आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवादः २७३
दिति । तदन्य एवायं परमाणू रक्तबीजो यस्य भागा¹
युक्तिचामुण्डोदरमपि भित्त्वा निष्पतन्तीति ।
न च कल्पिताश्रयाः कल्पितप्रतिबन्धाश्च प्रसङ्गा भविष्य-
न्तीति युक्तम्, इ(स्वे)च्छाकल्पितेन व्यवहारेण सर्वविधिनिषेध-
ही अवयवधाराको अन्तिम अवधि है । इस प्रकार परमाणुके विनाशी
होनेसे भी नैयायिकोंका अभिमत नित्य परमाणु नहीं सिद्ध हो सकेगा—
कारण, परमाणुका विनाश सिद्ध करनेवाला कोई प्रमाण नहीं है । क्योंकि
ध्वंसके प्रति समवायिकारण और असमवायिकारणका नाश निमित्त होता
है । यहाँ परमाणुका कोई समवायिकारण ही नहीं होता, जिसके नाशसे
परमाणुका नाश हो जाय । समवायिकारण नहीं होनेसे तत्सम्बन्धरूप
असमवायिकारण भी सुतरां नहीं हो सकता । अतः असमवायिकारणके
नाशद्वारा भी परमाणुका नाश नहीं हो सकता । इसलिये नित्य परमाणु
के होनेमे कोई बाधा नहीं है ।
यदि कहो कि—मूर्तत्त्व आदि हेतुओंके द्वारा परमाणु सावयव सिद्ध
होगा तथा सावयव होनेके कारण परमाणुमे विनाशित्व सिद्ध हो
जायगा—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि सावयवत्वको सिद्ध करने
वाले हेतु अनवस्थाके उत्थापक हो जाते हैं । अर्थात् मूर्तत्त्व आदि हेतु
अनवस्थितरूपसे परमाणुमे अनन्त अवयवकी धारा सिद्ध करेंगे न कि
परमाणुका विनाश । इस प्रकार यह एक विलक्षण ही परमाणुरूपी रक्त-
बीज है, जो तुम्हारी युक्तिरूपी चामुण्डाके उदरका भी भेदन करके पुनः
परमाणुरूपमे निकल पड़ता है ; अर्थात् चामुण्डादेवीके द्वारा रक्तबीज
नामक असुरके निगल लिये जानेपर भी पुनः नहीं पैदा हो सका । किन्तु
यह परमाणुरूपी रक्तबीज तो उससे बढ़कर है, जिसका खण्डन करनेके
लिये तुम्हारी युक्तियाँ जैसे-जैसे सावयवत्त्व सिद्ध करती हैं, वैसे-वैसे
उन युक्तियोंद्वारा सिद्ध किया हुआ अवयव ही परमाणु बन बैठता है ।
यहाँ यह कहना भी उचित नहीं है कि—असत्ख्यातिसे उपनीत
काल्पनिक परमाणु ही उक्त प्रसङ्गोंमें आश्रय होगा तथा काल्पनिक बाह्य
पदार्थ ही उक्त प्रसङ्गोंमें अन्वयी एवं व्यतिरेकी दृष्टान्त होंगे । इसलिये
१. भेदा इति २ पु० पा० ।