आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
वाऽभिप्रेत्य यदि एकत्वाभ्युपगमे विरोध उद्भाव्यते, तदैवमेतत्,
न तु तथाऽभ्युपगमः । न खल्वनेकत्वं चित्रत्वम्, शुक्लेष्व-
प्यनेकेषु चित्रप्रत्ययप्रसङ्गात् । नाप्येकस्मिन् विरुद्धानेक-
जातिसमवायः, विरोधेनैव निराकृतत्वात् । अपि तु नील-
त्वादिवत् चित्रत्वमपि जातिविशेष एव । स चावयववृत्तिवि-
जातीयरूपसमाहाराभिव्यङ्ग्यत्वान्नैकरूपावयवसहितस्यावय-
विन उपलम्भेऽप्युपलभ्यते । अत एव त्र्यणुके चित्रेऽपि चित्र-
प्रत्ययो न कदापि ।
यह प्रतीति नानारूपोंको विषय करती है, यह मानकर, अथवा नीलत्व-
पीतत्व आदि परस्पर विरुद्ध नाना जातियोंसे युक्त एक रूपको विषय
करती है, यह मानकर यदि मैं एक अवयवीसिद्ध करता और विरोधकी
उद्भावना की जाती, तब उक्त आक्षेप हो सकता था । किन्तु मैं वैसा
मानता नहीं । अर्थात् मेरी मान्यताके अनुसार चित्रत्व एक स्वयं जाति
है । उससे युक्त चित्ररूपवाले अवयवी को ही यह प्रतीति विषय करती
है । अतः उसमें विरोधकी गन्ध भी नहीं है । कारण अनेक रूपका
होना चित्रत्व नहीं है । वैसा होनेपर केवल अनेक शुक्लोंके रहनेपर भी
चित्रप्रतीति होने लगेगी ।
एकरूपमें नीलत्वपीतत्व आदि अनेक विरुद्ध जातियोंका समवाय भी
चित्रत्व नहीं है । क्योंकि विरोधके कारण ही यह खण्डित है । किन्तु
नीलत्व पीतत्व आदिकी तरह चित्रत्व भी एक जातिविशेष है, और वह
जाति अवयवोंमें वर्तमान विजातीयरूपोंके सम्मेलनसे व्यङ्ग्य होती है।
इसीलिये जिस अवयवीकी उपलब्धि केवल धवलरूपवाले एकभागके
साथ होती है, वहा उस अवयवीमें चित्रत्वकी उपलब्धि नहीं होती है ।
कारण, धवलसे विजातीयरूपवाले परभागके अवयवकी भी साथ साथ
उपलब्धि नहीं होनेसे उस अवयवीमें चित्रत्वजातिकी अभिव्यक्ति ही नहीं
हो पाती है । इसीलिये त्र्यणुकके चित्र होनेपर भी उसमे चित्रत्व-
प्रतीति कभी नहीं होती है । क्योंकि विजातीयरूपवाले उसके अवयव-
भूत द्व्यणुक स्वयं अदृश्य हैं ।
२६४ आत्मतत्त्वविवेके
तथाप्यचित्रे पार्श्वे चित्रप्रत्ययो मा भूत्, धवलप्रत्ययस्तु
कुत इति चेत्, अवयवरूपसञ्चारेणावयविनोऽपि तथा प्रत्य-
यात् । अत एव यत्रावयवरूपं न प्रत्यक्षं तत्र त्रसरेणावेतदपि
नास्ति, दृश्यमेव (वा) ह्यालोकरूपमारोप्य पिञ्जरस्त्रसरेणु-
रालोक्यते ।
स्यादेतत्, यदि चित्रस्य नाम जातिविशेषः, कथं तर्हि
विरुद्धजातीयरूपसमाहारमात्रे चित्रत्वप्रत्यय¹ इति चेत्, न
वै नीलधवलारुणेषु पटेषु क्वचिदपि कार्बुरार्थे² चित्रप्रत्ययः
पूर्वपक्ष—फिर भी जिस अवयवीका एक पार्श्व अचित्र है अर्थात्
धवल है, वहा अवयवीमे चित्रकी प्रतीति भले ही न हो परन्तु उसमे
धवलत्वकी प्रतीति भी कैसे होगी ?
समाधान—इस शङ्काका यही उत्तर होगा कि यहाँ एकभागीय धवल
अवयवके धवलत्वका ही सम्पूर्ण अवयवीमे आरोप हो जानेसे एक
भागसे देखनेवालेको सम्पूर्ण अवयवी ही धवल मालूम पड़ता है । इसी
लिये जहाँ अवयवरूपकी बिल्कुल ही प्रतीति नहीं होती, वहा त्रसरेणुमें
अवयवगत धवलरूपका आरोप भी नहीं होता । त्रसरेणुमें जो भूरापन
की प्रतीति होती है, वह अवयवगतरूपके आरोपसे नहीं होती, क्योंकि
अवयवगतरूप स्वय अदृश्य है । किन्तु दृश्यभूत आलोकके रूपका ही
त्रसरेणुमें आरोप होनेसे वह भूरा मालूम पड़ता है ।
'अस्तु, विभिन्नरूपवाले अवयवोंसे उत्पन्न अवयवीम अभिव्यक्त
चित्रत्व यदि एक जातिविशेष है, तो जहाँ किसी अवयवीकी उत्पत्ति नहीं
होती है, किन्तु विरुद्धजातीय रूपोंका समाहार भर है वहाँ चित्रत्वकी
प्रतीति कैसे होती है' ? ऐसा यदि प्रश्न करो तो यही उत्तर होगा कि
नील, धवल और अरुण पटोंकी ढेर जहा इकट्ठी है, वहाँ कही भी किसी
को भी कर्बुर अर्थमें चित्रशब्दका व्यवहार या चित्रकी प्रतीति नहीं ही
१ चित्रप्रत्यय इति २ पु० पा०
२. वाये वाये इति ३ पु० पा०
बाह्यार्थभङ्गवादः २६५
कस्यापि१। वैधर्म्यनिमित्तस्तु केन वार्यते ? चित्रशब्दस्याक्षा-
दिपदवदनेकार्थत्वात् ।
नीलपीतादिषु मिथः संसृष्टेष्वनारब्धद्रव्येष्वपि कर्बुर-
प्रत्ययो भवतीति चेत्, सत्यम्, द्रव्यान्तरोत्पादाभिमानात्
स्थौल्यातिशयप्रत्ययवदुपपत्तेरिति ।
अस्तु तर्हि परमाणुनिवृत्तेः सर्वविलोपः । तथाहि,
बहुभिः परमाणुभिः संसृज्यमानः परमाणुः प्रत्येकं किमेक-
देशेन संयुज्यते ? कात्स्न्र्येन वा ? प्रकारान्तराभावात् ।
होती है। वहा पर बैलक्षण्य-अर्थमे चित्रशब्दका प्रयोग या चित्रप्रतीति
को कौन रोकता है ? क्योंकि अक्ष आदि पदोंके समान चित्रपद भी
अनेकार्थक है।
यदि कहो कि—नीलपीतादि जहां परस्परमे मिले भर हैं किन्तु
किसी द्रव्यकी उत्पत्ति नहीं हुई है, वहांपर भी कर्बुरपदका प्रयोग
तथा कर्बुरकी प्रतीति भी होती ही है—तो ठीक है, वहां द्रव्यान्तरकी
उत्पत्तिके भ्रमसे ही वैसा होता है। जैसे, धानकी राशिमें किसी
द्रव्यान्तरकी उत्पत्ति नहीं होनेपर भी उसमें स्थूलताका व्यवहार और
प्रतीति अन्य स्थूलद्रव्यकी उत्पत्तिके भ्रमसे हो जाती है। अर्थात् उक्त
स्थलमें कबुरप्रतीति भ्रमात्मक है, यथार्थ नहीं॥
परमाणुनिराकरणखण्डन
यदि कहो कि—उक्त प्रकारसे अवयवीका निराकरण न हो सकनेपर
भी परमाणु निराकरणसे ही अवयवी आदि सभी बाह्यपदार्थोंका खण्डन
हो जायगा। अर्थात् अवयवी तभी सिद्ध होगा, यदि उसका मूल कारण
परमाणु सिद्ध हो। किन्तु परमाणु ही असिद्ध है। क्योंकि अवयवीके
निर्माणार्थ परमाणुओंको परस्परमें संसृष्ट मानना पड़ेगा। ऐसी परिस्थिति
मे बहुत परमाणुओंसे सम्बद्ध होता हुआ एक परमाणु क्या प्रत्येकके
साथ अपने एक भागसे संयुक्त होता है ? अथवा सम्पूर्णरूपसे ? कारण,
१. कस्यचिदपि इति २ पु० पा०
२६६ आत्मतत्त्वविवेके
न प्रथमः, तस्यैकदेशाभावात्, भावे वा परमाणुत्वव्या-
घातात् । न द्वितीयः, परमाण्वन्तरेणासंसर्गप्रसङ्गात् । न ह्यस्ति
सम्भवः, एकत्रैव परिसमाप्तवृत्तिरन्यत्रापि वर्तत इति ।
न, बुद्ध्या समानयोगक्षेमत्वात् । तथाहि, बुद्धिरपि
सन्तमसन्तं वाऽनेकं विषयमालम्बमानाऽऽकारं वा बिभ्रती
कात्स्न्र्येन वा ? एकदेशेन वा ? न प्रथमः, पीतादिविषया-
कारविलोपप्रसङ्गात् । न ह्यस्ति सम्भवो नील एव विषय
आकारे वा परिसमाप्ताऽऽत्मा पीतादिसम्पृक्ताऽऽत्मा चेति ।
न द्वितीयः, तदभावात् । एवमनाकारत्वमविषयत्वं च
इन दोनों प्रकारोंसे अतिरिक्त तीसरा प्रकार नहीं हो सकता । इनमें
प्रथम पक्ष नहीं हो सकता है । क्योंकि परमाणुमें भाग होता ही नहीं
है । यदि उसमें भी भाग हो तो वह परमाणु ही नहीं हो सकता है ।
द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि एक परमाणुके साथ अपने
सम्पूर्णरूपसे संयुक्त हो चुकनेपर दूसरे परमाणुके साथ उसका संसर्ग
नहीं हो सकेगा । कारण, यह संभव नहीं है कि एक ही जगह जिसकी
वृत्ति (रहना) परिसमाप्त हो चुकी हो, वह दूसरी जगह भी रहे । अर्थात्
उक्त युक्तिसे परमाणु भी असिद्ध ही है और विज्ञानमात्र ही तत्त्व है—
तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि विज्ञानके समान ही इसका भी
योगक्षेम है । क्योंकि बुद्धि भी सत् या असत् अनेक विषयको अपना
आलम्बन बनाती हुई अथवा अनेक आकारको धारण करती हुई अपने
सम्पूर्णरूपसे वैसा करती है ? अथवा अपने एक भागसे ? यहां प्रथम
पक्ष नहीं हो सकता है । क्योंकि नीलावगाहिनी बुद्धि यदि सम्पूर्ण रूपसे
नीलालम्बन हो अथवा नीलाकारको धारण करे तो पीतादिविषयरूप
आकारोंका विलोप हो जायगा । कारण, यह कथमपि संभव नहीं
है कि नील आदि विषय या आकारमें बुद्धिका स्वरूप समाप्त भी हो
जाय तथा पीतादि विषयोंसे संपृक्त भी रहे ।
दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि बुद्धिके निरवयव होने-
से उसका एकदेश ही असंभव है । यदि कहो कि-उक्त प्रकारसे
[Header] बाह्यार्थभङ्गवादः २६७
बुद्धेरिष्यत एवेति चेत्, तत् किं यत् प्रतिभासते तदसत् ?
आहोस्वित् न प्रतिभासत एव किञ्चित् ? नाद्यः, असत्यपि
नीलपीतादौ ज्ञानवृत्तितद्विकल्पस्य तदवस्थत्वात् । नहि कृत्स्न-
मेव विज्ञानं नीलोल्लेिख, पीताद्यनुल्लेख¹ प्रसङ्गात् । नापि
तदेकदेशः, तदभावादित्युक्तत्वात् । न द्वितीयः, बाह्येऽपि
वृत्तितद्विकल्पस्यानुपपत्तेरिति ।
स्यादेतत्, निःशेषसमुदायी कृत्स्नशब्दस्यार्थः समुदाये
कश्चिदेव समुदाय्येकदेशपदार्थः, न च बुद्धिः समुदायस्वभावा,
बुद्धिमें आपादित आकारहीनत्व या विषयशून्यत्व इष्ट ही है—तो
बताओ कि बुद्धिमें जो भासित हुआ करता है, वह असत् है ? या
कुछ भासित ही नहीं होता है ? यहां प्रथम पक्ष नहीं हो सकता ।
क्योंकि नीलपीतादि विषय यदि असत् भी हों, तो भी उसके साथ
ज्ञानके सम्बन्धके बारेमे दिया गया उक्त विकल्प यथापूर्व ही रह
जाता है । कारण, सम्पूर्णरूपसे विज्ञान (बुद्धि) नीलविषयका उल्लेख
नहीं कर सकता है। क्योंकि विज्ञान नीलका भान करानेमें ही परि-
समाप्त रहेगा, अतः पीतादि विषयका भान नहीं हो सकेगा ।
यह भी नहीं हो सकता कि—विज्ञान अपने एक भागसे नीलको
भासित करे और दूसरे भागसे पीतादिको, क्योंकि निरवयव होनेसे उसमें
एक देश ही नहीं होता, यह कहा जा चुका है। विज्ञानमे कुछ
भासित ही नहीं होता, यह दूसरा पक्ष भी नहीं हो सकता है। क्योंकि
अवयवीरूप बाह्यके बारेमे भी पूर्वोक्त वृत्तिका विकल्प नहीं दे सकोगे ।
अर्थात् जब बाह्य वस्तु ही असिद्ध है तो 'वह सम्पूर्णरूपसे परमाणुमे
रहेगा या अपने एक अंशसे ? इस प्रकारका पूर्वमे दिया गया विकल्प ही
अनुपपन्न होगा ।
पूर्वपक्ष—अस्तु, कृत्स्नशब्दका अर्थ है "समुदायान्तर्गत सभी
समुदायी" तथा एकदेशपद का अर्थ है "समुदायान्तर्गत कोई एक ही
समुदायी"। प्रकृतमे बुद्धि तो समुदायरूप है, कारण, वह एकात्मक
१. नुल्लेखित्त्व इति ३ पु० पा०
२६८ आत्मतत्त्वविवेके
तस्या एकरूपत्वात्, तत्¹ कुतः कृत्स्नैकदेशविकल्पोत्थानम् ?
कथं तर्हि तद्विषयिणी तदाकारवती वा ? प्रकारान्तराभावा-
दिति यदि, तदा स्वरूपेणेति ब्रूम इति चेत्—स्फुटं निरटङ्कि
तार्किकनेदिकाविटङ्केन केवलमस्मभ्यमभ्यसूयता दूरहतेवेति ।
एतेन तदतद्देशत्वं निरस्तम् । तथाहि बुद्धेर्नीलाकारतां
परिच्छिन्ददध्यक्षं तदभावव्यवच्छेदमुखेन तदविनाभूतां पीता-
द्याकारतामपि व्यवच्छिन्द्यात् । तथा च कथमेका बुद्धिर्नील-
है। अत बुद्धिके सम्बन्धमें पूर्वोक्त प्रकारसे कृत्स्न (सम्पूर्ण) या
एकदेशका विकल्प कैसे उठ सकता है ?। यदि पूछो कि—कृत्स्न
या एकदेशके अतिरिक्त किसी तृतीय प्रकारके नहीं होने से इन दोनोंके
अभावमे बुद्धि नीलादिको अपना विषय कैसे बना सकेगी ? अथवा
वह नीलादि आकारवाली कैसे हो सकेगी ? तो यही कहूँगा कि
सम्पूर्ण या एकदेश विकल्पके बिना ही स्वरूपसे ही बुद्धि नीलादि
विषयिणी या नीलादि आकारवाली होगी।
उत्तरपक्ष—इस प्रकारसे बौद्ध यदि बुद्धिसम्बन्धी विकल्पका
समाधान करे तो निश्चय ही तार्किकोंके स्थानपर पहुँचा हुआ बौद्धधूर्तने
हमारे साथ केवल असूयावश दूर जाकर अर्थात् अपने ऊपर आये दोषके
निराकरणके अवसरपर यह बात कही। अर्थात् हमारा अवयवी भी
कृत्स्न या एकदेश विकल्पके बिना ही स्वरूपसे ही अवयवोंमें रहेगा, इस
बातको पहले नहीं समझते हुए बहुत बाद तब समझा, जबकि उसकी
बुद्धिके बारेमें भी यही कृत्स्न या एकदेशका विकल्प नैयायिकोंकी
ओरसे उपस्थित किया गया।
इससे (पूर्वोक्त बुद्धिरूप प्रतिवन्दिके द्वारा) परमाणु तथा अवयवीमें
भी तद्देशत्व और अतद्देशत्वका विरोध खण्डित हो गया। क्योंकि
एकदेशमें सम्बद्ध परमाणु और अवयवीका देशान्तरमें सम्बन्ध होनेमे
यदि विरोध हो तो बुद्धिमे नीलाकारताका अनुभव करानेवाला प्रत्यक्ष
उसके नीलाभावाकारताके निषेधद्वारा नीलाभावसे नियत सम्बद्ध
१. तदेतत् इति २ पु० पा०
बाह्यार्थभङ्गवादः २६९
पीताद्याकारा स्यादिति तुल्योऽनुयोगः ।
भवेदेवं यदि नीलाद्याकारतायाः पीताद्याकारत्वाविना-
भावः स्यात्, स एव तु कुतः ? नीलपीताद्याकाराया बुद्धे-
रैकात्म्येनैव निश्चयात् । प्रत्याकारनियतत्वे चित्रप्रतिपत्तेरप्य-
नुपपत्तिरिति चेत्, तदेतत् तुल्यं परमाण्ववयव्यादिष्वपि । न
हि तत्राप्यनेकपरमाणुसंसृष्टस्य परमाणोरनेकावयवसंसृष्टस्या-
वयविनो वा नैकात्मताऽनुभूयते, तथात्वे वा एकस्यानेकसंसर्ग-
प्रतिपत्तिः कदापि न स्यादिति तुल्यैवार्थगतिः । वाचि वैचित्र्यं
तु क्वोपयुज्यत इति ।
पीताद्याकारताको भी बुद्धिमें नहीं होने देगा । ऐसी परिस्थितिमें एक
बुद्धि नील-पीत आदि अनेक आकारवाली कैसे हो सकेगी ? इस प्रकार
परमाणु और अवयवीके ऊपर दिया गया दोष तुल्यरूपसे आपकी बुद्धि
पर भी आ ही जाता है।
यदि कहो कि- बुद्धिमें यह दोष तब आता यदि बुद्धि प्रत्येक आकार-
के साथ अलग अलग नियत रहती तथा नीलाकारताका पीताकारताके
अभावके साथ नियत सम्बन्ध रहता। किन्तु उक्त दोनों ही बातें यहाँ कहाँ
हैं ? क्योंकि नीलपीत आदि अनेक आकारको एकसाथ धारण करनेवाली
बुद्धिमें नील-पीतके भिन्न होनेसे भिन्नता नहीं मानते किन्तु उसमें एका-
त्मता (एकरूपता) ही मानते हैं। कारण, नीलपीत आदि प्रत्येक आकार
के साथ अलग अलग यदि बुद्धिको नियत माना जाय तो चित्राकार
प्रतीति ही नहीं हो सकेगी-तो यह बात परमाणु और अवयवीमे भी समान
ही है । क्योंकि वहाँ भी अनेक परमाणुओंसे संयुक्त परमाणुमें या अनेक
अवयवोंमें आश्रित अवयवीमे एकात्मताका अनुभव न होता हो ऐसी
बात नहीं है । यदि उक्त स्थलोंपर परमाणु और अवयवीमें एकात्मताका
अनुभव न हो तो एकमें अनेकके साथ संसर्गकी प्रतीति कभी न हो सकेगी।
अर्थात् एक सपक्षमें साध्य-साधनरूप अनेकका संसर्ग (सामानाधिकरण्य)
भी न हो सकेगा तथा अनुमानमात्रका उच्छेद हो जायगा । इस प्रकार
बुद्धि और परमाणु तथा अवयवी आदिकी समान ही गति है । केवल
२७० आत्मतत्त्वविवेके
संयोगव्यवस्थापनेनैव षट्केन युगपद्योगात् दिग्देशभेदा-
च्छायावृतिभ्यामित्यादयो निरस्ताः।
कथनमें ही वैचित्र्य है, जिसका कोई उपयोग नहीं है। अर्थात् कथन
मात्र की विचित्रतासे दोनोंकी तुल्यगति होनेमे कोई बाधा नहीं है।
बुद्धिके समान परमाणुका भी स्वरूपसे ही अनेक परमाणुओंके
साथ संयोगकी व्यवस्था कर देनेसे ही—
'षट्केन युगपद्योगात् परमाणोः षडंशता।
दिग्देशभेदश्छायावृतिभ्यां चापि चांशता" ॥
इस कारिकाके अनुसार बौद्धोंद्वारा उपस्थित किये गये परमाणुबाधक
प्रमाण भी खण्डित हो जाते हैं१।
१ एक परमाणुका अपने पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊपर तथा नीचे
रहने वाले छै परमाणुओंके साथ एकसाथ ही संयोग होनेसे उस परमाणु-
में छ भाग सिद्ध होते हैं। एव यह पूर्वीय परमाणु है, यह पश्चिमीय
परमाणु है इस प्रकारका दिग्देशका भेद भी परमाणुको सावयव सिद्ध
करता है। क्योकि सर्वत्र सावयव घटपटादिमे ही पूर्वीय पश्चिमीय
आदिका व्यवहार होता है। एव परमाणुके मूर्तिमान होनेसे उसके
द्वारा छाया तथा आवरण अवश्य पैदा होंगे, इसलिये भी परमाणु
सावयव सिद्ध होता है। क्योकि लोकमें सावयव द्रव्य ही छाया और
आवरण पैदा करते हैं। अत इन पूर्वोक्त हेतुओसे परमाणुको भी
अवयव होना सिद्ध होता है।
किन्तु बौद्धद्वारा दी गयीं यह परमाणुबाधक युक्तियाँ ठीक
नहीं हैं। क्योकि परमाणुका संयोग अनेक परमाणुओंके साथ नहीं
होता किन्तु परमाणुके इर्दगिर्द अनेक दिशाओके साथ ही होता है। अत
अनेक संयोगके आधारपर परमाणुके सावयव होनेका कोई प्रश्न ही
नहीं है। एव पूर्वीय पश्चिमीय आदि व्यवहार भी दिशाभेदोंके कारण
होता है न कि परमाणुके सावयव होनेके कारण। क्योंकि किसी बडे
दण्ड आदिमे, उसके सावयव होनेपर भी उसके मध्यभागकी अपेक्षा करके,
पूर्वीय पश्चिमीय आदि व्यवहार नहीं होते हैं। इसी प्रकार परमाणु
द्वारा छाया और आवरणका होना भी उसके सावयव होनेसे नहीं किन्तु
बाह्यार्थभङ्गवादः २७१
परमाणुसिद्धयसिद्धिभ्यामेव मूर्तत्वादयो निरवकाशिताः।
आकाशव्यतिभेदादयस्त्वसम्भाविता एव ।
सर्वत्र चात्र हेतुदशायां प्रतिज्ञापदयोर्व्याघातः, कालात्य-
नैयायिकाभिमत परमाणुको भी सावयव सिद्ध करनेवाले मूर्तत्व
आदि हेतु भी परमाणुकी सिद्धि या असिद्धि दोनों ही स्थितियोंमे अनु-
पयुक्त हैं। अर्थात् "परमाणवः सावयवा, मूर्तत्वात्, रूपवत्त्वात्,
स्पर्शवत्त्वात्-घटादिवत्' इस अनुमानद्वारा परमाणुको भी सावयव
सिद्ध करनेका यही अभिप्राय है कि निरवयवात्मक परमाणु होता ही
नहीं है। किन्तु यदि परमाणु असिद्ध है, तो उक्त अनुमानका पक्ष ही
असिद्ध हो गया। अतः आश्रयासिद्धिरूप दोषसे ग्रस्त होनेके
कारण मूर्तत्वादि हेतु सावयवत्वके साधक नहीं हो सकते। और यदि
आश्रयासिद्धिदोषसे बचनेके लिये परमाणुको पक्षरूपमे सिद्ध माना
जाय तो लाघव तथा अनवस्थाप्रसङ्गरूप तर्कोंके आधारपर वह निरवयव
भी सिद्ध हो जाता है।
परमाणुके भीतर आकाशका सम्बन्ध मानते हुए परमाणुको सावयव
सिद्ध करना तो अत्यन्त असम्भव है। अर्थात् "परमाणुके भीतर
आकाश है? या नहीं? यदि है तो परमाणु सावयव सिद्ध हो
गया। यदि नहीं है तो आकाशकी व्यापकता खण्डित हो जाती है।"
यह आक्षेप तो बिलकुल असम्भव है। क्योंकि परमाणुके निरवयव
होनेसे उसमें अभ्यन्तर होता ही नहीं, अतः उसके भीतर आकाश कैसे
रह सकता है? इससे आकाशकी व्यापकतामे भी कोई क्षति नहीं आती
है। क्योंकि 'सर्वमूर्तसंयोगित्वं व्यापकत्वम्' इस लक्षणके अनुसार
सभी मूर्त द्रव्योंके साथ संयोग होनेके कारण आकाश व्यापक कहाता
है। परमाणुमें मध्यभाग नहीं होनेपर भी उसके साथ आकाशका
संयोग है ही।
एवं, पूर्वोक्त सभी अनुमानोंकी दशामें "परमाणुः सावयव" इस
प्रतिज्ञावाक्यान्तर्गत परमाणुपद और सावयवपदमे परस्पर विरोध हो
मूर्त होनेके कारण ही है। अतः उक्त हेतु परमाणुको सावयव सिद्ध
करनेमे सर्वथा असमर्थ हैं।
२७२ आत्मतत्त्वविवेके
यापदेशश्च । प्रसङ्गदशायामाश्रयासिद्धिर्व्याप्यसिद्धिश्च दृष्टा-
न्तासिद्धेः । अनवस्थालक्षणविपरीततर्कस्य तदुपष्टम्भकतया
त्रुटेरप्रमेयत्वप्रसङ्गस्य च विद्यमानत्वात् ।
न च प्रलयः परमाणोः, असत्त्वसाधकस्य प्रमाणस्याभा-
वात्, सावयवत्वापादकानां च हेतूनामनवस्थोत्थापकत्वा-
जाता है। क्योंकि यदि परमाणु है तो उसे सावयव कहना विरुद्ध होगा,
और सावयव हो तो उसे परमाणुरूपसे नहीं कहा जा सकता है। तथा
उक्त अनुमानोंमें कालात्ययापदेश (बाध) दोष भी है। क्योंकि पक्षके
रूपमे परमाणुको मानना आवश्यक होगा। अतः धर्मिग्राहक मानके
बलसे ही उसका निरवयवत्व भी सिद्ध ही है। इसलिये सावयवत्व सिद्ध
करनेवाला अनुमान बाधित है !
एवं प्रसङ्गदशामें आश्रयासिद्धि और व्याप्यसिद्धि भी होगी।
अर्थात् यह प्रसङ्ग (आपत्ति) दो कि "यदि परमाणु निरवयव हो तो
मूर्त नहीं होगा, अनेक परमाणुओंसे एक साथ सयुक्त नहीं हो सकेगा
तथा उसकी छाया नहीं हो सकेगी या आवरण नहीं कर सकेगा
इत्यादि' तो यहाँ परमाणुरूप आश्रयके नहीं माननेपर उक्त प्रकारके
प्रसङ्ग आश्रयासिद्धिदोषसे ग्रस्त हो जाते हैं। एवं दृष्टान्तके सिद्ध
न हो सकनेसे व्याप्तिकी भी असिद्धि है। अर्थात् विज्ञानवादीके
मतानुसार परमाणुकी असिद्धिके साथ साथ सभी बाह्य वस्तु भी असिद्ध
है, फिर सावयव वस्तुके रूपमें कोई अन्वयी दृष्टान्त तथा निरवयव
वस्तुके रूपमें कोई व्यतिरेकी दृष्टान्त क्या होगा ? और दृष्टान्त के
अभावमे व्याप्तिका ज्ञान कहाँ हो सकेगा ?
एवं अनवस्थालक्षण प्रतिकूल तर्कके सहारे त्रसरेणुमें भी अनन्त
अवयवकी सिद्धि हो जानेसे त्रसरेणु और मेरु पर्वत दोनों समान
परिमाणवाले हो जायेंगे तथा मेरुके समान त्रसरेणु भी अमेय अर्थात्
मापके बाहर हो जायेंगे।
यह भी नहीं कह सकते कि—अवयवधाराकी विश्रान्ति मेरुसर्षपके
साम्यप्रसङ्गरूप दोषके कारण, निरवधि भले ही न हो, किन्तु परमाणुमे
भी उसकी अन्तिम विश्रान्ति नहीं हो सकती है, तथा परमाणुका विनाश
बाह्यार्थभङ्गवादः २७३
दिति । तदन्य एवायं परमाणू रक्तबीजो यस्य भागा¹
युक्तिचामुण्डोदरमपि भित्त्वा निष्पतन्तीति ।
न च कल्पिताश्रयाः कल्पितप्रतिबन्धाश्च प्रसङ्गा भविष्य-
न्तीति युक्तम्, इ(स्वे)च्छाकल्पितेन व्यवहारेण सर्वविधिनिषेध-
ही अवयवधाराको अन्तिम अवधि है । इस प्रकार परमाणुके विनाशी
होनेसे भी नैयायिकोंका अभिमत नित्य परमाणु नहीं सिद्ध हो सकेगा—
कारण, परमाणुका विनाश सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण नहीं है । क्योंकि
ध्वंसके प्रति समवायिकारण और असमवायिकारणका नाश निमित्त होता
है । यहाँ परमाणुका कोई समवायिकारण ही नहीं होता, जिसके नाशसे
परमाणुका नाश हो जाय । समवायिकारण नहीं होनेसे तत्सम्बन्धरूप
असमवायिकारण भी सुतरां नहीं हो सकता । अतः असमवायिकारणके
नाशद्वारा भी परमाणुका नाश नहीं हो सकता । इसलिये नित्य परमाणु
के होनेमे कोई बाधा नहीं है ।
यदि कहो कि—मूर्तत्त्व आदि हेतुओंके द्वारा परमाणु सावयव सिद्ध
होगा तथा सावयव होनेके कारण परमाणुमे विनाशित्व सिद्ध हो
जायगा—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि सावयवत्वको सिद्ध करने
वाले हेतु अनवस्थाके उत्थापक हो जाते हैं । अर्थात् मूर्तत्त्व आदि हेतु
अनवस्थितरूपसे परमाणुमे अनन्त अवयवकी धारा सिद्ध करेंगे न कि
परमाणुका विनाश । इस प्रकार यह एक विलक्षण ही परमाणुरूपी रक्त-
बीज है, जो तुम्हारी युक्तिरूपी चामुण्डाके उदरका भी भेदन करके पुनः
परमाणुरूपमे निकल पड़ता है ; अर्थात् चामुण्डादेवीके द्वारा रक्तबीज
नामक असुरके निगल लिये जानेपर भी पुनः नहीं पैदा हो सका । किन्तु
यह परमाणुरूपी रक्तबीज तो उससे बढ़कर है, जिसका खण्डन करनेके
लिये तुम्हारी युक्तियाँ जैसे-जैसे सावयवत्त्व सिद्ध करती हैं, वैसे-वैसे
उन युक्तियोंद्वारा सिद्ध किया हुआ अवयव ही परमाणु बन बैठता है ।
यहाँ यह कहना भी उचित नहीं है कि—असत्ख्यातिसे उपनीत
काल्पनिक परमाणु ही उक्त प्रसङ्गोंमें आश्रय होगा तथा काल्पनिक बाह्य
पदार्थ ही उक्त प्रसङ्गोंमें अन्वयी एवं व्यतिरेकी दृष्टान्त होंगे । इसलिये
१. भेदा इति २ पु० पा० ।
२७४ आत्मतत्त्वविवेके
व्यवहारविलोपे¹ प्रसङ्गात् । लोकव्यवस्थापेक्षणे तु तद्वि-
रोधेनोत्तरस्य निषेध (क) स्यात्मलाभाभावादित्यसकृदावे-
दितत्वात् ।
अन्यथा सर्वमेतद् बुद्ध्यापि समानम् । सापि हि षट्केन
युगपद्योगादिभिः सावयवा प्रसज्येत । तस्यामसिद्धास्त इति
चेन्न, अनुमानसिद्धत्वात् ।
तथाहि, बुद्धिः षट्केन युगपद्योगिनी मूर्त्तिमती च,
आश्रयासिद्धि या व्याप्त्यसिद्धि दोष नहीं आ सकता है—क्योंकि अपनी
इच्छाद्वारा कल्पित मनमाने अनुमानव्यवहारसे तो सभी विधि तथा
निषेधव्यवहारोंका लोप होने लग जायगा।
यदि कहो कि—विधिनिषेधव्यवहारका भी आधार लौकिक व्यवस्था
है, अतः वास्तविकता नहीं होनेपर भी लोकव्यवस्थासे नियन्त्रित होनेके
कारण विधि-निषेधव्यवहारोंमें कोई गड़बड़ी नहीं होगी—तब तो लौकिक
व्यवस्थासे विरुद्ध होनेके कारण परमाणु अवयवी आदि बाह्यवस्तुओंका
भी निषेध नहीं हो सकेगा, यह बात अनेक बार बता दी जा चुकी है।
अन्यथा अर्थात् लोकव्यवस्थाकी उपेक्षा करते हुए यदि बाह्यवस्तुओंका
निषेध करो तो उक्त सभी प्रसङ्ग तुम्हारी बुद्धि (विज्ञान) के बारेमे भी
समानरूपसे दिये जा सकते हैं। क्योंकि वह भी "षट्केन युगपद्-
योगात्" इत्यादि हेतुओंसे परमाणुके समान ही सावयव होने लगेगी।
यदि कहो कि—उक्त हेतु बुद्धिमे असिद्ध (स्वरूपासिद्ध) हैं—
तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि अनुमानद्वारा वे बुद्धिमे सिद्ध हैं।
जैसे "बुद्धि छः के साथ एक साथ सम्बद्ध है तथा मूर्त्तिमती भी है,
क्योंकि उसमे सत्ता है या वह व्यवहारका विषय है, जैसे, बोध्यपदार्थ"
इस प्रकारका अनुमान किया जा सकता है।
यदि कहो कि—बुद्धिरूप धर्मीका ग्रहण करानेवाला जो प्रमाण है,
वही बुद्धिकी सिद्धिके साथ साथ उसके षट्कयोगित्व और मूर्त्तिमत्त्वके
१. व्यवहारविलोपे इति ३ पुस्तके नास्ति ।
बाह्यार्थभङ्गवादः २७५
सत्त्वाद् व्यवहर्त्तव्यत्वाद् वा, बोधयदिति शक्यते । विपर्य्य-
स्यापि धर्मिग्राहकमRoot/man? मानसाधितत्वादनवकाशमिदमिति चेत्, एव-
मन्यत्रापि प्रतिसन्दधीथा इत्येषा दिक् ॥
अन्यस्तु चक्षुषी निमील्य निर्भयोभवितुमिच्छन्नाह—अस्तु
तर्हि बुद्धेरपि विलोप इति ।
अत्र तु किं वक्तव्यं यत्र हेत्वादि व्यवहारो नास्ति ।
अस्तु, परं सांवृत इति चेत् , भवेदेयं यदि संवृतिरपि परमार्थ-
अभावकी भी सिद्धि करा देगा । अतः बुद्धिमें षट्कसम्बन्ध और
मूर्त्तिमत्ताका यह अनुमान निरुपयोगी होगा—तो इसी प्रकार परमाणु और
अवयवीके बारेमे भी समझो । अर्थात् धर्मिग्राहक मानसे परमाणु
सिद्ध है । क्योंकि परमाणुरूप धर्मी न हो तो तुम सावयवत्वका अनुमान
किस पक्षमें कर सकोगे । इसी प्रकार परमाणुका निरवयवत्व भी लाघव
और अनवस्थाप्रसङ्गरूप तर्कके
२७६ आत्मतत्त्वविवेके
सती स्यात् । अन्यथा तु यथा न वास्तवस्तथा न सांवृतोऽपि ।
संवृतिरपि संवृतिसतीति चेत्, अस्यास्सत्त्वे न किञ्चिदधिक-
मुक्तम् । परसंवृतेस्तु परमार्थसत्त्वस्वीकारे सैव बुद्धिरपरिहे-
येति । सती च बाधकवती चेति संवृतिसती चेति चेत्, सत्येव
यदि तत् कथं बाधकम् ? तथा चेत्, कथं तदलीढस्य
सत्त्वमिति ?
दृश्यते तावदेव मिति चेत्, सत्त्वैकार्थसमवायिनो बाध-
कत्वमेव तर्हि हेयम् । बाधकैकार्थसमवायिनः सत्त्वमेव किं न
है—तो हेत्वादिव्यवहारका संवृतत्व भी तभी सम्भव है, जब कि
संवृति भी स्वयं परमार्थ सत् हो। ऐसा नहीं होनेपर हेत्वादि व्यवहार
जैसे वास्तव नहीं है, वैसे संवृत भी नहीं हो सकेगा। यदि कहो कि—
संवृति भी परमार्थ सत् न होकर संवृत सत् ही है—तो यह दूसरी
संवृति भी यदि सत् हो तो उसीसे शून्यवाद खण्डित हो गया। इस
दूसरी संवृत्तिके भी असत् होनेपर तो कोई नयी बात नहीं कही गयी।
अर्थात् हेत्वादिव्यवहारके समान संवृत्तिका भी संवृतत्व नहीं सिद्ध हो
सकेगा। अन्तिम संवृत्तिको यदि परमार्थसत् स्वीकार करो तो उसी
(संवृत्तिरूप) बुद्धिके पारमार्थिक होनेसे सर्वशून्यत्व फिर भी नहीं
सिद्ध हो सका।
यदि कहो कि—अन्तिम संवृति भी सत् है, किन्तु बाधकयुक्त होनेसे
बाधित है, तथा परमार्थ सत् न होकर संवृत सत् है—तो यदि वह
सत् है तो उसका बाधक कैसे होगा ? क्योंकि सत् अबाध्य होता
है। यदि उसका बाधक हो तो बाधकाक्रान्त होनेके कारण वह सत्
कैसे होगी ?
यदि कहो कि—सत्त्व और बाधक दोनों ही साथ साथ देखे जाते
हैं, इसलिये दोनोंमें एक भी निश्चयात्मक नहीं हो सकता। अर्थात्
दोनों ही मेरे मतानुसार सांवृतिक (काल्पनिक) हैं—तो सत्त्वके साथ
रहनेके कारण उसका बाधकत्व ही छोड़ देना पड़ेगा। अर्थात् वह
बाधक ही नहीं होगा जो सत्त्वके साथ रहे। यदि कहो कि—बाधकके
हीयत इति चेत्, न बाधकस्यापि त्यागप्रसङ्गात् । उभमप्य-
वर्जनीयमेव तर्हि, एवमेतत् । मिथो विरोधस्तु हेयः । न हि
विरुद्धयोरेकार्थसमवायस्तथाभूतयोर्वा विरोधः शक्य उपपाद-
यितुमृते स्वसमयात् । न च विचारावसरे स्वसमयावतार
इति । यथा यथा च बुद्धिनिवारणाय यत्नस्तथा तथोज्ज्वलः
प्रकाशः, तन्निवारणमपि बोद्धव्यमेवेति । तदेतदायातम्, प्रदी-
साथ रहनेके कारण सत्त्वका ही त्याग क्यों न कर दिया जाय—तो
ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि शून्यवादके अनुसार सबकी सत्ताका
त्याग कर देनेपर बाधकका भी त्याग कर देना पड़ेगा । ऐसी स्थितिमे
बाधकके नहीं रहनेसे सर्वशून्यत्व कैसे सिद्ध हो सकेगा ?
तब यह कहना कि सत्त्व और बाधक दोनोंमे किसीका परित्याग
न किया जाय, बल्कि दोनों ही मान लिये जाँय—तो ऐसा हो, किन्तु
इन दोनोंमें पारस्परिक विरोधका मानना छोड देना पड़ेगा । क्योंकि
परस्पर विरुद्धोंकी एकत्र स्थिति युक्तिद्वारा सिद्ध नहीं की जा सकती,
ऐसे ही एकत्र रहनेवालोंमें परस्पर विरोध भी युक्ति-सह्य नहीं हो
सकता, बिना इसके कि अपनी परिभाषाका आश्रय लिया जाय । अर्थात्
उक्त बात बौद्ध अपनी मनगढन्त परिभाषाके बलसे ही मान सकता है,
युक्तिद्वारा सिद्ध नहीं कर सकता । किन्तु यह भी ध्यान रखना है
कि प्रतिवादीके साथ विचारके अवसरपर मनगढन्त परिभाषा काम नहीं
देती है । इस प्रकार शून्यवादका आश्रय लेकर जैसे-जैसे बुद्धिका भी
लोपकर देनेके लिये यत्न करते हो, वैसे-वैसे और उज्ज्वल प्रकाश होता
जाता है । अर्थात् बुद्धिकी सिद्धि होती ही जाती है । क्योंकि
बुद्धिनिराकरण भी बाधकज्ञानाधीन है । इसलिये बाधकज्ञानकी सत्ता
स्वीकार करनी पड़ेगी । अथवा बुद्धिनिराकरणको भी असत् होनेसे
ज्ञानरूप ही मानोगे । अतः बाध्य होकर ज्ञानकी सत्ता माननी
ही पड़ेगी ।
इस प्रकार आपका बुद्धिविलोपका प्रयास ऐसा ही हुआ, जैसे
कोई दूसरे प्रदीपके द्वारा पूर्वप्रदीपको बुझाकर अन्धकार लानेकी चेष्टा
करे । वहाँ जैसे-जैसे पूर्वप्रकाशको नष्टकर देनेके विचारसे दूसरा
२७८ आत्मतत्त्वविवेके
पान्तरेण प्रदीपं निर्वाप्य तिमिरापादनमिति ।
एतेन हेतुफलभावानुपपत्तेः सर्वविलोपि इति निरस्तम् ।
तन्निराकरणप्रयासस्य साफल्यवैकल्याभ्यां तन्निराकरणानुप-
पत्तः, सत्कार्यदूषणस्येष्टत्वात्, असत्कार्यदूषणस्य च प्रत्यक्षा-
दूसरा प्रदीप लाता जायगा, वैसे-वैसे और उज्ज्वल प्रकाश होता
जायगा, अन्धकार लाना तो दूर रहा । यही स्थिति बुद्धिनिराकरण-
की भी है ।
इस बुद्धिनिराकरणकी व्यवस्थाके अनुसार यह कथन भी खण्डित
हो गया कि—हेतुफलभाव (कार्यकारणभाव) के अनुपपन्न होनेसे सर्व-
विलोप (सर्वशून्यत्व) सिद्ध हो जायगा । अर्थात् कार्यकारणभाव
यदि प्रामाणिक हो तो अवयविरूप कार्य तथा उसके मूलकारणभूत
परमाणुकी सिद्धि हो सके । किन्तु कार्यकारणभाव ही अयुक्त है ।
इस लिये अवयवी तथा परमाणु आदिकी सत्ता तथा कारणके अधीन
होनेवाली बुद्धिकी भी सत्ता काल्पनिक ही होगी । इस प्रकार सर्व-
विलोप सुतरा सिद्ध है—क्योंकि आपका हेतुफलभावनिराकरणका प्रयास
सफल है या निष्फल है ? यदि सफल है तो इससे हेतुफलभाव सिद्ध
हो गया । यदि आपका उक्त प्रयास निष्फल है तो निष्फल होनेसे ही
वह हेतुफलभावका निराकरण नहीं कर सकेगा ।
कार्यकारणभावके दूषणसे यदि आपका अभिप्राय यह हो कि—
घटादिकार्य सत् है, इसीलिये उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती—तो यह
मुझे इष्ट ही है । क्योंकि सत्कार्यकी उत्पत्ति मैं भी नहीं मानता ।
यदि आपका यह अभिप्राय हो कि—असत् कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो
सकती—तो यह कथन प्रत्यक्षबाधित है । क्योंकि घटोत्पत्तिके पूर्व
घटकी उपलब्धि किसे होती है ? अर्थात् उत्पत्तिके पूर्व घट असत् ही
रहता है और उत्पन्न होकर सत् बनता है ।
एव, “घटो नोत्पद्यतेऽसत्त्वात्” इस दूषणका प्रतिपादन तथा तुम्हारे
द्वारा किया जानेवाला कार्यकारणभावनिराकरणका प्रतिपादन यदि पूर्वमें
असत् होकर बादमें उत्पन्न हुआ है तो “असत्की उत्पत्ति नहीं हो
बाह्यार्थभङ्गवादः [२७९]
धितत्वात्, तत्प्रतिपादनस्यासत एवोत्पत्ताद्यनैकान्तिकत्वात्,
सत्त्वे वा प्रयास वै¹फल्यादिति ।
स्यादेतत्, मा भूवन्नेतानि दूषणान्यवयविनि², अनुपलं-
म्भस्तु स्यात्, न हि परमाणुसञ्चयादपरं किञ्चिदुपलभ्यत इति
चेत्, बैलक्ष्यविटम्बिकेयम्³, स्थूलैकानुभवस्य सर्वजनसिद्ध-
त्वात् ।
विकल्पमात्रं तदिति चेन्न, स्पष्टप्रतिभासत्वात् । औपा-
धिकमस्य स्पष्टत्वमिति चेत्, तथाभूतानुभवमन्तरेणोपाधेरप्य-
सकती है" यह तुम्हारा नियम यहीं व्यभिचरित हो गया । यदि तो
उक्तदूषण तथा हेतुफलभावनिराकरणका प्रतिपादन भी पूर्वसे ही सत् है
तो इस समय प्रतिपादनका तुम्हारा प्रयास व्यर्थ ही है ।
अवयवीके सम्बन्धमें अनुपलम्भका निराकरण ।
**शङ्का—**अस्तु, अवयवीका खण्डन करनेके लिये दिये गये दूषण भले
ही न हों, किन्तु अनुपलम्भ तो दूषण हो सकता है । क्योंकि परमाणु-
समूहसे भिन्न अवयवी नामकी कोई वस्तु उपलब्ध नहीं होती है ।
**समाधान—**उक्त कथन भी युक्तिके अभावमें पराजयसे उत्पन्न
लज्जाका ही विजृम्भण है । क्योंकि स्थूलात्मक एक वस्तुका अनुभव
सर्वजनसिद्ध है । अर्थात् "इदं स्थूलम्” इस प्रत्यक्षसे ही अवयवीकी
उपलब्धि सबको होती है । क्योंकि घटादिको अवयवी न मानकर
परमाणुका पुञ्ज माना जाय तो परमाणुओंके अनेक होनेसे “एकम्”
तथा अणुरूप होनेसे ‘स्थूलम्” ये दोनों ही व्यवहार नहीं हो सकते ।
अतः इस प्रत्यक्ष व्यवहारसे ही अवयवी की उपलब्धि माननी होगी ।
यदि कहो कि-“एक स्थूलम्” यह प्रतीति अनुभवरूप (निर्विकल्पक)
नहीं है, किन्तु सविकल्पात्मक है, अतः प्रमाण नहीं है । क्योंकि
बौद्धनयानुसार निर्विकल्पात्मक ज्ञान ही अनुभव होता है और
१. वैयर्थ्यादिति ३ पु० पा० २. बाधकान्यवयविनि इति १ पु० पा०
३. विजृम्भिकेयम् इति १ पु० पा०
२८० आत्मतत्त्वविवेके
भावात् । अन्यथा नीलादिविकल्पानामपि तथैव स्पष्टत्वोप-
पत्तौ सर्वप्रत्यक्षोच्छेदप्रसङ्गात्, गृहीतनिश्चित एवार्थे प्रत्यक्ष-
˚प्रामाण्यात्, निश्चयोपप्लवे तस्याप्युपप्लवादिति ।
न च परमाणव एव स्थूला१, तद्व्याघातात् । न च
प्रमाण होता है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि उक्त प्रतीति
साक्षात्कारात्मक है, अतः अवश्य अनुभवरूप होगी और प्रमाण होगी ।
यदि कहो कि—उक्त प्रतीति स्वयं साक्षात्कारात्मक नहीं है किन्तु
उपाधिकृत उसकी साक्षात्कारात्मकता है अतः वह प्रमाण नहीं हो
सकती—तो यहाँ उस प्रतीतिके समानाकार निर्विकल्पात्मक अनुभवके
सिवाय दूसरी उपाधि भी नहीं हो सकती है । अर्थात् “एक स्थूलम्’
इस सविकल्पक ज्ञानके साक्षात्कारात्मक होनेमे उसका मूलभूत समाना-
कार निर्विकल्पक अनुभव ही उपाधि है । ऐसी अवस्थामे यदि उक्त
सविकल्पक प्रतीतिको अवयवीकी सिद्धिमें प्रमाण न भी मानो तो भी
उपाधिभूत उस निर्विकल्पक अनुभवसे ही एक स्थूल अवयवीकी सिद्धि
हो जायगी । अन्यथा नीलादिप्रतीतियोँकी भी साक्षात्कारात्मकता इसी
प्रकार उपाधिकृत हो जायगी और वे प्रमाण न हो सकेंगी । इस प्रकार
सभी प्रत्यक्षोंकी प्रामाणिकता उच्छिन्न हो जायगी और प्रत्यक्षके प्रति
लोगोंकी आस्था ही उठ जायगी ।
एवं, निर्विकल्पकद्वारा गृहीत तथा सविकल्पकद्वारा निश्चित किये
गये विषयमे ही प्रत्यक्षकी प्रमाणता है । अतः सविकल्पकके अप्रामाणिक
होनेपर निर्विकल्पक भी आस्थाके योग्य नहीं रह सकेगा । क्योंकि
निर्विकल्पकज्ञानके अतीन्द्रिय होनेसे सविकल्पक ज्ञान ही उसके प्रामाण्य
का तथा उसकी नियत विषयताका उपपादक है ।
यह नहीं कह सकते कि—स्थूलताप्रतीतिके विषय परमाणु ही हैं न
कि कोई अवयवी—क्योंकि परमाणुको यदि स्थूल माना जाय तो उसका
परमाणुत्व ही खण्डित हो जायगा । अर्थात् वह परमाणु (परम = अणु)
नहीं कहा जा सकेगा ।
१. प्रत्यक्षस्य इति १ पु० पा०
तत्समुदायस्तथा, तस्य समुदितस्थानस्य त्वयाऽनभ्युपगमात्,
अभ्युपगमे वाऽवयविना किमपराद्धम् । न च समुदिता एव
तथा प्रतिभासितुमर्हन्ति, तेषां १ प्रत्येकमस्थूलत्वात् । न च
नानादिग्देशव्यापितैव स्थौल्यम्, परमाणुषु प्रत्येकमसम्भ-
वात् । न च नानात्वैकार्थसमवायिन्येव सा स्थौल्यमिति
साम्प्रतम्, स्थूल एक इति प्रत्ययनियमात् ।
यह भी नहीं हो सकता कि—परमाणुओंके समुदायमें ही स्थूलताका
व्यवहार होता है, क्योंकि समुदित परमाणु ही हैं स्थान (आश्रय)
जिसका, ऐसे समुदायको तुम मानते ही नहीं हो। यदि मानो तो
अवयवीने क्या अपराध किया है कि वैसे ही अनेक परमाणुरूप
अवयवोंमें आश्रित उसे (अवयवीको) नहीं मानते। अर्थात् उक्त
प्रकारका समुदाय ही तो अवयवी है।
यह नहीं कह सकते कि—समुदित परमाणु ही स्थूलरूपसे भासित
होते हैं—क्योंकि वे प्रत्येक परमाणु अस्थूल हैं। वहा यह नहीं कह
सकते कि—स्थूलता कोई परिमाणविशेष नहीं है, जो अवयवीमें या
समुदायमे रहता हो, किन्तु नानादिग्देशमे व्याप्त रहना ही स्थूलता है।
अर्थात् नाना दिग्देशमे सम्बद्ध परमाणुओंमे भी स्थूलताका व्यवहार हो
सकता है—क्योंकि परमाणुओंमे कोई भी परमाणु ऐसा नहीं है, जो नाना
दिग्देशमे व्याप्त हो सके। यह भी कहना युक्त नहीं है कि—प्रत्येक
परमाणुके नाना दिग्देशव्यापी न हो सकनेपर भी परस्परमे सटकर अव-
स्थित नाना परमाणु तो नानादिग्देशव्यापी हो ही सकते हैं। अर्थात् उक्त
रूपमे अवस्थित नाना परमाणुओंके लिये ही स्थूलता की प्रतीति होती है—
क्योंकि “एक स्थूल” यही प्रतीति होती है। अर्थात् उक्तरूपमें अवस्थित
नाना परमाणुओंमे स्थूलता मानो तो उसे “एकः” कहना असङ्गत होगा।
तात्पर्य यह है कि एक परमाणुके लिये स्थूलताका व्यवहार असङ्गत होगा
तथा अनेक परमाणुके लिये एकताका व्यवहार असङ्गत होगा। अत
अनेक अवयवोंसे उत्पन्न एक अवयवी मानना आवश्यक है, जिसके लिये
“एक स्थूलः” ऐसा लोकमें व्यवहार हुआ करता है।
१. तेषामस्थूलत्वादिति १ पु० पा०
२८२ आत्मतत्त्वविवेके
न च भागेष्वेव रोपितेनैकत्वेनेदमुपपत्तिमत्, तदसंभ-
वात्। न हि करचरणचिबुकनासिकादिपरमाणूनामैक्यं
कश्चित् क्वचि¹दारोपयति। न च² तेषु भेदेन प्रथमानेषु न
स्थूलप्रत्ययः। न च तत्वे स्फुरत्येव³ तद्विपरीततत्वसमा-
रोपसम्भवः।
अपि चैवमेकपरमाण्वात्मना परमाणुकोटिरप्यारोपिता
परमाणुमात्रतयैव परिस्फुरेत्, न स्थूलतया !
यह भी नहीं कह सकते कि—भागी ( अवयवी ) को स्वीकृत नहीं
करनेपर भी भागों ( अवयवों ) में ही एकत्वका आरोप होनेसे 'एक"
प्रतीति बन सकती है—क्योंकि वैसा आरोप असम्भव है। अर्थात्
परस्पर भिन्नरूपसे प्रतीत होने वाले अवयवोंमें एकत्वारोप कैसे होगा ?
क्योंकि परस्पर भिन्न हाथ, पैर, चिबुक ( ओष्ठके नीचेका भाग ) और
नासिका आदिके परमाणुओंमें कोई भी कभी एकत्वका आरोप नहीं
करता है। फिर भी ऐसा नहीं होता कि परस्पर भिन्नरूपसे भासित
होनेवाले उन कर चरणादिकोंमे एकत्वारोप नहीं होनेके कारण स्थू-
लत्वकी प्रतीति न होती हो। और यह भी सम्भव नहीं है कि कर-
चरणादिकोंमें अनेकत्वके स्फुरणकालमें ही उसके विपरीत एकत्वका
आरोप हो सके।
एव, एक परमाणुके रूपमें यदि करोड़ों भी परमाणु आरोपित हो तो
वह परमाणुमात्ररूपसे ही स्फुरित होगा न कि स्थूलरूपसे। अर्थात् दस
बीस परमाणुको कौन कहे करोड़ों परमाणुओंमें भी यदि एकत्वका आरोप
होगा तो अन्तत वह परमाणु ही रहेगा स्थूल कैसे हो जायगा ? तात्पर्य
यह है कि परमाणु समुदायमे एकत्वारोप होनेसे 'एक" यह प्रतीति
भले ही बन जाय किन्तु परमाणु ( परम + अणु ) में "स्थूल" यह प्रतीति
कैसे हो सकेगी ?
१ कश्चिदारोपयेत् इति १ पु० पा०
२ न च तेष्वभेदेन प्रथमानेषु स्थूलप्रत्यय इति २ पु० पा०
३ परिस्फुरत्येव इति १ पु० पा०