सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 403, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 403

चेत्, ननु स एव विशेषश्चिन्त्यते । -
स च१ तत्स्वभावत्वं वा, तज्जातीयत्वं वा, तत्सहकारित्वं
वा, तादृक्सहकारित्वं वेत्यतो नातिरिच्यते । तत्र प्रथमोऽसंभवी ।
द्वितीयोऽतिप्रसञ्जकः । चतुर्थे नियामकाभावः । ततस्तृतीय एव
परिशिष्यते, गत्यन्तराभावादिति ।
अथवा सम्भवन्नपि नायमुपाधिः, तत्र तावन्मात्रस्यानिवन्ध-
पर भी शिष्याचार्य बुद्धियों में या चैत्रमैत्रकी बुद्धियोंमें अतिप्रसङ्ग नहीं
होगा—तो उस विशेषताका ही यहाँ विचार किया जा रहा है कि वह
विशेषता क्या वस्तु है ?
क्या पूर्वापर बुद्धियोंका एकस्वभावका होना विशेषता है ? या एक
जातीय होना विशेषता है ? या बुद्धिसन्तानके साथ-साथ एक-एक
सहकारिकी अपेक्षा होना विशेषता है ? अथवा उस निश्चित सहकारीकी
जातिका होना वह विशेषता है ? क्योंकि इससे अतिरिक्त कोई विशेषता
नहीं हो सकती है ।
इनमें प्रथमपक्ष असम्भव है । क्योंकि अत्यन्त भिन्न पूर्वापर-
बुद्धियोंका एक स्वभाव नहीं हो सकता है । द्वितीयपक्षमें अतिप्रसङ्ग
दोष आ जायगा । क्योंकि शिष्य और आचार्यकी बुद्धिया भी एक
जातिकी हैं इसलिये आचार्यकी बुद्धिका स्मरण शिष्यको भी होने
लगेगा । चतुर्थपक्षमे कोई नियामक नहीं है । अर्थात् जिस सहकारीके
कारण चैत्रको अपनी पूर्वापर बुद्धियोंका प्रतिसन्धान होता है, उस
जातिका सहकारी मैत्रको भी सम्भव है, इसलिये चैत्रके देखेका मैत्रको
भी स्मरण होने लगेगा । इसलिये तृतीय ही पक्ष बच जाता है !
क्योंकि उसके सिवाय अन्यगति नहीं है । अर्थात् प्रतिसन्धानके
नियामकके रूपमे बुद्धिसन्तानोंसे भिन्न एक सहकारी मानना होगा, जो
मेरे मतानुसार प्रतिसन्धानकर्ता आत्मा है ।
अथवा यदि बुद्धिसन्तानोंमें परस्पर उपादानोपादेयभाव सम्भव भी
हो तो भी यह प्रतिसन्धानका प्रयोजक नहीं हो सकता है । क्योंकि


१ न च इति १ पु० पा०