आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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व्यवहारविलोपे¹ प्रसङ्गात् । लोकव्यवस्थापेक्षणे तु तद्वि-
रोधेनोत्तरस्य निषेध (क) स्यात्मलाभाभावादित्यसकृदावे-
दितत्वात् ।
अन्यथा सर्वमेतद् बुद्ध्यापि समानम् । सापि हि षट्केन
युगपद्योगादिभिः सावयवा प्रसज्येत । तस्यामसिद्धास्त इति
चेन्न, अनुमानसिद्धत्वात् ।
तथाहि, बुद्धिः षट्केन युगपद्योगिनी मूर्त्तिमती च,
आश्रयासिद्धि या व्याप्त्यसिद्धि दोष नहीं आ सकता है—क्योंकि अपनी
इच्छाद्वारा कल्पित मनमाने अनुमानव्यवहारसे तो सभी विधि तथा
निषेधव्यवहारोंका लोप होने लग जायगा।
यदि कहो कि—विधिनिषेधव्यवहारका भी आधार लौकिक व्यवस्था
है, अतः वास्तविकता नहीं होनेपर भी लोकव्यवस्थासे नियन्त्रित होनेके
कारण विधि-निषेधव्यवहारोंमें कोई गड़बड़ी नहीं होगी—तब तो लौकिक
व्यवस्थासे विरुद्ध होनेके कारण परमाणु अवयवी आदि बाह्यवस्तुओंका
भी निषेध नहीं हो सकेगा, यह बात अनेक बार बता दी जा चुकी है।
अन्यथा अर्थात् लोकव्यवस्थाकी उपेक्षा करते हुए यदि बाह्यवस्तुओंका
निषेध करो तो उक्त सभी प्रसङ्ग तुम्हारी बुद्धि (विज्ञान) के बारेमे भी
समानरूपसे दिये जा सकते हैं। क्योंकि वह भी "षट्केन युगपद्-
योगात्" इत्यादि हेतुओंसे परमाणुके समान ही सावयव होने लगेगी।
यदि कहो कि—उक्त हेतु बुद्धिमे असिद्ध (स्वरूपासिद्ध) हैं—
तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि अनुमानद्वारा वे बुद्धिमे सिद्ध हैं।
जैसे "बुद्धि छः के साथ एक साथ सम्बद्ध है तथा मूर्त्तिमती भी है,
क्योंकि उसमे सत्ता है या वह व्यवहारका विषय है, जैसे, बोध्यपदार्थ"
इस प्रकारका अनुमान किया जा सकता है।
यदि कहो कि—बुद्धिरूप धर्मीका ग्रहण करानेवाला जो प्रमाण है,
वही बुद्धिकी सिद्धिके साथ साथ उसके षट्कयोगित्व और मूर्त्तिमत्त्वके
१. व्यवहारविलोपे इति ३ पुस्तके नास्ति ।