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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 530 में से

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पृष्ठ 330

तत्समुदायस्तथा, तस्य समुदितस्थानस्य त्वयाऽनभ्युपगमात्,
अभ्युपगमे वाऽवयविना किमपराद्धम् । न च समुदिता एव
तथा प्रतिभासितुमर्हन्ति, तेषां १ प्रत्येकमस्थूलत्वात् । न च
नानादिग्देशव्यापितैव स्थौल्यम्, परमाणुषु प्रत्येकमसम्भ-
वात् । न च नानात्वैकार्थसमवायिन्येव सा स्थौल्यमिति
साम्प्रतम्, स्थूल एक इति प्रत्ययनियमात् ।
यह भी नहीं हो सकता कि—परमाणुओंके समुदायमें ही स्थूलताका
व्यवहार होता है, क्योंकि समुदित परमाणु ही हैं स्थान (आश्रय)
जिसका, ऐसे समुदायको तुम मानते ही नहीं हो। यदि मानो तो
अवयवीने क्या अपराध किया है कि वैसे ही अनेक परमाणुरूप
अवयवोंमें आश्रित उसे (अवयवीको) नहीं मानते। अर्थात् उक्त
प्रकारका समुदाय ही तो अवयवी है।
यह नहीं कह सकते कि—समुदित परमाणु ही स्थूलरूपसे भासित
होते हैं—क्योंकि वे प्रत्येक परमाणु अस्थूल हैं। वहा यह नहीं कह
सकते कि—स्थूलता कोई परिमाणविशेष नहीं है, जो अवयवीमें या
समुदायमे रहता हो, किन्तु नानादिग्देशमे व्याप्त रहना ही स्थूलता है।
अर्थात् नाना दिग्देशमे सम्बद्ध परमाणुओंमे भी स्थूलताका व्यवहार हो
सकता है—क्योंकि परमाणुओंमे कोई भी परमाणु ऐसा नहीं है, जो नाना
दिग्देशमे व्याप्त हो सके। यह भी कहना युक्त नहीं है कि—प्रत्येक
परमाणुके नाना दिग्देशव्यापी न हो सकनेपर भी परस्परमे सटकर अव-
स्थित नाना परमाणु तो नानादिग्देशव्यापी हो ही सकते हैं। अर्थात् उक्त
रूपमे अवस्थित नाना परमाणुओंके लिये ही स्थूलता की प्रतीति होती है—
क्योंकि “एक स्थूल” यही प्रतीति होती है। अर्थात् उक्तरूपमें अवस्थित
नाना परमाणुओंमे स्थूलता मानो तो उसे “एकः” कहना असङ्गत होगा।
तात्पर्य यह है कि एक परमाणुके लिये स्थूलताका व्यवहार असङ्गत होगा
तथा अनेक परमाणुके लिये एकताका व्यवहार असङ्गत होगा। अत
अनेक अवयवोंसे उत्पन्न एक अवयवी मानना आवश्यक है, जिसके लिये
“एक स्थूलः” ऐसा लोकमें व्यवहार हुआ करता है।
१. तेषामस्थूलत्वादिति १ पु० पा०