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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 530 में से

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पृष्ठ 324

बाह्यार्थभङ्गवादः २७५
सत्त्वाद् व्यवहर्त्तव्यत्वाद् वा, बोधयदिति शक्यते । विपर्य्य-
स्यापि धर्मिग्राहकमRoot/man? मानसाधितत्वादनवकाशमिदमिति चेत्, एव-
मन्यत्रापि प्रतिसन्दधीथा इत्येषा दिक् ॥
अन्यस्तु चक्षुषी निमील्य निर्भयोभवितुमिच्छन्नाह—अस्तु
तर्हि बुद्धेरपि विलोप इति ।
अत्र तु किं वक्तव्यं यत्र हेत्वादि व्यवहारो नास्ति ।
अस्तु, परं सांवृत इति चेत् , भवेदेयं यदि संवृतिरपि परमार्थ-
अभावकी भी सिद्धि करा देगा । अतः बुद्धिमें षट्कसम्बन्ध और
मूर्त्तिमत्ताका यह अनुमान निरुपयोगी होगा—तो इसी प्रकार परमाणु और
अवयवीके बारेमे भी समझो । अर्थात् धर्मिग्राहक मानसे परमाणु
सिद्ध है । क्योंकि परमाणुरूप धर्मी न हो तो तुम सावयवत्वका अनुमान
किस पक्षमें कर सकोगे । इसी प्रकार परमाणुका निरवयवत्व भी लाघव
और अनवस्थाप्रसङ्गरूप तर्कके