आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथानुपलम्भवार्तः ३४९
तद्योग्यतेति चेत्, सैव केति चिन्त्यम् । शक्तिविशेष इति
चेत्, स तावन्न प्रतिक्षणनियत: । यथा हि तेन तत्कर्तव्यं तथा
तादृशापि तत्कर्तव्यमित्यपि नियम एव । अन्यथा तेन तत्कृत-
मित्यपि न निश्चीयेत, क्षणस्य दुरुन्नेयत्वात् । तथा च निरीहं
हो । इस प्रकार स्वय स्वयका ज्ञापक होनेसे आत्माश्रय दोष स्पष्टतः
हो जाता है ।
यदि कहें कि—प्रतिसन्धानकी योग्यता उपादानोपादेयभावका लक्षण
है—तो प्रतिसन्धानकी योग्यता ही तो विचारणीय है कि वह क्या वस्तु
है ? अर्थात् जो स्वय विचारकोटिमे है, वह किसीका लक्षण (परिचायक)
कैसे हो सकता है? यदि कहें कि—बुद्धियोंकी विशेषप्रकारकी शक्ति ही
प्रतिसन्धान योग्यता है । अर्थात् बुद्धियोंमे एक विशेष शक्ति होती है,
जिससे कार्यकारणभावापन्न बुद्धियोंमे प्रतिसन्धानका नियम रहता है ।
किन्तु शिष्याचार्यकी बुद्धियोंमें या पिता-पुत्रकी बुद्धियोंमें वह शक्ति-
विशेष नहीं रहता है, इसीलिये वहा प्रतिसन्धान नहीं होता है—तो वह
शक्तिविशेष प्रतिक्षण नियत नहीं हो सकता है । क्योंकि शक्तिविशेष
कारणत्वरूप ही है तथा उसके अननुगत होनेसे प्रत्येक क्षणिकव्यक्तिमे
उसका ज्ञान होना असंभव है ।
एवं, जैसे उस व्यक्तिके द्वारा वह कार्य होता है, वैसे ही उस व्यक्ति-
की जातिके द्वारा भी वह कार्य होता है—यह भी नियम ही है। अर्थात् जो
व्यक्ति विशेष कारण होता है, उस जातिका दूसरा व्यक्तिविशेष भी कारण
होता ही है—यह भी नियम ही है । अतः शक्तिविशेष (कारणता) प्रति-
व्यक्ति नियत ही होता है—यह कथन असंगत है । क्योंकि उक्त रीतिसे
कारणता व्यक्तिके समान जातिसे भी नियत होती है । यदि कारणता
जातिनियत न मानी जाय, अर्थात् कारणतावच्छेदक कोई जाति न मानी
जाय, तो "अमुक कार्य अमुक व्यक्तिके द्वारा किया गया है" यह भी
निश्चय करना असंभव हो जायगा । क्योंकि क्षणका या अनागतादि
क्षणिकव्यक्तिका ज्ञान ही कठिन है । ऐसी स्थितिमें सम्पूर्ण जगत् चेष्टा-
रहित हो जायगा । क्योंकि कारणताका ज्ञान नहीं होनेसे वस्तुओंमे इष्ट-
साधनता या अनिष्टसाधनताका ज्ञान नहीं होगा तथा उसके बिना प्रवृत्ति