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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 530 में से

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पृष्ठ 328

बाह्यार्थभङ्गवादः [२७९]

धितत्वात्, तत्प्रतिपादनस्यासत एवोत्पत्ताद्यनैकान्तिकत्वात्,
सत्त्वे वा प्रयास वै¹फल्यादिति ।
स्यादेतत्, मा भूवन्नेतानि दूषणान्यवयविनि², अनुपलं-
म्भस्तु स्यात्, न हि परमाणुसञ्चयादपरं किञ्चिदुपलभ्यत इति
चेत्, बैलक्ष्यविटम्बिकेयम्³, स्थूलैकानुभवस्य सर्वजनसिद्ध-
त्वात् ।
विकल्पमात्रं तदिति चेन्न, स्पष्टप्रतिभासत्वात् । औपा-
धिकमस्य स्पष्टत्वमिति चेत्, तथाभूतानुभवमन्तरेणोपाधेरप्य-

सकती है" यह तुम्हारा नियम यहीं व्यभिचरित हो गया । यदि तो
उक्तदूषण तथा हेतुफलभावनिराकरणका प्रतिपादन भी पूर्वसे ही सत् है
तो इस समय प्रतिपादनका तुम्हारा प्रयास व्यर्थ ही है ।


अवयवीके सम्बन्धमें अनुपलम्भका निराकरण ।

**शङ्का—**अस्तु, अवयवीका खण्डन करनेके लिये दिये गये दूषण भले
ही न हों, किन्तु अनुपलम्भ तो दूषण हो सकता है । क्योंकि परमाणु-
समूहसे भिन्न अवयवी नामकी कोई वस्तु उपलब्ध नहीं होती है ।
**समाधान—**उक्त कथन भी युक्तिके अभावमें पराजयसे उत्पन्न
लज्जाका ही विजृम्भण है । क्योंकि स्थूलात्मक एक वस्तुका अनुभव
सर्वजनसिद्ध है । अर्थात् "इदं स्थूलम्” इस प्रत्यक्षसे ही अवयवीकी
उपलब्धि सबको होती है । क्योंकि घटादिको अवयवी न मानकर
परमाणुका पुञ्ज माना जाय तो परमाणुओंके अनेक होनेसे “एकम्”
तथा अणुरूप होनेसे ‘स्थूलम्” ये दोनों ही व्यवहार नहीं हो सकते ।
अतः इस प्रत्यक्ष व्यवहारसे ही अवयवी की उपलब्धि माननी होगी ।
यदि कहो कि-“एक स्थूलम्” यह प्रतीति अनुभवरूप (निर्विकल्पक)
नहीं है, किन्तु सविकल्पात्मक है, अतः प्रमाण नहीं है । क्योंकि
बौद्धनयानुसार निर्विकल्पात्मक ज्ञान ही अनुभव होता है और


१. वैयर्थ्यादिति ३ पु० पा० २. बाधकान्यवयविनि इति १ पु० पा०
३. विजृम्भिकेयम् इति १ पु० पा०