आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 396, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाष्ठस्य तु¹ प्रकृतेर्विकृतिरङ्गार इति कुतो निश्चितं भवता,
यावता वह्नेरेवायं विकारः किं न स्यात् ? वह्निसम्बन्धिकाष्ठादेव
तदुत्पत्तेरिति चेन्न, काष्ठसम्बन्धेन वह्नेरेव तदुत्पत्तिरित्यपि किं
न कल्प्येत ? पार्थिवं पार्थिवोपादानकमिति निश्चयादिति चेत्,
कुत एतत् ? सभागेषु स्वलक्षणेषु² तथा दर्शनादिति चेत्, एतदपि
कुतः ?
अभ्रान्तसमतैकावसायादिति चेत्, अथ केयं समता नाम ?
विज्ञानसन्ततिमे प्रकृति विकृतिभाव नहीं होनेसे उक्त दोनों ही लक्षण
एक दूसरेके लक्ष्यमे अव्याप्त हैं । एव, समस्त लक्ष्यमे वर्तमान नहीं
होनेसे उक्त दोनों लक्षण अननुगत भी हैं । लक्षणका लक्ष्यमात्रमे अनु-
गत होना आवश्यक है ।
अननुगमके साथ साथ दूसरा दोष यह भी है कि—काष्ठरूप प्रकृति-
का अङ्गार विकार है—यही आपने कैसे निश्चय कर लिया हैं ? जब
कि अग्निका ही विकार अङ्गार क्यों न हो सकता है ? यदि कहें कि—
अग्निसम्बद्ध काष्ठसे ही अङ्गारकी उत्पत्ति होती है, इसलिये काष्ठका
ही विकार अङ्गार है—तो ऐसा नहीं कह सकते हैं । क्योंकि काष्ठसम्बद्ध
अग्निसे ही अङ्गारकी उत्पत्ति होती है, यही कल्पना क्यों न कर ली
जाय ? यदि कहें कि—पार्थिव वस्तुका उपादान पार्थिव ही वस्तु होती
है, यह निश्चित है । अत अङ्गारके पार्थिव होनेसे वह पार्थिव काष्ठसे
ही उत्पन्न हो सकता है, न कि तेज (अग्नि) से—तो यह भी क्यों
है ? अर्थात् सजातीयका सजातीय ही उपादान कारण होता है, यह
निश्चय भी आपको कैसे है ? यदि कहें कि—सजातीय वस्तुओंमें वैसा
ही देखा जाता है । इसलिये काष्ठ-अङ्गार आदि स्थलमे साजात्य ही
उपादानोपादेयभावका नियामक है—तो वैसा देखे जानेका भी क्या
कारण है ?
यदि कहें कि—सजातीय कारण-कार्यकी सन्ततिमे समताके कारण
अभ्रमात्मक एकाकारताकी प्रतीति होनेसे ही वैसा देखा जाता है—
१. च इति दीधितिसम्मत पाठः । २ लक्षणेषु इति ३ पु० पा०