आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 326, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंहीयत इति चेत्, न बाधकस्यापि त्यागप्रसङ्गात् । उभमप्य-
वर्जनीयमेव तर्हि, एवमेतत् । मिथो विरोधस्तु हेयः । न हि
विरुद्धयोरेकार्थसमवायस्तथाभूतयोर्वा विरोधः शक्य उपपाद-
यितुमृते स्वसमयात् । न च विचारावसरे स्वसमयावतार
इति । यथा यथा च बुद्धिनिवारणाय यत्नस्तथा तथोज्ज्वलः
प्रकाशः, तन्निवारणमपि बोद्धव्यमेवेति । तदेतदायातम्, प्रदी-
साथ रहनेके कारण सत्त्वका ही त्याग क्यों न कर दिया जाय—तो
ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि शून्यवादके अनुसार सबकी सत्ताका
त्याग कर देनेपर बाधकका भी त्याग कर देना पड़ेगा । ऐसी स्थितिमे
बाधकके नहीं रहनेसे सर्वशून्यत्व कैसे सिद्ध हो सकेगा ?
तब यह कहना कि सत्त्व और बाधक दोनोंमे किसीका परित्याग
न किया जाय, बल्कि दोनों ही मान लिये जाँय—तो ऐसा हो, किन्तु
इन दोनोंमें पारस्परिक विरोधका मानना छोड देना पड़ेगा । क्योंकि
परस्पर विरुद्धोंकी एकत्र स्थिति युक्तिद्वारा सिद्ध नहीं की जा सकती,
ऐसे ही एकत्र रहनेवालोंमें परस्पर विरोध भी युक्ति-सह्य नहीं हो
सकता, बिना इसके कि अपनी परिभाषाका आश्रय लिया जाय । अर्थात्
उक्त बात बौद्ध अपनी मनगढन्त परिभाषाके बलसे ही मान सकता है,
युक्तिद्वारा सिद्ध नहीं कर सकता । किन्तु यह भी ध्यान रखना है
कि प्रतिवादीके साथ विचारके अवसरपर मनगढन्त परिभाषा काम नहीं
देती है । इस प्रकार शून्यवादका आश्रय लेकर जैसे-जैसे बुद्धिका भी
लोपकर देनेके लिये यत्न करते हो, वैसे-वैसे और उज्ज्वल प्रकाश होता
जाता है । अर्थात् बुद्धिकी सिद्धि होती ही जाती है । क्योंकि
बुद्धिनिराकरण भी बाधकज्ञानाधीन है । इसलिये बाधकज्ञानकी सत्ता
स्वीकार करनी पड़ेगी । अथवा बुद्धिनिराकरणको भी असत् होनेसे
ज्ञानरूप ही मानोगे । अतः बाध्य होकर ज्ञानकी सत्ता माननी
ही पड़ेगी ।
इस प्रकार आपका बुद्धिविलोपका प्रयास ऐसा ही हुआ, जैसे
कोई दूसरे प्रदीपके द्वारा पूर्वप्रदीपको बुझाकर अन्धकार लानेकी चेष्टा
करे । वहाँ जैसे-जैसे पूर्वप्रकाशको नष्टकर देनेके विचारसे दूसरा