसमवायिकारणानुरोधेना-
कारणकतया तदेव नित्यत्वम् ।
न चोद्देशमात्रसम्बन्धेन क्रियाहेतुत्वम्, अस्मदादिप्रयत्न-
स्यापि तथाभावप्रसङ्गात् ।
यह भी नहीं कह सकते कि—ईश्वरीय-शरीरको पाषाणाभ्यन्तर
प्रवेशकी आवश्यकता नहीं है किन्तु अतिदूरवर्ती सूर्यादि शरीरसे ही
वह पाषाण मध्यवर्ती मेढक आदिको उत्पन्न करेगा—क्योंकि तब वह
मेढकको उत्पन्न करनेवाले कारकोंका अधिष्ठाता नहीं हो सकेगा।
अर्थात् उनमें व्यापारका आधान नहीं कर सकेगा। क्योंकि उन कारकों
का स्थान वह मेढक शरीर है, तथा ईश्वरीय प्रयत्नका स्थान दूरवर्ती
सूर्यादिका शरीर होनेसे ईश्वरीय प्रयत्न अव्यापक है। अर्थात् मेढक-
शरीरको उत्पन्न करनेवाले कारकों तक ईश्वरीय प्रयत्नके नहीं पहुँच
सकनेके कारण सूर्यादिशरीरगत ईश्वरीय प्रयत्नसे पाषाणान्तर्गत कारकों
में व्यापार नहीं हो सकेगा तथा व्यापारके अभावमें पाषाणके भीतर
मेढकशरीरकी उत्पत्ति नहीं हो सकेगी।
तथापि यदि ईश्वरीय प्रयत्नको व्यापक मानो अर्थात् सूर्यपदसे
नित्य एव व्यापक प्रयत्नोंसे युक्त ईश्वर ही लो—तो व्यापक होनेके कारण
उस ईश्वरीय प्रयत्नके प्रति कोई (द्रव्यसंयोग) असमवायिकारण
अपेक्षित नहीं होगा। अतः असमवायिकारणके अभावमें सर्वथा कारण
रहित होनेके कारण ही ईश्वरका प्रयत्नादि नित्य सिद्ध हो जाता है।
ऐसा नहीं हो सकता कि—सूर्यादिरूप ईश्वरीय शरीरके दूरवर्ती
होनेपर भी केवल इच्छाका विषय होनेके कारण ही अव्यापक भी
ईश्वरीय प्रयत्न पाषाणान्तर्गत मेढकको उत्पन्न करनेवाले कारकोंमें क्रिया
उत्पन्न कर देगा—क्योंकि यदि ऐसा हो तो हमारा भी प्रयत्न इच्छामात्र
से दूरवर्ती कारकोंमे क्रिया उत्पन्न करने लगेगा। अर्थात् इच्छामात्रसे
दूरवर्ती कुम्भकार भी चक्रादि चलाकर घट उत्पन्न करने लग जायेगा,
जो प्रत्यक्षबाधित है।

अनुपलब्धवादः ४२७

न च संयुक्तसंयोगादधिष्ठानम् , साक्षादधिष्ठानस्य विव-
क्षितत्वात् । विपापनोदादौ कथमिति¹ चेत्, न, तत्रास्मदादे-
र्ज्ञानमात्रं प्रति यत्नस्याविरोधात् । विपापनोदादौ तु तत्रत्यो
यत्नः क्रियाहेतुरिति ।
सर्गादौ तु न शरीरगन्धोऽपीति सर्वथा कलेवरविगमाद-
कारणतया बुद्धेः सर्वज्ञत्वमनिवायं विश्वेषां कर्तुरेकस्येति ।
“संयुक्त-संयोगसे भी ईश्वर पाषाणान्तर्गत भेकको उत्पन्न करनेवाले
कारकोंका अधिष्ठाता नहीं हो सकता। अर्थात् सूर्यादिरूप ईश्वरीय-
शरीरसे संयुक्त आकाश है तथा उस आकाशसे सयुक्त भेकजनक
कारकचक्र होगा, इसप्रकार परम्परा ईश्वर उन कारकोंका अधिष्ठाता हो
जायगा” यह भी नहीं हो सकता। क्योंकि वस्तुको उत्पन्न करनेके
लिये कारकोंका साक्षात् अधिष्ठाता होना ही अपेक्षित है न कि
परम्परा। यदि पूछो कि—विषादिको हटानेमें गारुडिक दूरसे ही कैसे
अधिष्ठाता हो जाता है?—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि वहाँ
गरुडदेवताके ज्ञानमात्रके प्रति दूरवर्ती हमारे प्रयत्नके कारण होनेमें
कोई विरोध नहीं हैं। अर्थात् वहाँ गारुडिकद्वारा किये गये मन्त्र-
पाठादिसे गरुडदेवताको सर्पद्वारा काटे गये व्यक्तिका ज्ञान हो जाता
है और वह व्यक्ति जी जाता है। अतः दूरवर्ती प्रयत्नसे दूरवर्तीको
ज्ञान होनेमें कोई विरोध नहीं है। किन्तु विष उतरनेका जहाँ तक
प्रश्न है, वहाँ तो मन्त्रादिपाठके सहकारी अथवा मन्त्रादिपाठसे अदृष्ट-
के सहकारी किसी अन्यका अर्थात् ईश्वरका ही प्रयत्न, जो विषावतरण
स्थलमे ही है, विषके उतरनेका हेतु है।
किन्तु सृष्टिके पूर्वमे तो सूर्यादिशरीरकी गन्ध भी नहीं हे कि ईश्वर
उसकेद्वारा भी अधिष्ठाता होकर सृष्टि कर सकेगा। इसलिये सर्वथा
ही शरीररहित होनेके कारण ईश्वरीयज्ञान किसी हेतुसे उत्पन्न हुआ
नहीं सिद्ध होता, अतः विश्वके कर्ता ईश्वरका सर्वज्ञ होना अनिवार्य है।
अर्थात् ईश्वर विना शरीरके ही अधिष्ठाता है, यह बात सिद्ध हो जाती
है। तथा उसमें ज्ञानका कारण शरीर नहीं होनेसे शरीरके अधीन
१ 'शरीरस्य दूरस्थत्वादिति भावः' इति कलिकातामुद्रिते टिप्पणी ।

४२८ आत्मतत्त्वविवेके
अस्तु तावदसौ सर्वज्ञः कर्ता, वक्ता तुकथमिति चेत्,
न, बचनशक्तौ सत्यां परार्थैकतानत्वात् । यो हिताहितविभागं
विद्वान्, परार्थाभिप्रायः सन्(स)स्थानकरणपाटवे सत्यविदुषेऽ-
वश्यमुपदिशेत्, यथा अन्धाय दक्षिणेन याहि वामेन मा गाः
इति पृथग्जनोऽपि, तथा भगवानिति ।
स्थानकरणपाटवमसिद्धं देहाभावात्, तेषां ताल्वादिविवृ-
त्तादिरूपत्वात् । न च तदन्तरेण वर्णनिष्पत्तिः, तदुत्पत्ते-
रवधारणात् ।
न च तत्कारणान्यनधितिष्ठतः तत्कर्तृत्वमीश्वरस्यापीति
होनेवाला विषयविशेषका प्रतिबन्ध (नियम) भी हट जाता है।
इसप्रकार ईश्वरकी सर्वज्ञता स्वतः सिद्ध हो जाती है।
ईश्वरमे वेदवक्तृत्वसिद्धि
यदि कहो कि—जगत्‌का कर्त्ता सर्वज्ञ भले ही हो, किन्तु वेदका
वक्ता वह कैसे है?—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि ईश्वरमें बचन
की शक्ति है तथा वह परार्थमें ही सदा निरत है, इसलिये वह वेदका
उपदेश करता है। क्योंकि जो हित और अहितके विभागको जानता
है, तथा जिसके कण्ठ-तालु आदि स्थान एव संवृत-विवृत आदि प्रयत्न
ठीक हैं, वह परोपकारके अभिप्रायसे अज्ञानी व्यक्तिको अवश्य ही
उपदेश देगा। जैसे, किसी अन्धे व्यक्तिको "दाहिनेसे जावो बायेंसे
मत जावो" ऐसा पामर जन भी उपदेश देता है। इसीप्रकार भगवान्
भी अज्ञानी जनके लिये उपदेश करता है।
यदि कहो कि—ईश्वरको देह नहीं होनेसे उसमें स्थान और प्रयत्न
की पटुता असिद्ध है। क्योंकि तालु आदिक ही स्थान है और उसका
विवृत आदि होना ही प्रयत्न है, जो ईश्वरमें नहीं है। एव, स्थान-
प्रयत्नके अभावमें ककारादिवर्णोंकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है। क्योंकि
वर्णोत्पत्ति और तालु आदि स्थानोंमे कार्यकारणभावका निश्चय है।
वर्णोत्पत्तिके कारणभूत ताल्वादिका अधिष्ठाता हुए विना वर्णोंका कर्त्तृ...

अनुपलब्धवादः ४२९

चेत्, न, यस्य कार्यस्य यत् कारणमन्वयव्यतिरेकसिद्धं तत्का-
रणाधिष्ठानयोः स्थूलसिद्ध्यर्थं तदवयवपरम्पराकारणाधिष्ठान-
वदवश्यम्भावनियमात् । न च सर्वत्र कार्ये कायः कारणमिति
प्रागुपेक्षितः । पितृत्वाद् वोपदेशानुमानम् ।
तथापि कतम आगमस्तेन प्रणीत इति चेत्, वेदायूर्वेदा-
दिरित्यरिकरिकर्णज्वरः सिंहनादः । तथाहि, न तावदयमा-
युर्वेदोऽप्रमाणम्, संवादस्य प्रामिकत्वात् । विसंवादस्य
काकतालीयतया कर्तृकर्मसाधनवैगुण्यहेतुकत्वात् । पुनस्तत्-
साद्गुण्ये तत एव फलसिद्धेः । न च निर्मूलस्तथा भवितु-
भी ईश्वर नहीं हो सकता है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि जिस
कार्यका जो कारण अन्वय व्यतिरेक द्वारा सिद्ध है, उस कारणकी तथा
उसके अधिष्ठाताकी सत्ता वैसे ही अनिवार्य है, जैसे स्थूल अवयवीकी
सिद्धिके लिये उसके अवयवधारारूप कारण एवं उसके अधिष्ठाताकी
सत्ता अनिवार्यरूपसे सिद्ध होती है । किन्तु सभी कार्यके प्रति शरीर
कारण नहीं होता, इसीलिये पूर्वमें द्व्यणुकादि उत्पन्न करनेमे अथवा
अङ्कुरादि उत्पन्न करनेमे ईश्वरको शरीरका होना अस्वीकार कर दिया
गया है । अथवा जगत्का पिता होनेके कारण लौकिक पिताके समान
जीवरूप पुत्रके प्रति ईश्वरीय उपदेशके रूपमे वेदका अनुमान करते हैं ।
क्योंकि जो पिता होता है, वह अपने पुत्रको हिताहितका उपदेश करता
ही है, यह व्याप्ति है ।
फिर यदि पूछो कि—ईश्वरने कौनसा आगम बनाया ?—तो “वह
वेद-आयुर्वेद आदिक ही आगम है, जिसका ईश्वरने प्रणयन किया”
ऐसा शत्रुरूपी हाथीको कर्णज्वर उत्पन्न कर देनेवाला हमारा सिंहनाद है ।
कारण, यह आयुर्वेद अप्रमाण नहीं है । क्योंकि आयुर्वेदकी सफल
प्रवृत्तिजनकता प्रायः देखी जाती है । अर्थात् आयुर्वेदका प्रयोग प्रायः
निष्फल नहीं होता । यदि कहीं उसकी निष्फलता देखी भी जाती है,
तो वह काकतालीय है तथा कर्ता, कर्म एवं साधनके वैगुण्यके कारण
है । पुनः जब ही कर्ता, कर्म एवं साधनमें साद्गुण्य (गुणवत्ता या

४३२ आत्मतत्त्वविवेके
कोऽतिशयः ? सर्वदर्शनान्तःपातित्वम् । कस्तैः परि-
ग्रहः ? तदर्थानुष्ठानं, स्वीकृतव्यवहारव्याकरणादिपालनी-
यत्व, स्वीकृतप्रामाण्यायुर्वेदादिस्वीकृतार्थत्वं च ।
( प्रश्न )—अतिशय क्या है ?
( उत्तर )—सभी दर्शनोंके अन्तःपाती होना अतिशय है । अर्थात्
न्याय मीमांसा प्रभृति जितने भी दर्शन हैं, उनमें प्रतिपादित
स्वर्गापवर्गादि मुख्य विषयोंको स्वीकार करनेवाले जन ही
अतिशय को प्राप्त हुए महाजन हैं। अथवा न्याय आदि
दर्शनोंका ज्ञान ही अतिशय है । सौगतादि दर्शनाभास
हैं न कि दर्शन हैं, अतः उनका ज्ञान अतिशय नहीं है।
( प्रश्न )—अतिशयको प्राप्त न्यायादिके ज्ञाता बहुत जनोंद्वारा किया
जानवाला परिग्रह क्या वस्तु है ?
( उत्तर )—निषेक प्रभृति वैदिक अर्थोंका उन सभीकेद्वारा अनुष्ठान
किया जाता है, इसलिये वेद महाजन परिगृहीत हुए ।
बौद्धादि आगमोंमें प्रतिपादित मण्डलीकरण केशोल्लुञ्चन
प्रभृति अर्थोंका अनुष्ठान उन महाजनोंद्वारा नहीं होता है,
अतः वे आगम महाजन परिगृहीत नहीं हुए । इसीलिये
महाजन परिगृहीतत्वहेतुसे वेदको सर्वज्ञ प्रणीत सिद्ध
करनेमें बौद्ध आगमोंको लेकर व्यभिचारदोष नहीं
आयेगा । और न उन आगमोंका सर्वज्ञ प्रणीत होना
सिद्ध होगा । परिग्रहका यह एक अर्थ है ।
परिग्रहका दूसरा अर्थ यह है कि जिन पाणि-यादि प्रणीत
व्याकरणोंका प्रामाण्य सभी मानते हैं उन व्याकरणोंद्वारा
हमारे वेदके विशेष विशेष पदोंका व्युत्पादन किया गया
है । इसलिये भी हमारे वेद महाजनपरिगृहीत हुए ।
इसप्रकार पाणि-यादि व्याकरणद्वारा तुम्हारे आगमके
विशेषपदोंका साधन नहीं किया गया है, इसलिये भी वे
महाजन परिगृहीत नहीं हैं ।
एव, जिस आयुर्वेदशास्त्रका प्रामाण्य सभीने स्वीकार किया है, उस

तथाहि, नास्त्येव तद्दर्शनं यत्र सांप्रतमित्युक्त्वापि गर्भा-
धानाद्यन्त्येष्टिपर्यन्तां वैदिकीं क्रियां जनो नानुतिष्ठति, स्पृश्या-
स्पृश्यादिविभागं वा नानुमनुते, व्यतिक्रमे चाऽऽचमनादि-
प्रायश्चित्तं वा नानुतिष्ठति ।
न सर्वत्र सर्वो जन एवमिति चेत्, मा भूत । न हि सर्वै
रोगिभिरायुर्वेदार्थो नानुष्ठीयत इति न तस्य महाजनपरिग्रहः,
अपि तु सर्वदर्शनान्तःपातिभिरित्येव ।
आयुर्वेदशास्त्रने भी वेदोक्त विषयोंका विधान किया है । जैसे, "शत-
कृत्वो गायत्रीमभ्यस्य नीरुग् भवति" ऐसा आयुर्वेदशास्त्रमें लिखा है।
तथा वह गायत्री वेदका ही अंश है न कि बौद्ध आगमोंका । यह
परिग्रहका तीसरा अर्थ है ।
उक्त तीनों प्रकारके परिग्रहोंमें महाजनोंद्वारा वेदार्थानुष्ठानरूप
प्रथम परिग्रह इस प्रकार है—जैसे, ऐसा कोई भी दर्शन नहीं है,
जिसको माननेवाला व्यक्ति वैदिक क्रियाका अनुष्ठान न करता हो ।
यहाँ तक कि ब्रह्मातिरिक्त सब विषयको अविद्याकल्पित कहनेवाले
वेदान्ती जन भी गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टि तक वैदिक क्रियाओंको नहीं
करते हैं, ऐसी बात नहीं है । या कोई भी दार्शनिक जन वेदोक्त
स्पृश्यास्पृश्यविभागको न स्वीकार करता हो अथवा अस्पृश्यस्पर्शरूप
व्यतिक्रम हो जानेपर आचमन-स्नान आदि प्रायश्चित्त न करता हो,
यह बात नहीं है ।
यदि कहो कि—सभी दर्शनोंके सभी व्यक्ति तो वैदिक क्रियाओंका
अनुष्ठान नहीं करते हैं—तो ऐसा भले ही मत हो । क्योंकि सभी रोगी
दवाका सेवन नहीं करते इससे वह शास्त्र महाजनपरिगृहीत नहीं है,
ऐसा नहीं हो जाता । किन्तु महाजनपरिगृहीत इतने ही से हो जाता
है कि सभी दर्शनोंके अधिकांश लोग वेदोक्त अर्थोंका अनुष्ठान करते
हैं । "फिर भी सभी वैदिक विधानोंका अनुष्ठान तो वे लोग भी नहीं
करते" यदि ऐसा कहो तो, भले ही वैसा न हो, उससे कोई क्षति नहीं
२८

४३० आत्मतत्त्वविवेके
मर्हति, अतिप्रसङ्गात् ।
न चान्वयव्यतिरेकभावोऽस्य मूलम्, आवापोद्वापेन
योगानामानन्त्यादर्वाचीनेनाशक्यत्वात् । विषादौ तथाकरणे
बहुतरानर्थप्रसङ्गात् । कः प्रेक्षावाननाकलितावस्तुतत्त्वः पाटन-
प्लोषणच्छेदनक्षारणशिरावेधनलङ्घनादि योग्यायै¹ कारयेत्,
कुर्याद् वा ।
न चोपदेशस्योपदेशपारम्पर्यमात्रं मूलम्, अवश्यमुपदेशस्य
क्वचित् प्रमाणे विश्रान्तेरिति हि न्यायैः । न च नित्यागम-
निर्दोषता) आ जाता है, तब ही उस आयुर्वेदिक प्रयोगसे ही आरोग्य-
रूप फलकी सिद्धि हो जाती है। इसप्रकार सर्वविदित आयुर्वेदकी
प्रमाणता निर्मूल नहीं हो सकती । क्योंकि तब निर्मूल अनाप्तवाक्य
भी प्रमाण होने लगेंगे ।
अन्वय और व्यतिरेकको आयुर्वेदके प्रामाण्यका मूल नहीं कहा जा
सकता। क्योंकि जड़ियोंके आवाप (प्रक्षेप) और उद्वाप (उत्क्षेप) के
द्वारा आयुर्वेदिक योगोंके अनन्त प्रकारके हो जानेके कारण हम लोगोंके
द्वारा रोगोंके प्रति उनके अन्वयव्यतिरेकका प्रत्यक्ष करना सर्वथा अशक्य
है। साथ ही विषादिके सम्बन्धमे स्वय प्रत्यक्ष करनेमे प्राणनाश आदि
अनेक प्रकारके अनर्थोंकी भी आपत्ति हो जायगी। क्योंकि कौन ऐसा
बुद्धिमान् होगा जो वस्तुस्थितिको जाने बिना केवल परीक्षाके लिये
अपने आपके ऊपर पाटन, प्लोषण, छेदन, क्षारण, शिरोवेधन तथा
लङ्घन आदि प्रयोगोंको दूसरोंसे करायेगा या स्वयं करेगा ?
यह भी नहीं हो सकता कि—आयुर्वेदिक उपदेशका मूल अन्वय-
व्यतिरेक नहीं है किन्तु उपदेशकी पूर्वपरम्परा ही उसका मूल है—
क्योंकि अन्ततोगत्वा उस पूर्ववर्ती उपदेशको भी नियमतः किसी प्रमाणमें
ही विश्रान्त मानना पड़ेगा। अर्थात् प्राथमिक उपदेशकत्र्ताके द्वारा
किये गये साक्षात्कारको ही परवर्ती उपदेशके प्रामाण्यका मूल
मानना पड़ेगा।
१. योग्यायै = शिक्षायै इति दीधिति ।

अनुपलब्धिवादः ४३१
सम्भवो वाक्यत्वात् । तस्मादतीन्द्रियार्थदर्शिपूर्वकोऽयमिति
परिशेषः । तथा चानेन दृष्टान्तेन महाजनपरिगृहीतत्वाद्
वेदा अपि सर्वज्ञपूर्वका इत्युन्नीयते ।
ननु महच्छब्दोऽत्र यदि प्रामाणिकवचनस्तदा सन्दिग्धा-
सिद्धविशेषणो हेतुः । अथ बह्वर्थः ? तदा सुगताद्यागमैरनै-
कान्तः । तेषामपि वा सर्वज्ञपूर्वकत्वं१ मिति चेत्, न, बहुत्वा-
तिशयस्य विवक्षितत्वात् ।
यह भी सम्भव नहीं है कि नित्य होनेके कारण आगम किसो
मूलकी अपेक्षा किये बिना स्वयं ही प्रमाण होगा—क्योंकि वाक्य होनेके
कारण अन्य वाक्योंकी तरह वह भी अनित्य ही है । इसलिये
परिशेषात् यही सिद्ध होता है कि यह आयुर्वेदका योग किसी अतीन्द्रि-
यार्थ दर्शीके द्वारा ही व्यक्त किया गया है । इसप्रकार इस आयुर्वेदके
दृष्टान्तसे महाजनद्वारा परिगृहीत होनेके कारण ऋगादिवेद भी सर्वज्ञके
ही बनाये हुए हैं, ऐसी कल्पना की जाती है । अर्थात् वेदोंका कर्ता
सर्वज्ञ ईश्वर सिद्ध हो जाता है ।
यहाँ यह विकल्प उठता है कि—'महाजन' इस पदमें महत्पद
प्रामाणिक अर्थमें है ? अथवा बहुत्वरूप संख्याके अर्थमे है ? यदि
यहाँ महत्पद प्रामाणिकवाचक है तो महाजनपरिगृहीतत्वरूप हेतु
सन्दिग्धासिद्ध विशेषणवाला हो जाता है । अर्थात् उक्त हेतुका
विशेषण जो महत्त्व है, वही सन्दिग्ध है । क्योंकि महाजनपदसे
आप मनु आदिको लेते हैं, किन्तु उनमें प्रामाणिकत्वका सन्देह है ।
यदि महत्शब्दका दूसरा अर्थ बहुत्वरूप संख्या हो, तब बुद्धादिके
आगमोंको लेकर व्यभिचारदोष हो जायगा । क्योंकि बहुत जनोंके
द्वारा स्वीकृत होनेपर भी न्याय उन्हें सर्वज्ञ-प्रणीत नहीं मानता है ।
अथवा बुद्धादिके आगमोंको भी सर्वज्ञ-प्रणीत मानना होगा—किन्तु
उक्त विकल्प हमारे हेतुके सम्बन्धमें नहीं उठ सकता है । क्योंकि यहाँ
महत्पदसे बहुत्वका अतिशय अभिप्रेत है । अर्थात् अतिशयको प्राप्त
हुए बहुत जनोंके द्वारा परिगृहीत होनेके कारण वेद सर्वज्ञ प्रणीत हैं ।
१. 'सर्वदर्शानवक्तृभिः परिगृहीतत्वमित्यर्थ' इति कलिकातामुद्रिते टिप्पणी ।

४३२ आत्मतत्त्वविवेके
कोऽतिशयः ? सर्वदर्शनान्तःपातित्वम् । कस्तैः परि-
ग्रहः ? तदर्थानुष्ठानं, स्वीकृतव्यवहारव्याकरणादिपालनी-
यत्वं, स्वीकृतप्रामाण्यायुर्वेदादिस्वीकृतार्थत्वं च ।
(प्रश्न)—अतिशय क्या है ?
(उत्तर)—सभी दर्शनोंके अन्त:पाती होना अतिशय है । अर्थात्
न्याय मीमांसा प्रभृति जितने भी दर्शन हैं, उनमें प्रतिपादित
स्वर्गापवर्गादि मुख्य विषयोंको स्वीकार करनेवाले जन ही
अतिशय को प्राप्त हुए महाजन हैं । अथवा न्याय आदि
दर्शनोंका ज्ञान ही अतिशय है । सौगतादि दर्शनाभास
हैं न कि दर्शन हैं, अत उनका ज्ञान अतिशय नहीं है ।
(प्रश्न)—अतिशयको प्राप्त न्यायादिके ज्ञाता बहुत जनोंद्वारा किया
जानेवाला परिग्रह क्या वस्तु है ?
(उत्तर)—निषेक प्रभृति वैदिक अर्थोंका उन सभीकेद्वारा अनुष्ठान
किया जाता है, इसलिये वेद महाजन परिगृहीत हुए ।
बौद्धादि-आगमोंमें प्रतिपादित मण्डलीकरण केशोल्लुञ्चन
प्रभृति अर्थोंका अनुष्ठान उन महाजनोंद्वारा नहीं होता है,
अत वे आगम महाजन परिगृहीत नहीं हुए । इसीलिये
महाजन परिगृहीतत्वहेतुसे वेदको सर्वज्ञ-प्रणीत सिद्ध
करनेमें बौद्ध आगमोंको लेकर व्यभिचारदोष नहीं
आयेगा । और न उन आगमोंका सर्वज्ञ प्रणीत होना
सिद्ध होगा । परिग्रहका यह एक अर्थ है ।
परिग्रहका दूसरा अर्थ यह है कि जिन पाणिन्यादि-प्रणीत
व्याकरणोंका प्रामाण्य सभी मानते हैं, उन व्याकरणोंद्वारा
हमारे वेदके विशेष विशेष पदोंका व्युत्पादन किया गया
है । इसलिये भी हमारे वेद महाजनपरिगृहीत हुए ।
इसप्रकार पाणिन्यादि व्याकरणद्वारा तुम्हारे आगमके
विशेषपदोंका साधन नहीं किया गया है, इसलिये भी वे
महाजन परिगृहीत नहीं हैं ।
एव, जिस आयुर्वेदशास्त्रका प्रामाण्य सभीने स्वीकार किया है, उस

७ ... ४३३
तथाहि, नास्त्येव तद्दर्शनं यत्र सांवृतमित्युक्त्वापि गर्भा-
धानाद्यन्त्येष्टिपर्यन्तां वैदिकीं क्रियां जनो नानुतिष्ठति, स्पृश्या-
स्पृश्यादिविभागं वा नानुमनुते, व्यतिक्रमे चाऽऽचमनादि-
प्रायश्चित्तं वा नानुतिष्ठति ।
न सर्वत्र सर्वो जन एवमिति चेत्, मा भूत । न हि सर्वै
रोगिभिरायुर्वेदार्थो नानुष्ठीयत इति न तस्य महाजनपरिग्रहः,
अपि तु सर्वदर्शनान्तःपातिभिरित्येव ।
आयुर्वेदशास्त्रने भी वेदोक्त विषयोंका विधान किया है । जैसे, “शत-
कृत्वो गायत्रीमभ्यस्य नीरुग् भवति” ऐसा आयुर्वेदशास्त्रमे लिखा है ।
तथा वह गायत्री वेदका ही अंश है न कि बौद्ध आगमोंका ! यह
परिग्रहका तीसरा अर्थ है ।
उक्त तीनों प्रकारके परिग्रहोंमें महाजनोंद्वारा वेदार्थानुष्ठानरूप
प्रथम परिग्रह इस प्रकार है—जैसे, ऐसा कोई भी दर्शन नहीं है,
जिसको माननेवाला व्यक्ति वैदिक क्रियाका अनुष्ठान न करता हो ।
यहाँ तक कि ब्रह्मातिरिक्त सब विषयको अविद्याकल्पित कहनेवाले
वेदान्ती जन भी गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टि तक वैदिक क्रियाओंको नहीं
करते हैं, ऐसी बात नहीं है । या कोई भी दार्शनिक जन वेदोक्त
स्पृश्यास्पृश्यविभागको न स्वीकार करता हो अथवा अस्पृश्यस्पर्शरूप
व्यतिक्रम हो जानेपर आचमन-स्नान आदि प्रायश्चित्त न करता हो,
यह बात नहीं है ।
यदि कहो कि—सभी दर्शनोंके सभी व्यक्ति तो वैदिक क्रियाओंका
अनुष्ठान नहीं करते हैं—तो वैसा भले ही मत हो । क्योंकि सभी रोगी
दवाका सेवन नहीं करते इससे वह शास्त्र महाजनपरिगृहीत नहीं है,
ऐसा नहीं हो जाता । किन्तु महाजनपरिगृहीत इतने ही से हो जाता
है कि सभी दर्शनोंके अधिकांश लोग वेदोक्त अर्थोंका अनुष्ठान करते
हैं । “फिर भी सभी वैदिक विधानोंका अनुष्ठान तो ये लोग भी नहीं
करते” यदि ऐसा कहो तो, भले ही वैसा न हो, उससे कोई क्षति नहीं
२८

४३४ आत्मतत्त्वविवेके

तथापि न सर्वो वेदार्थ एवमिति चेत्, मा भूत् । न हि
सर्वो वैद्यकार्थ एवमपि तु कश्चित् केनापि ।
एवं तर्हि सौगताद्यागमार्थोऽपि कश्चिदहिंसादिः सर्वदर्श-
नान्तःपातिभिरनुष्ठेयत एव कैश्चिदिति सोऽपि महाजनपरि-
गृहीतः स्यात्, न, सन्देहात् । किमयमहिंसादिर्वैदिक एवार्थो
बिडालव्रतन्यायेन श्रद्धाऽऽपादनाय शौद्धोदनिप्रभृतिभिरुप-
निबद्धः ? आहो स्वयं दृष्ट एवेति ? न तावत् स्वयं दृष्टः,
क्षपणकाद्यागमसाधारणत्वात् । यस्त्वसाधारणो मण्डली-
करणादिः केशोल्लुञ्चनादिर्वा, नासौ सर्वैरनुष्ठोयते । वैदिकस्तु
असाधारण एव निषेकादिस्तथेति ।


है ! क्योंकि आयुर्वेदोक्त सभी उपचारोंका अनुष्ठान सभी महाजन
नहीं करते किन्तु कोई किसीका ही अनुष्ठान करता है । वैसे ही वैदिक
विधानोंको भी समझना चाहिये ।
यदि कहो कि--ऐसे तो बौद्ध-आगमोंके अहिंसा आदि कुछ विषय
भी सभी दर्शनोंके कुछ जनोंके द्वारा अनुष्ठित होते ही हैं, इसलिये वे
भी महाजनपरिगृहीत हों—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अहिंसा
आदिके बौद्ध आगमोक्त होनेमें सन्देह है । कारण, क्या अहिंसा आदि
वेदोक्त विषय ही बिडालव्रत-न्यायसे लोगोंमें अपने प्रति श्रद्धा उत्पन्न
करनेके लिये बुद्धदेवाद्दिके द्वारा अपने ग्रन्थमें कहा गया है ? अथवा
स्वयं प्रत्यक्ष करके ही कहा गया है ? यहाँ स्वयं प्रत्यक्ष करके बुद्धदेवने
अहिंसाका प्रतिपादन किया है, यह पक्ष नहीं हो सकता । क्योंकि
जिस क्षपणक आदिके आगमको स्वयं बुद्धदेवने भी अप्रामाणिक माना
है, उसमें भी अहिंसाका प्रतिपादन हुआ है । इससे मालूम पडता है
कि वेदोक्त अहिंसाका तत्त्व बुद्धदेवने स्वयं प्रत्यक्ष नहीं किया है । किन्तु
बेडालव्रतके समान ही क्षपणक आदिकी तरह केवल दिखानेके लिये
उसे अपनाया है । जो तो मण्डलीकरण या केशोल्लुञ्चन आदि
बौद्धादि आगमोंका अपना विशेष विषय है, उसका अनुष्ठान सभी
नहीं करते । वेदमें कहे हुए निषेक (गर्भाधान) आदि तो वेदके

अनुपलब्धवादः ४३५
अपि च वाचकापभ्रंशविभागोऽस्तु न वा, तद्व्यवहार-
स्तावत् सर्वैरेव तीर्थिकैरविगानेन स्वीकृतः । तथा शिक्षा-
ज्योतिषच्छन्दोनिगमनिरुक्ताद्यर्थश्च । तेषां च वेदरक्षैव परमं
प्रयोजनमिति ।
स्यादेतत्, व्याकरणादीनि तावत् सर्वैरभ्युपगतार्थानि, वेदा
अपने विशेष विषय हैं, जिनका सभी महाजन अनुष्ठान करते हैं।
इसप्रकार महाजनद्वारा वैदिक विधानोंका अनुष्ठान होनेसे वेदोंका
सर्वज्ञ-प्रणीत होना सिद्ध होता है ।
एवं वाचकशब्द और अपभ्रंशात्मक शब्दका विभाग भले ही
व्याकरण द्वारा न हो सकता हो, क्योकि “गां गृहाण” इत्यादिमें वाचक-
भूत गो-प्रकृति और अम्-प्रत्यय तथा ग्रह्-प्रकृति एव सिप्-प्रत्यय इनमेंसे
कोई भी नहीं है किन्तु विकार या आदेश बन गया है। लोप स्थलमें
तो मूलशब्दका पता भी नहीं रहता, फिर भी उन स्थलोंमें व्याकरणद्वारा
परिकल्पित प्रकृति-प्रत्यय और आगमादिको व्याकरणद्वारा ही सभी
जानते और “गां गृहाण” आदिका अर्थ समझते हैं। इस प्रकार
व्याकरणका व्यवहार सभी दार्शनिकोंने श्रद्धापूर्वक स्वीकार किया है।
तथा उस सर्व-स्वीकृत व्याकरणने ‘बहुल छन्दसि’ इत्यादि सूत्रोंके द्वारा
“भद्रं कर्णेभि” इत्यादि वेदोक्त पदोंका ही साधन किया है न कि
बौद्धादि-आगमोक्त पदोंका। बल्कि व्याकरणके व्याख्याता महाभाष्य-
कारादिने सौगत आगमोंका अप्रमाण ही प्रतिपादित किया है।
एवं, वेदाङ्गभूत शिक्षा, ज्योतिष, छन्द, निगम और निरुक्तादिद्वारा
कथित अर्थका भी सभी तीर्थिकोंने स्वीकृत किया है। तथा प्रकृति-
प्रत्ययके व्यवहारको बतानेवाले व्याकरण और वेदोक्त अर्थोंको स्फुट
करनेवाले शिक्षादिका भी मुख्य प्रयोजन वेदोंकी रक्षा ही है। अर्थात्
वेदार्थोंका निश्चय करना और उनका अनुष्ठान किया जाना इसी मुख्य
प्रयोजनके उद्देश्यसे पाणिन्यादि मुनियोंने व्याकरण शिक्षा आदिकी
रचना की है। यदि वेद अप्रमाण होते तो उनके अर्थोंके निर्णयार्थ एवं
अनुष्ठानार्थ उन उन शास्त्रोंकी रचना ही मुनिगण नहीं करते ।
अस्तु, व्याकरणादिके विषय सभीके द्वारा स्वीकृत हों, तथा वेदोंका

४३६ आत्मतत्त्वविवेके
अपि तैः पालनीया भवन्तु । त एवेति कुतः ? संसारमोचका-
गमोऽपि तत्पालनीयः किन्न स्यादिति चेत्, न, तत्कर्तृभिस्तथा-
नभ्युपगमात्, अव्युत्पादनात्, असाधारणलिङ्गाभावात्, विरुद्ध-
लिङ्गसद्भावाच्च । न हि वेदशब्दार्थाविव सुगताद्यागमा-
साधारणशब्दार्थाननुरुध्य तेषां प्रवृत्तिर्यत एवमुन्नीयत, प्रत्युत
विरोध एव, तैस्तदप्रामाण्यव्युत्पादनात् । तस्मात् सर्वाभ्युपेत-
व्यवहारव्याकरणादिपालनीयत्वमपि वेदानामेव नान्येषाम् ।
पालन उन व्याकरणादि शास्त्रोंका मुख्य उद्देश्य भी हो, फिर भी वेद ही
उनका पालनीय है, यह कैसे माना जाय ? ससारमोचकादि आगम भी
उनका पालनीय ( उद्देश्य ) क्यों न होगा ?—तो इस प्रकारकी शङ्का
नहीं की जा सकती । क्योंकि व्याकरणादिके रचयिता पाणिनि आदिके
द्वारा ससारमोचकागममे प्रतिपादित शब्द एव अर्थका अभ्युपगम नहीं
किया गया है। क्योंकि उनके द्वारा जैसे वैदिक पदोंका व्युत्पादन
किया गया है, वैसे बौद्धादि आगमोंके पदोंका व्युत्पादन नहीं किया गया
है। क्योंकि व्युत्पादित किये जानेका जो असाधारण लिङ्ग है, वह
उनमें नहीं है । अर्थात् वैसे पद उन आगमोंमे प्रयुक्त होते जो भाषामें
प्रयुक्त नहीं हैं, तब वे पद ही उनके असाधारण लिङ्ग होते और उनका
भी व्युत्पादन व्याकरणादिका उद्देश्य माना जाता, किन्तु वैसा है नहीं ।
बल्कि व्युत्पादनके विरोधी लिङ्ग ही ससारमोचकागमोंमें विद्यमान हैं ।
क्योंकि जैसे वेदमें असाधारण शब्द एव अर्थ हैं, वैसे सौगतादि आगमों
में असाधारण शब्द एव अर्थ नहीं हैं, जिनके अनुरोधसे मुनियोंकी
प्रवृत्ति होती और उनके द्वारा व्युत्पादन किये जानेकी कल्पना की
जाती । बल्कि अनुरोधकी जगह विरोध ही पाया जाता है । क्योंकि
मुनियोंने उन आगमोंके अप्रामाण्यका ही व्युत्पादन किया है । इस
प्रकार सिद्ध होता है कि सर्व स्वीकृत है व्यवहार जिसका, ऐसे व्याकर-
णादिके द्वारा वेदका ही पालन लक्ष्य है न कि सौगतादि आगमोंका ।
यह द्वितीय प्रकारका महाजनपरिगृहीतत्व है ।