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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 473, कुल 530 में से

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पृष्ठ 473

अनुपलम्भवादः ४२३

तदभावश्च मोहाभावात, तदभावोऽपि सर्वज्ञत्वादिति ।
एकद्व्यणुककारी च१ परमाणुमदृष्टमुपकार्यत्र्यणुकादिभोग-
पर्यन्तं द्रव्यादिषट्कं च जानाति नूनमित्यविवादम्, एषामुपादा-
नादिरूपत्वात् ।
अवच्छेद्यावच्छेदकभावापरिज्ञानेन घोपादानादिपरिज्ञानानु-
पपत्तेः । यश्च यज्जातीयमेकं कर्तुं ज्ञातुं वा समर्थः स तज्जातीयं
सर्वमेवेति नियमः, सामर्थ्यस्य जातिनियतत्वात् । केवलं समर्थो-
तथा दोषका अभाव भी उसमें इसलिए है कि उसमें मोह ( अज्ञानता )
का अभाव है । और मोहका अभाव भी उसके सर्वज्ञ होनेके कारण
है । अर्थात् सर्वज्ञ ईश्वरमें अज्ञानता आ कैसे सकती है ?
एवं, एक द्व्यणुक बनानेवाला ईश्वर परमाणु, अदृष्ट तथा द्व्यणुक-
से किये जानेवाले त्र्यणुकादि-वस्तुओंके भोगपर्यन्त द्रव्य, गुण, कर्म,
सामान्य, विशेष और समवायरूप छहों पदार्थोंको निश्चित ही जानता है,
यह निर्विवाद है । जैसे, कुम्भकार कपाल चक्रादिसे लेकर बनाये जाने
वाले घटके उपभोगतककी सम्पूर्ण प्रक्रियासे अवगत रहता है । यहाँ
द्व्यणुकरूप कार्यके प्रति परमाणु उपादानरूप है और अदृष्टादिक
निमित्त रूप हैं । अर्थात् उपादान-निमित्तादिके ज्ञानके बिना कोई
कर्ता हो ही नहीं सकता हैं ।
षट् पदार्थांन्तर्गत सामान्य ( जाति ) का भी ज्ञान इसलिये रहता है
कि व्यक्ति और जातिके पारस्परिक अवच्छेद्यावच्छेदकभावका ज्ञान हुए
बिना “अमुकका उपादान या निमित्त कारण अमुक है” इसका भी परि-
ज्ञान असंभव है । अर्थात् किसी कार्यको करनेवालेके लिये अनुगतरूप
( जाति ) से अवच्छिन्न (युक्त) कार्य-कारणका ज्ञान आवश्यक है । इस
प्रकार कार्यतावच्छेदक और कारणतावच्छेदकरूपमें सामान्य ( जाति )
का भी ज्ञान रहता है । एवं, जो कर्ता जिस जातिके एक कार्यको करने-
में या जाननेमे समर्थ रहता है, वह उस जातिके समस्त कार्यको ही
करने या जाननेमें समर्थ रहता है, यह नियम है । कर्तृगत सामर्थ्य भी
१. मु इति १ पु० पा०