आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ आत्मतत्त्वविवेके
न च भागेष्वेव रोपितेनैकत्वेनेदमुपपत्तिमत्, तदसंभ-
वात्। न हि करचरणचिबुकनासिकादिपरमाणूनामैक्यं
कश्चित् क्वचि¹दारोपयति। न च² तेषु भेदेन प्रथमानेषु न
स्थूलप्रत्ययः। न च तत्वे स्फुरत्येव³ तद्विपरीततत्वसमा-
रोपसम्भवः।
अपि चैवमेकपरमाण्वात्मना परमाणुकोटिरप्यारोपिता
परमाणुमात्रतयैव परिस्फुरेत्, न स्थूलतया !
यह भी नहीं कह सकते कि—भागी ( अवयवी ) को स्वीकृत नहीं
करनेपर भी भागों ( अवयवों ) में ही एकत्वका आरोप होनेसे 'एक"
प्रतीति बन सकती है—क्योंकि वैसा आरोप असम्भव है। अर्थात्
परस्पर भिन्नरूपसे प्रतीत होने वाले अवयवोंमें एकत्वारोप कैसे होगा ?
क्योंकि परस्पर भिन्न हाथ, पैर, चिबुक ( ओष्ठके नीचेका भाग ) और
नासिका आदिके परमाणुओंमें कोई भी कभी एकत्वका आरोप नहीं
करता है। फिर भी ऐसा नहीं होता कि परस्पर भिन्नरूपसे भासित
होनेवाले उन कर चरणादिकोंमे एकत्वारोप नहीं होनेके कारण स्थू-
लत्वकी प्रतीति न होती हो। और यह भी सम्भव नहीं है कि कर-
चरणादिकोंमें अनेकत्वके स्फुरणकालमें ही उसके विपरीत एकत्वका
आरोप हो सके।
एव, एक परमाणुके रूपमें यदि करोड़ों भी परमाणु आरोपित हो तो
वह परमाणुमात्ररूपसे ही स्फुरित होगा न कि स्थूलरूपसे। अर्थात् दस
बीस परमाणुको कौन कहे करोड़ों परमाणुओंमें भी यदि एकत्वका आरोप
होगा तो अन्तत वह परमाणु ही रहेगा स्थूल कैसे हो जायगा ? तात्पर्य
यह है कि परमाणु समुदायमे एकत्वारोप होनेसे 'एक" यह प्रतीति
भले ही बन जाय किन्तु परमाणु ( परम + अणु ) में "स्थूल" यह प्रतीति
कैसे हो सकेगी ?
१ कश्चिदारोपयेत् इति १ पु० पा०
२ न च तेष्वभेदेन प्रथमानेषु स्थूलप्रत्यय इति २ पु० पा०
३ परिस्फुरत्येव इति १ पु० पा०