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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 530 में से

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पृष्ठ 399

३५० आत्मतत्त्वविवेके
जगज्जायेत, आकस्मिकञ्च कार्यस्य तादृशत्वमापद्येत । तथा च
न नियम उपलभ्येत५ । नापि प्रतिसन्ताननियत: (शक्तिविशेष:),
विशेषाभावात् ।
अस्तु वैजात्यमिति चेन्न, अनुपलब्धिबाधितत्वात् । न हि
या निवृत्ति कुछ भी नहीं हो सकेगी । एव कारणकी नियत जाति नहीं
माननेपर कार्यकी नियतजातीयता भी आकस्मिक (निर्मूल) हो जायगी ।
ऐसी स्थितिमें "धूमजातीय वह्नि जातीयका कार्य (जन्य) है" यह नियम
नहीं बन सकेगा । आशय यह है कि कारण और कार्यकी नियत-
जाति अवश्य माननी होगी । अत: प्रतिसन्धानके प्रति भी बुद्धित्वरूप
से ही कारणता माननी पडेगी । इसप्रकार शिष्याचार्यके बुद्धियोंमें
भी बुद्धित्वजातिके होनेसे परस्पर प्रतिसन्धातृ-प्रतिसन्धेयभाव होने
लगेगा ।
यह भी नहीं कहा जा सकता कि—उक्त शक्तिविशेष प्रतिसन्तान-
नियत है । अर्थात् कार्यकारणभाव (उपादानोपादेयभाव) अथवा
प्रतिसन्धातृप्रतिसन्धेयभाव न प्रतिक्षण (प्रतिव्यक्ति) नियत है और न
जातिनियत है, किन्तु प्रत्येक बुद्धि-सन्तान (बुद्धिधारा) मे अलग अलग
है । इसलिये आचार्यके नीलविषयक बुद्धिसन्तानसे शिष्यका नील-
विषयक बुद्धिसन्तान दूसरा ही है । अत: शिष्याचार्यके बुद्धिसन्तानोंमें
न उपादेयोपादानभावका और न प्रतिसन्धातृप्रतिसन्धेयभावका ही प्रसङ्ग
होगा—क्योंकि आचार्यके नीलबुद्धिसन्तानसे शिष्यके नीलबुद्धिसन्तानमें
पार्थक्यकी नियामिका कोई भी विशेषता नहीं है । ज्ञानत्व या सन्तानत्व
तो दोनोंकी बुद्धियोंमें समान ही है । इसप्रकार आचार्यबुद्धिका प्रति-
सन्धान शिष्यको भी होना चाहिये—यह आपत्ति क्षणिकविज्ञानवादमें
यथापूर्व स्थिर ही रह गयी ।
यदि कहो कि—वैजात्य ही दोनोंमें विशेषताके रूपमें है । अर्थात्
वैजात्य एक जातिविशेष है, जो भिन्न भिन्न बुद्धिसन्तानोंमे भिन्न भिन्न
है—तो यह भी नहीं कह सकते । क्योंकि उस प्रकारकी कोई जाति
५ उपपद्यते इति १ पु० पा०