आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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पान्तरेण प्रदीपं निर्वाप्य तिमिरापादनमिति ।
एतेन हेतुफलभावानुपपत्तेः सर्वविलोपि इति निरस्तम् ।
तन्निराकरणप्रयासस्य साफल्यवैकल्याभ्यां तन्निराकरणानुप-
पत्तः, सत्कार्यदूषणस्येष्टत्वात्, असत्कार्यदूषणस्य च प्रत्यक्षा-
दूसरा प्रदीप लाता जायगा, वैसे-वैसे और उज्ज्वल प्रकाश होता
जायगा, अन्धकार लाना तो दूर रहा । यही स्थिति बुद्धिनिराकरण-
की भी है ।
इस बुद्धिनिराकरणकी व्यवस्थाके अनुसार यह कथन भी खण्डित
हो गया कि—हेतुफलभाव (कार्यकारणभाव) के अनुपपन्न होनेसे सर्व-
विलोप (सर्वशून्यत्व) सिद्ध हो जायगा । अर्थात् कार्यकारणभाव
यदि प्रामाणिक हो तो अवयविरूप कार्य तथा उसके मूलकारणभूत
परमाणुकी सिद्धि हो सके । किन्तु कार्यकारणभाव ही अयुक्त है ।
इस लिये अवयवी तथा परमाणु आदिकी सत्ता तथा कारणके अधीन
होनेवाली बुद्धिकी भी सत्ता काल्पनिक ही होगी । इस प्रकार सर्व-
विलोप सुतरा सिद्ध है—क्योंकि आपका हेतुफलभावनिराकरणका प्रयास
सफल है या निष्फल है ? यदि सफल है तो इससे हेतुफलभाव सिद्ध
हो गया । यदि आपका उक्त प्रयास निष्फल है तो निष्फल होनेसे ही
वह हेतुफलभावका निराकरण नहीं कर सकेगा ।
कार्यकारणभावके दूषणसे यदि आपका अभिप्राय यह हो कि—
घटादिकार्य सत् है, इसीलिये उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती—तो यह
मुझे इष्ट ही है । क्योंकि सत्कार्यकी उत्पत्ति मैं भी नहीं मानता ।
यदि आपका यह अभिप्राय हो कि—असत् कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो
सकती—तो यह कथन प्रत्यक्षबाधित है । क्योंकि घटोत्पत्तिके पूर्व
घटकी उपलब्धि किसे होती है ? अर्थात् उत्पत्तिके पूर्व घट असत् ही
रहता है और उत्पन्न होकर सत् बनता है ।
एव, “घटो नोत्पद्यतेऽसत्त्वात्” इस दूषणका प्रतिपादन तथा तुम्हारे
द्वारा किया जानेवाला कार्यकारणभावनिराकरणका प्रतिपादन यदि पूर्वमें
असत् होकर बादमें उत्पन्न हुआ है तो “असत्की उत्पत्ति नहीं हो