आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 472, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंयच्च यदनुगुणत्वेन कल्पितं तस्य तेनैव विफलीकरणे सर्वत्रादृष्ट-
मुपादाय दृष्टवैफल्यप्रसङ्गः । तथा च तदपि न स्यात्, प्रमाणा-
भावात् । दृष्टेन ह्यदृष्टमुन्नीयते ।
परार्थे च प्रवृत्तिः स्वार्थाभावात् । न च दुःखसृष्ट्या
कारुण्यापवादः, जनकाध्यापकचिकित्सकादिषु व्यभिचारात् ।
अथ दौर्जन्यादेव किं नैवमिति चेत् , न, दोषाभावात् ,
यदि कहो कि—प्रत्यक्ष अन्वय और व्यतिरेकद्वारा जिसमे कारणत्व
सिद्ध है, उसमे वैयर्थ्यका प्रसङ्ग नहीं होगा—तो अनुमानसे जिसमे
(ईश्वरमे) कारणता सिद्ध है, उसमे भी इसीप्रकार वैयर्थ्य नहीं
होगा। क्योंकि दोनोंमे समानरूपसे कारणता सिद्ध है । एव, जो
जिसके उपजीव्यके रूपमें कल्पित होता है, वह यदि उसीके द्वारा
व्यर्थ कर दिया जाय तो सर्वत्र अदृष्टको लेकर दृष्टकारणोंमें वैफल्यका
प्रसङ्ग हो जायगा । अन्तत वह अदृष्ट भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि
उसे सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण नहीं है । कारण, दृष्टसे ही तो
अदृष्टकी कल्पना की जाती है । तात्पर्य यह है कि अदृष्ट का अधिष्ठाता-
रूपमे ही ईश्वर सिद्ध होता है । अतः उसीके द्वारा ईश्वरको अन्यथा-
सिद्ध नहीं किया जा सकता है । क्योंकि ऐसा करनेपर उपजीव्य-
विरोध होता है । अदृष्टका अधिष्ठाता होनेके कारण ईश्वर अदृष्टका
उपजीव्य है ।
एव, सृष्टिमे ईश्वरकी प्रवृत्ति परार्थ होती है । क्योंकि पूर्णकाम
होनेसे उसे अपना कोई स्वार्थ नहीं है । यहाँ यह नहीं कह सकते कि-
दुःखमय सृष्टि करनेके कारण ईश्वरमें कारुण्यका अभाव हो गया-क्योंकि
पिता, अध्यापक और चिकित्सकमे उक्त कथनका व्यभिचार देखा जाता
है । अर्थात् पिता आदि अपने पुत्र, शिष्य और रोगीके हितके लिये
उनमें ताडनादिद्वारा दुःख उत्पन्न करते ही हैं, फिर भी उनमें कारुण्यका
अभाव कोई नहीं मानता है ।
यदि कहो कि—कुटिलतावश ही ईश्वरद्वारा दुःखमय सृष्टिका किया
जाना क्यों न माना जाय—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि कुटिलता
का कारण रागद्वेषात्मक दोष है और ईश्वरमें उस दोषका अभाव है।