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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 530 में से

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पृष्ठ 402

ज्ञानोपादानं भवेत्, दृश्यजात्यभेदेऽपि किञ्चिदेव निमित्तं भविष्य-
तीति शङ्कायाः समुत्थापयितुं शक्यत्वादिति ।
अस्त्व तर्हि सहकारिभेदान्नियम इति चेत् , स एवैकः कर्तेति
गीयते । अथैक एव कर्ता न तु तादृक्सहकारिपरम्परेति कुतो
विशेषादिति चेत्, (न,) तत्कर्तृकत्वं भिन्नकर्तृकेभ्यो व्यावर्तते न तु
तादृक्सहकारित्वमित्यतो विशेषात् । कुतश्चिदेवमपि स्यादिति
विजातीय घटादि भी कपालरूप उपादानकारणसे न पैदा होकर ज्ञान-
रूप उपादानकारणसे पैदा होने लगेगा । एव, दृश्यमान धूमत्व-जातिके
एक होनेपर भी कोई धूम अग्निसे होगा और कोई किसी अन्यसे
होगा—ऐसी आशङ्का बराबर उठायी जा सकती है, तथा कभी भी धूमसे
वह्निका अनुमान नहीं हो सकेगा ।
यदि कहो कि—सहकारि-विशेष ही प्रतिसन्धानका नियामक रहे
तथा शिष्याचार्यकी बुद्धियोंमें उस सहकारि-विशेषके नहीं रहनेके कारण
अतिप्रसङ्ग भी नहीं होगा—तो वह सहकारि-विशेष ही तो एक कर्ता
(आत्मा) कहा जाता है। अर्थात् वह सहकारि-विशेष ही पूर्वापर
बुद्धियोंका एक प्रतिसन्धाता (प्रत्यभिज्ञान करनेवाला) आत्मा है।
यदि पूछो कि—ऐसा क्यों माना जाय कि एक ही कर्ता पूर्वसे लेकर
अन्ततक प्रतिसन्धानकर्ताके रूपमें स्थित रहता है न कि वैसे सहकारियों
की परम्परा जारी रहती है—तो यह इस कारण माना जाता है कि
पूर्वापर बुद्धियोंका एक कर्ता माननेपर ही भिन्न कर्त्ताओंकी व्यावृत्ति हो
सकेगी न कि वैसे सहकारियोंकी परम्पराको कर्ता माननेपर । अर्थात्
यदि भिन्न-भिन्न सहकारियोंकी परम्परा ही पूर्वापर बुद्धियोंका कर्ता
होकर उनका प्रतिसन्धान (स्मरण) करनेवाली हो तो चैत्रने जिसे
देखा है, उसका स्मरण मैत्रको भी हो जाय । किन्तु ऐसा नहीं होता
है। इसीकारण एक ही कर्ता माना गया है, सहकारियोंकी परम्परा-
को नहीं।
यदि कहो कि—एक कर्ताके न माननेपर भी किसी विशेषताके कारण
ही तथाविध सहकारियोंकी परम्पराको प्रतिसन्धानका नियामक मानने-
१. सहकारित्वपरम्परेति २ पु० पा०
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