आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
१२० आत्मतत्त्वविवेके
न चेह तथा । यथा हि प्रत्यक्षे चेतसि देशकालावस्था-
नियतानि परिस्फुटरूपाणि स्वलक्षणानि प्रतिभान्ति, न तथा
शब्दे ( शाब्दे ) लैङ्गिकविकल्पेऽपि । तत्र हि विजातीयव्या-
वृत्तमिव परस्पराकारसङ्कीर्णमिवास्फुटमिव प्रत्यक्षापरिचितं
किञ्चिद्रूपमाभासमानमनुभवविषयः ।
न चोपायभेदमात्रेण प्रतिभासभेद उपपद्यते । न हि
प्रतिपत्त्युपायाः प्रतिपत्त्याकारं परिवर्तयितुमीशते । न चैकं
वस्तु द्वयाकारमिति प्रतिबन्धसिद्धिः । अस्य प्रयोगः-योऽयं
और दायीं आँखोंसे देखनेपर बायीं आँखसे हुआ ज्ञान दायीं आँखसे
हुए ज्ञानसे भिन्न नहीं होता ।
किन्तु, यहाँ ऐसी बात नहीं है । क्योंकि, जैसे प्रत्यक्षदशामें किसी
खास देशकाल और अवस्थाके साथ एवं काला उजला आदि अपने स्पष्ट
रूपके साथ वस्तुओंकी प्रतीति होती है, वैसे शब्द या अनुमानद्वारा
हुए ज्ञानमें नहीं होती । वहाँ ( शब्द और अनुमान स्थलमें ) तो अपने
विजातीयोंसे स्पष्टरूपमे भिन्नताका अनुभव न होनेके कारण भिन्न जैसा,
तथा अपने अन्य सजातीयोंके साथ भेदकी प्रतीति न होनेसे सजातीयोंके
आकारमे मिला जुला जैसा, एव अपने विशेषधर्मकी प्रतीति न होनेके
कारण अस्पष्ट जैसा, प्रत्यक्षसे अपरिचित कोई पदार्थ भासित होता हुआ
अनुभवका विषय होता है ।
जबतक वस्तु भिन्न भिन्न न हो तब तक केवल इन्द्रिय, अनुमान
या शब्दरूप उपायोंके भेदसे ज्ञान भिन्न हो जाय ऐसी बात नहीं हो
सकती । क्योंकि ज्ञानके उपाय ज्ञानके आकारको नहीं बदल सकते
हैं । और यह भी नहीं हो सकता कि एक ही वस्तु दो आकारकी
हो । अर्थात् प्रत्यक्षज्ञान वस्तुकी सत्तामे ही होता है, किन्तु अनुमिति
और शाब्दज्ञान प्रत्यक्षके समान नहीं है, इसलिये वे ( अनुमिति
और शाब्दज्ञान ) वस्तुके रहने या न रहने दोनों दशाओंमें होते
हैं । अतः हमारी पूर्वोक्त व्याप्ति ( नियम ) सिद्ध है कि 'जो ज्ञान
जिस वस्तुके रहने या न रहने दोनों दशाओंमे हो, वह उससे अन्यकी
व्यावृत्ति ( अन्यापोह ) बोधित कराता है" । यहाँ हमारे अनुमानका
क्षणभङ्गवादः १३१
क्वचिद्वस्तुनि प्रत्यक्षप्रतिभासाद् विपरीत: भासो, नासौ तेनै-
कविषयो, यथा घटग्रहात् पटप्रतिभासः । तथा च गवि प्रत्यक्ष-
प्रतिभासाद् विपरीत: प्रतिभासो विकल्पकाल इति ।
इदमप्यवद्यम्, चित्राचित्रप्रतिभासाभ्यां मिथो विरुद्धा-
भ्यामेकनीलविषयाभ्यामनैकान्तात् । न हि चित्राध्यक्षे यन्नीलं
चकास्ति, तदेव पश्चान्न केवलम्, तदेव वा पुरुषान्तरस्य ।
येनाकारेणैकविषयत्वं तयोर्न तेनैव विरोधो, येन च विरोधो
न तेनैकविषयत्वम् ।
धर्मान्तराकारेण विरोधो नीलमात्राकारेण चैकविषय-
तेति चेत्, नन्विहापि धर्मान्तराकारेण विरोधो गोत्ववत्पिण्ड-
ऐसा आकार बनता है—जो ज्ञान किसी वस्तुके प्रत्यक्षज्ञानसे विपरीत
आकारका होता है, वह उसके समान विषयवाला नहीं होता, जैसे—
घटज्ञानसे विपरीत पटज्ञान घटविषयक नहीं होता । वैसे ही, गौके
सम्बन्धमें जो प्रत्यक्षज्ञान होता है, उससे विपरीत आकारका ज्ञान गो-
विषयक शाब्दबोध कालमे होता है। इसलिये शब्दद्वारा प्रत्यक्षके
समान गोस्वरूपका भान नहीं होगा किन्तु अगोव्यावृत्तिका ही
भान होगा ।
(उत्तरपक्ष) आपका यह कथन भी सदोष है। क्योंकि चित्ररूपका
ज्ञान और अचित्ररूप (नीलमात्र) का ज्ञान परस्परमें विरुद्ध होते
हुए भी दोनों ही एक नीलरूपको विषय बनाते हैं। इसलिये आपका
उपर्युक्त नियम कि “परस्पर विपरीत ज्ञान समानविषयक नहीं होते”
व्यभिचारी हो जाता है। ऐसी बात नहीं है कि चित्रके प्रत्यक्षमें जो
नील भासित होता है, वही पीछे अकेला न भासित होता हो, अथवा
उसी समयमें अन्य व्यक्तिको वही नील अकेला न भासित
होता हो ।
यदि कहें कि—जिस आकारसे दोनों ज्ञानोंमें एकविषयता है, उसी
आकारसे उनमें विरोध नहीं है, और जिस आकारसे विरोध है, उससे
१३२ आत्मतत्त्वविवेके
मात्राकारेण चैकविषयतेति तावन्मात्रनिराकरणेऽसिद्धो हेतुः।
पूर्वत्र सिद्धसाधनम्। न हि शाब्दलैङ्गिकविकल्पकाले देश-
कालनियमादयोऽपि सर्वे एव धर्मविशेषा विषयभावमासाद-
यन्तीत्यभ्युपगच्छामः।
ननु धर्मिण्येव स्फुटास्फुटप्रतिभासभेदः कथम् ? न कथ-
ञ्चित्। यथा यथा हि धर्माः प्रतिभान्ति तथा तथा स्फुटेति
एकविषयता नहीं है। क्योंकि चित्राकार और अचित्राकारसे विरोध
है और केवल नीलाकारसे एकविषयता है—तो निश्चित ही प्रत्यक्ष और
शाब्दबोधादि स्थलमे भी नील, श्वेत, कपिल आदि धर्मोंके आकार-
से विरोध है और गोत्वधर्मवाले पिण्डके आकारसे एकविषयता है।
अर्थात् प्रत्यक्षमे नीलापन उजलापनके साथ साथ गोत्वधर्मवाला पिण्ड
भासित होता है और शाब्दबोधादि स्थलमें केवल गोत्वधर्मयुक्त पिण्ड
का भान होता है। इस प्रकार नीलादि अंशमें ही विरोध है न कि
पिण्डांशमे भी।
इसलिये शब्द और अनुमानद्वारा होनेवाले गोत्वयुक्त पिण्डके भान
का यदि खण्डन करना चाहते हो तो इसके लिये आपका दिया पूर्वोक्त
(प्रतिभासभेद) हेतु स्वरूपासिद्ध है। क्योंकि पिण्ड (वस्तु) के
सम्बन्धमे प्रत्यक्ष शाब्दबोध और अनुमिति सभी ज्ञान समान है।
और यदि नियत देश, काल, अवस्था तथा वस्तुके उजलापन नीलापन
आदि विशेषधर्मोंको लेकर प्रत्यक्ष और शाब्दादि प्रतिभासोंके भिन्न
भिन्न होनेसे उन्हें भिन्नविषयक सिद्ध करना चाहते हो तो सिद्धसाधन
दोष हो जायगा। क्योंकि यह हम भी नहीं मानते कि शाब्द या
अनुमितिज्ञानकालमे नियतदेश काल, अवस्था, नीलत्व, श्वेतत्व आदि
वस्तुके सभी धर्म भासित होते हैं। अर्थात् उस रूपसे शाब्द आदि
ज्ञानको प्रत्यक्षज्ञानसे भिन्नविषयक हम भी मानते ही हैं।
(शङ्का) जो धर्मी (वस्तु) प्रत्यक्षसे भासित होता है, वही यदि
शब्द और अनुमानसे भी भासित होता है तो प्रत्यक्षज्ञान स्फुट और
शाब्दबोध तथा अनुमिति अस्फुट, ऐसा प्रतीतिभेद कैसे होता है ?
क्षणभङ्गवादः १३३
प्रतिभानव्यवहारः । यथा यथा च धर्माणामप्रतिपत्तिस्तथा
तथा प्रतिभानस्य मान्द्यव्यवहारो दूरान्तिकादौ प्रत्यक्षेऽपि
लोकानाम्, न तु सर्वथैवाप्रतिपत्तौ ।
विदूरादिप्रत्ययोऽपि पक्ष एवेति चेत्, अस्तु, न तु ताव-
ताऽपि धर्मधर्मिभेदसिद्धौ प्रत्यक्षबाधस्य, तत्सन्देहेऽपि सन्दि-
(उत्तर) मैं कहूँगा कि प्रतिभास स्फुट ही होता है, अतः उसमें
स्फुटत्व और अस्फुटत्वका भेद कथमपि नहीं होता है । क्योंकि जैसे
जैसे वस्तुके धर्म भासित होते जाते हैं, वैसे "स्फुट प्रतीति है" ऐसा
व्यवहार होता है और जैसे जैसे वस्तुगत धर्मोंकी अप्रतीति होती जाती
है, वैसे वैसे "मन्द प्रतीति है" ऐसा व्यवहार लोगोंको दूरस्थ और
समीपस्थ वस्तुओंके प्रत्यक्षमें भी होता है। यह बात नहीं है कि वस्तु
की सर्वथा अप्रतीतिमें ही अस्फुटत्व (मन्दत्व) का व्यवहार होता हो ।
इसलिये शब्द और अनुमानमे यदि वस्तुका सर्वथा भान न हो तो
वहाँ अस्फुटत्व भी नहीं कहा जा सकता है ।
यदि कहो कि— विदूरादिप्रतीति भी पक्षके अन्तर्गत ही है। अर्थात्
जैसे शाब्द और अनुमितिप्रतीतियोंको वस्तु (धर्मी) विषयक नहीं
मानते, वैसे ही विदूरादिप्रतीतिमे भी धर्मीका भान नहीं मानते हैं।
इसलिये उसे दृष्टान्तके रूपमें नहीं उपस्थित किया जा सकता है—तो
कहूँगा कि वह भी भले ही पक्षकोटिमे रहे, फिर भी धर्म और धर्मीका
पारस्परिक भेद सिद्ध है। अतः दूरस्थ वस्तुके कुछ धर्मोंका भान न
होनेपर भी उस धर्मीका तो भान होता ही है। इसप्रकार आपका यह
अनुमान करना कि विदूरप्रतीतिमे भी धर्मीका भान नहीं होता है,
प्रत्यक्षप्रमाणसे बाधित है ।
बाधमें कथञ्चित् सन्देह होनेपर भी सन्दिग्धानैकान्तिक दोषका
परिहार नहीं हो सकता है । क्योंकि प्रतिभासभेद (विदूरप्रतीतिका
अस्फुट होने) क कारण ही आप उसे धर्मिविषयक नहीं मानते हैं, किन्तु
उसके धर्मिविषयक होनेपर भी कुछ धर्मोंका भान न होनेमात्रसे भी उस
प्रतीतिका अस्फुट होना संभव है । इसप्रकार आपके अनुमानमें
१३४ आत्मतत्त्वविवेके
ग्धानेकान्तिकस्य वा परिहारः, तावतापि प्रतिभासभेदस्यो-
पपत्तेः ।
यदि च नैवम्, दूरतमादिप्रत्ययेषु कः समाश्वासविषयः ?
यस्यार्थो लभ्यत इति चेत्, ननु लाभोऽपि पूर्वपूर्वोप्लब्धानुप-
मर्दनेनैव । न हि सत्त्वद्रव्यत्वपार्थिवत्ववृक्षत्वादिकं परिभूय
शिंशपा लभ्यते ।
यत्रार्थक्रियासिद्धिरिति चेत्, सर्वेषामनुवृत्तेः कस्यार्थ-
क्रियेति कि निश्चायकम् ? न किञ्चित्, किन्तु संकीर्णार्थ-
व्यभिचारका सन्देह तो अवश्य है और व्यभिचारका सन्देह भी अनु-
मितिको रोक देता है ।
यदि ऐसी बात न हो तो दूरतम ( सर्वाधिक दूर ) आदि प्रतीतियोंमे
कौन सी प्रतीति विश्वसनीय होगी । अर्थात् दूरतमप्रतीतिमें “कोई द्रव्य
है” ऐसा भासित होता है । दूरतरप्रतीतिमें “वह पार्थिव द्रव्य है”
ऐसा भान होता है । और निकटप्रतीतिमे “वह सीसमका वृक्ष है”
ऐसा स्पष्ट ज्ञान हो जाता है । यहाँ एक ही वस्तु अस्पष्टतम, अस्पष्टतर,
अस्पष्ट और स्पष्टरूपमे मेरे मतानुसार भासित होती है । किन्तु आपके
मतमे किस वस्तुके सम्बन्धमें विश्वास किया जाय कि अमुक वस्तुवाली
प्रतीति प्रमा है ।
यदि कहो कि—जिस प्रतीतिकी वस्तु प्राप्त हो जाती है, वही प्रतीति
विश्वसनीय है—तो निश्चित ही वह प्राप्ति भी पूर्व पूर्वमें प्राप्त वस्तुको
अतिरस्कृत कर ही होती है । क्योंकि निकटसे शिंशपाका ज्ञान अतिदूर
आदिसे जाने गये उसके सत्त्व, द्रव्यत्व पार्थिवत्व और वृक्षत्व आदि
भावोंको तिरोहित करके नहीं होता ।
यदि कहो कि—जिसमें पत्र काण्डादिस्वरूप अर्थक्रिया देखी जाती
है, उसीकी प्रतीति प्रमा है और शेषकी अप्रमा—तो शिंशपाप्रतीतिदशा-
में सत्त्व, द्रव्यत्व, पार्थिवत्व और वृक्षत्वकी भी अनुवृत्ति रहती ही है,
उनका उपमर्द होता नहीं । अत इनमे किसमे अर्थक्रिया होती है,
इसका क्या निश्चायक है ?
क्षणभङ्गवादः १३५
क्रियाविरहादेकमेव तत्र वस्तु, न चैकस्मिन् प्रतिभासभेद
इत्येक एव प्रत्ययस्तत्र सालम्बन इति ब्रूम इति चेत्, तथापि
कतम इत्यनिश्चये स एवानाश्वासः ।
असंकीर्णाऽपि चार्थक्रिया न व्यक्तिः, सामग्रीतः सर्व-
संभवात् । अत एव न सन्तानतः । न ह्येकसन्ताननियता
काचिदर्थक्रिया नाम । काञ्चिदर्थक्रियां प्रति प्रत्यक्षानुपलम्भ-
गोचर एव तथा व्यवस्थाप्यत इति चेत्, तर्हि दूरतमाद्युपलब्धा
यदि कहो कि—यद्यपि कोई निश्चायक नहीं है, फिर भी वहाँ अर्थ-
क्रियाके सङ्कीर्ण नहीं होनेसे एक ही वस्तु है, और एक वस्तुमें भिन्न
प्रतीति नहीं हो सकती, अतः एक ही प्रतीति वहाँ सविषयक है और शेष
प्रतीतियाँ निरालम्बन हैं—तो सत्त्वसे लेकर शिशपात्वप्रतीति तक कौन
सी प्रतीति ऐसी है, इसका निश्चय नहीं होनेसे किसी खास प्रतीतिकी
प्रामाणिकताके सम्बन्धमें वही अविश्वास कायम रहा।
यदि कहो कि—शिशपामे विशेष प्रकारकी पत्रकाण्ड आदि अर्थ-
क्रिया उसके सत्, द्रव्य, पृथिवी या वृक्षमात्र होनेसे होती तो कटहलके
भी सत्, द्रव्य, पृथिवी या वृक्ष होनेसे उसमें भी शिशपा जैसे ही पत्र
काण्डादि होते । अतः उस विशेष अर्थक्रियाके कारण शिशपाप्रतीति ही
प्रामाणिक निश्चित होती है—तो फिर भी यह असङ्कीर्ण अर्थक्रिया एक
व्यक्तिमात्रसे नहीं होती किन्तु सामग्रीसे होती है। इसीलिये व्यक्तिकी
अविच्छिन्न सन्ततिसे भी नहीं हो सकती । क्योंकि कोई भी अर्थक्रिया
(जैसे, अंकुरादि) एकमात्र बीजसन्ततिसे नहीं होती है किन्तु उसमें भी
मिट्टी पानी आदिकी सन्ततिकी भी अपेक्षा पहले बतायी जा चुकी है।
यदि कहो कि—किसी अर्थक्रियाके प्रति कारणरूपसे वही व्यवस्थित
किया जा सकता है, जिसका उस कार्यके प्रति अन्वय व्यतिरेक सहचार
हो। अर्थात् जिसके रहनेपर ही यह कार्य उत्पन्न हो और नहीं रहने-
पर न हो, वही उस कार्यका कारण है—तो दूरतम, दूरतर, दूर और
निकटसे द्रव्य, पृथिवी, वृक्ष और शिशपाके रूपमें उपलब्ध पदार्थके
सम्बन्धमें भी वही व्यवस्था होनी चाहिये। क्योंकि वे सभी उस अर्थ-
१३६ आत्मतत्त्वविवेके
अपि तथा व्यवस्थाप्याः। सर्वेषामेव तेषां ता तामर्थक्रिया
प्रति प्रयोजकताया अन्वयव्यतिरेकगोचरत्वात्।
स्यादेतत्, न धर्मान्तराकारेण प्रतिभासभेदो भेदहेतुः
किन्तु परोक्षापरोक्षरूपतया। सा हि न धर्मभेदानप्युपादाय
समर्थयितु शक्या, तेष्वपि परोक्षापरोक्षज्ञानोदयात्, तत्रापि
धर्मन्तरानुसरणेऽनवस्थानादिति चेत्, न, तयोरविषयाकार-
त्वात्। द्विविधो हि ज्ञानधर्मो विषयावच्छेदो जातिभेदश्च। तत्र
विषयावच्छेदभेदेन विषयस्य भेदस्थितिर्भेदनिराकरणं वा, न
क्रियाके प्रति प्रयोजक है, यह बात अन्वय-व्यतिरेकसे सिद्ध है। जैसे, वही
सीसम द्रव्यरूपमें सयोगके प्रति, पृथिवीरूपमे गन्धके प्रति वृक्षरूपमें
सामान्यत पत्रकाण्डादिके प्रति और शिंशपारूपमें विशेष ढङ्गके पत्र
काण्डादिके प्रति कारण होता है। इसलिये केवल शिंशपाप्रतीति ही
प्रामाणिक नहीं है कि तु द्रव्यादिप्रतीति भी वैसे ही धर्मिविषयक है और
प्रामाणिक है।
(पूर्वपक्ष) अस्तु किन्हीं अन्य धर्मोंके कारण नहीं किन्तु परोक्ष
और अपरोक्षरूप होनेमे अनुमानादि और प्रत्यक्षज्ञान परस्पर भिन्न हैं
और इसीलिये दोनोंके विषय भिन्न सिद्ध होते हैं। यहाँ ऐसा समर्थन
नहीं किया जा सकता कि "ज्ञानोंकी परोक्षता या अपरोक्षता स्वतः नहीं
है किन्तु परोक्षत्व अपरोक्षत्व विषयके ही धर्म हैं और इन परोक्ष अप
रोक्ष विषयोंके ही कारण ज्ञान भी परोक्ष अपरोक्ष कहे जाते हैं। क्योंकि
आपके मतमे परोक्ष विषयमे भी योगियोंको अपरोक्षज्ञान और अपरोक्ष
विषयमें भी सर्वसाधारणको शाब्दबोधादि परोक्षज्ञान होता है। यदि
इन ज्ञानोंकी भी परोक्षता अपरोक्षताके समर्थनके लिये किन्हीं अन्य
धर्मोंका सहारा लिया जाय तो इस प्रकारकी कल्पनाकी विश्रान्ति न
हो सकनेके कारण अनवस्थादोष हो जायगा। अतः परोक्ष अपरोक्ष
स्वरूप प्रतिभासके भेदसे प्रत्यक्ष अनुमानादि ज्ञानोंका विषयभेद
आवश्यक है।
(उत्तरपक्ष) उक्त आक्षेप ठीक नहीं है। क्योंकि मेरे मतमे भी
तु द्वितीयेन, तस्य कारणभेदेनैवोपपत्तेः, श्रुत्यनुमितिस्मृतिवत् ।
यथा च विषयभेदेऽपि कारणाभेदादेकापरोक्षजातीयमिन्द्रियजं
ज्ञानं तथा विषयाभेदेऽपि कारणभेदादेव परोक्षापरोक्षजातीय-
मिन्द्रियलिङ्गज्ञानं भवत् केन वार्यते । वारणे वा कार्य-
भेदं प्रति कारणभेदोऽप्रयोजकः स्यात्, तथा चाकस्मिकः स
आपद्येत ।
जातिभेदोऽयं न तूपाधिभेद इति किमत्र निष्टङ्कं कारण-
मिति चेन्, अनुभव एव । न हि व्यवसायकाले पारोक्ष्या-
पारोक्ष्यस्मृतित्वानुभूतित्वानि परिस्फुरन्ति, असावग्निमान्
परोक्षत्व और अपरोक्षत्व विषयप्रयुक्त नहीं होता। कारण, ज्ञानगत
धर्म दो प्रकारके होते हैं, विषयसंसर्गित्व और दूसरे प्रत्यक्षत्व अनुमि-
तित्व-परोक्षत्व अपरोक्षत्व आदि जातिविशेष । इनमें विषयसंसर्गके
कारण जहाँ ज्ञानोंमें भेद होता है, जैसे घटज्ञान और पटज्ञानमे, वहाँ
[
१३८ आत्मतत्त्वविवेके
अयमग्निमान् सोऽग्निमान् इति स्फुरणात् । अनुव्यवसायकाले
तु तत्प्रतिभासः, अमुमनुमिनोमि इमं पश्यामि तं स्मरामी-
त्युल्लेखात् । कथं तर्हि परोक्षोऽर्थः प्रत्यक्षश्चेति व्यवहारः ?
यथाऽनुमितो दृष्टः स्मृत इति ।
यदप्यत्यन्तविलक्षणानामित्यादि-तदपि सन्दिग्धाने-
कान्तिकम्, विधिनापि तथाभूतेन सालक्षण्यव्यवहारस्य निर्वा-
हात् । तथा हि,अय व्यवहारो न निर्निमित्तो नाप्यनेक-
अपरोक्षत्व स्मृतित्व अनुभूतित्वका स्फुरण ( भान ) नहीं होता । कारण,
व्यवसायकालमे 'वह अग्निमान् है ' ' यह अग्निमान् है' इसी प्रकारका
भान होता है । किन्तु अनुव्यवसायकालमें तो परोक्षत्वादिका भान होता
है । क्योंकि इस दशामें "उसका अनुमान करता हूँ ' "इसे देखता हूँ"
"उसका स्मरण करता हूँ" इसी प्रकारका उल्लेख होता है । इस तरह
अनुव्यवसायमे परोक्षत्व, प्रत्यक्षत्व, स्मृतित्व आदिका स्पष्ट भान लोकमे
होता है ।
( शङ्का ) यदि परोक्षत्व-अपरोक्षत्व विषयप्रयुक्त नहीं होते तो "वह
विषय परोक्ष है, यह प्रत्यक्ष है" इस प्रकारका व्यवहार क्यों होता है ?
( उत्तर ) जैसे "यह विषय अनुमित है, दृष्ट है या स्मृत है" यह
व्यवहार होता है, वैसे ही उक्त व्यवहार भी होता है । अर्थात् विषयके
अभिन्न होनेपर भी कारणके भिन्न होनेसे ही अनुमित-दृष्ट स्मृत आदि
व्यवहार जैसे होते हैं, वैसे ही विषयके भिन्न होनेपर भी कारणभेदसे
ही परोक्ष और प्रत्यक्षका भी व्यवहार होता है ।
जो तो पूर्वमें अपोहसिद्धिके लिये न्याय उपस्थित किया गया है कि
"अत्यन्त विलक्षणोंमे भी समानता व्यवहारका जो हेतु है वह अन्य-
व्यावृत्तिस्वरूप होता है—वह भी सन्दिग्धव्यभिचारदोषसे ग्रस्त है।
क्योंकि विध्यात्मक जातिसे भी समानता व्यवहारका निर्वाह हो सकता
है । क्योंकि "अय गौ , अयमपि गौ, सोऽपि गौ " इत्यादि समानता
व्यवहार अकारण नहीं हो सकता है । अकारण होनेपर उक्त व्यवहार
नित्य होने लगेगा ।
क्षणभङ्गवादः १३९
निमित्तो नाप्यनेकासंसर्गैकनिमित्तः, अतिप्रसङ्गात् । ततोऽने-
कसंसर्गैकनिमित्तोऽयं परिशिष्यते। तथा च तादृशस्य विधि-
रूपत्वे को विरोधः ? येन व्याप्तिः स्यात् । प्रत्युत निषेधरूप-
तायामेव विरोधो दर्शितः प्रागिति कृतं पल्लवसमुल्लासैः ।
नापि प्रवृत्त्यादिव्यवहारनिर्वाहकत्वमपोहकल्पनायाः,
अन्यावभासादन्यत्र प्रवृत्तावतिप्रसङ्गात् । अध्यवसायादयम-
दोष इति चेत्, अथ कोऽयमध्यवसायः ? किमलीकस्य वस्तु-
धर्मतयाऽवभासः ? किं वा वस्त्वात्मकतया ? ततो भेदाग्रहो,
वस्तुवासनासमुत्थं वा ?
यह भी नहीं हो सकता कि समानता व्यवहारके अनेक निमित्त हों,
क्योंकि तब अनुगत व्यवहार नहीं हो सकेगा । इसी प्रकार अनेकके
साथ असंसर्गकी दशामे भी उक्त समानता व्यवहार नहीं हो सकता ।
अत परिशेषात् अनेकके साथ संसर्ग ही एकमात्र उक्त समानता व्यवहार-
का निमित्त हो सकता है । ऐसी स्थितिमें उस निमित्तके विध्यात्मक
जातिरूप होनेमें क्या विरोध है ? जिससे आपके द्वारा प्रदर्शित उक्त
व्याप्ति ( न्याय ) सिद्ध हो सके । बल्कि उस निमित्तके निषेधरूप
( अतद्व्यावृत्तिरूप ) होनेमे ही पूर्वमें विरोध दिखाया जा चुका है ।
इसे अत्यधिक पल्लवित करना व्यर्थ है ।
एवं अपोहकल्पना पक्षमे प्रवृत्ति आदि व्यवहारोंका निर्वाह भी नहीं
हो सकता है । क्योंकि अन्य वस्तुके अवभाससे अन्य वस्तुमें प्रवृत्ति हो
तो घटज्ञानसे पटमें भी प्रवृत्ति होने लगेगी । अर्थात् बौद्धमतानुसार
यदि सविकल्पकज्ञानका विषय घटत्व न होकर अघटव्यावृत्ति हो तो उस
ज्ञानसे घटमें प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी ।
यदि कहो कि घटत्वका अध्यवसाय स्वीकार करनेसे उक्त दोष नहीं
होगा, तो यह अध्यवसाय क्या वस्तु है ? क्या अलीकका ( मिथ्याका )
वस्तुके धर्मके रूपमें भासित होना अध्यवसाय है ? या वस्तुके रूपमें
भासित होना ? अथवा उसका वस्तुके साथ भेदका अग्रह होना
२४० आत्मतत्त्वविवेके
न प्रथमः, विकल्पे तदनवभासनात् । न द्वितीयः, असा-
धारणविषयतया शब्दविकल्पयोरप्रवृत्तिप्रसङ्गात्, तस्यासाम-
यिकत्वात् । तस्माद् विकल्पवस्तुनोश्चक्षूरसवत् सर्वथा विरोध
एव । साधारणविषयत्वे तु वस्तुत्वाप्रतिभासनम्, तस्यासाधा-
रणत्वात् ।
न तृतीयः, प्रवृत्तिसामानाधिकरण्यनियमानुपपत्तेः,
भेदाग्रहस्य सर्वत्र सुलभत्वात् । अतेभ्यो भेदो गृहीत इति चेत्,
अध्यवसाय है या वस्तुकी वासनासे उत्पन्न हुआ अलीकका भान ही
अध्यवसाय है ?
इनमे प्रथम पक्ष ठीक नहीं है । क्योंकि वस्तुका भान नहीं होनेपर
उसके धर्मका भान नहीं होता । इसलिये आपके मतानुसार वस्तुका
अवगाहन नहीं करनेवाला सविकल्पक ज्ञान उसके धर्मके रूपमें अलीकका
भान नहीं करा सकता है ।
द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि तब वस्तुके समान तत्स्वरूप
अलीकके भी असाधारणविषय ( स्वलक्षण ) होनेसे उसमे शब्द और
विकल्पकी प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । अर्थात् सङ्केतग्रहके अधीन शब्दकी
प्रवृत्ति होती है, और वह सङ्केतग्रह अनन्त ( स्वलक्षण ) व्यक्तियोंमे
नहीं हो सकता । और विकल्प भी अनुगत बाह्य आकारका आलम्बन
करके ही प्रवृत्त होता है । इसलिये चक्षु और रसके समान विकल्प
और वस्तुमे सर्वथा विरोध ही है । अर्थात् जैसे चक्षुद्वारा रसका
ग्रहण नहीं होता वैसे विकल्पद्वारा वस्तुरूप अलीकका भी ग्रहण नहीं
हो सकता है ।
यदि अलीकको साधारण विषय मानो तो विकल्पद्वारा उसका तो
भान हो जायगा किन्तु उसमे वस्तुत्वका भान न हो सकेगा । क्योंकि
स्वलक्षणात्मक वस्तुत्व असाधारण विषय होता है।
तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि उस अलीकका सभी वस्तुके
साथ भेदका अग्रह सुलभ होनेसे उस अलीकाध्यवसायसे किस वस्तुमे
प्रवृत्ति हो और उसके साथ किस वस्तुमे “अय गौ” इस प्रकारका
किन्तेषु गृह्यमाणेष्वगृह्यमाणेषु वा ? नाद्यः, अतेषामपि स्वल-
क्षणानां विकल्पागोचरत्वात् । न द्वितीयः, अविज्ञाता१-
वधेर्भेदस्याप्रथनात्, प्रथने वाऽध्यवसेयाभिमतस्वलक्षणादपि
भेदो गृह्येत, अविशेषात् । गृहीतादद्य भेदस्यागृहीतेभ्यस्तु
शाब्दसामानाधिकरण्य (शाब्दबोध) हो, यह नियम नहीं बन
सकता है।
यहाँ यदि यह कहो कि—जो अतन् (उससे भिन्न) हैं, उनसे इस
अलीकका भेद गृहीत होता है—तो क्या वे अतत् (तद्भिन्न) स्वयं गृह्यमाण
हैं या अगृह्यमाण हैं ? यहा प्रथम नहीं हो सकता, क्योंकि अतत् भी
आपके मतानुसार स्वलक्षण हैं । इसलिये वे सविकल्पक ज्ञानके विषय
नहीं हो सकते हैं। द्वितीय भी नहीं हो सकता, क्योंकि अवधिका
ज्ञान हुए बिना भेदका ज्ञान नहीं होता। यदि हो तो अलीका-
ध्यवसायका अधिष्ठानभूत जो आपका अभिमत गवादि स्वलक्षण है, वह
भी अतद्भूत महिषादिकोंके समान ही अज्ञात है। इसलिये उससे भी
अलीकमे भेदग्रह होने लगेगा, जिसके परिणामस्वरूप गोविषयक
सविकल्पक ज्ञानसे गौमें ही प्रवृत्ति न हो सकेगी।
यदि कहो कि—अभिमत गोस्वलक्षणका निर्विकल्पक ग्रहण होता है
और उसके बाद जो सविकल्पक होता है, वह भी निर्विकल्पक जैसा ही
होता है। इसलिये गोस्वलक्षणके गृहीत होनेसे उससे अलीक मे भेदग्रह
नहीं होगा और अतद् (तद्भिन्न) महिषादिकोंके तो उभयथा अगृहीत
होनेसे उससे गृह्यमाण अलीकमे भेदका ग्रह होगा ही। अत गौमे
ही प्रवृत्ति करायेगा न कि महिषादिमे—तो यहा यह भेद यदि धर्मरूप
माना जाय तो उक्त कथनके विपरीत ही होगा। अर्थात् प्रतियोगीका
ज्ञान होनेपर ही उसके अन्योन्याभावका ज्ञान होता है। इसलिये
अज्ञात महिषादिकोंका अन्योन्याभाव अलीक अपोहमे नहीं गृहीत हो
सकता है। इस प्रकार भेदका अग्रह प्रवृत्तिका कारण हो तो गोविक-
ल्पसे महिषादिमे भी प्रवृत्ति होनी चाहिये।
यदि वह भेद अधिकरणस्वरूप माना जाय तो अधिकरणस्वरूपके
१ अनिर्णीता इति १पु० पा०
१४२ आत्मतत्त्वविवेके
तद्ग्रह इति चेत्, यदि धर्मलक्षणो भेदस्तदा विपर्ययः । स्वरूप-
लक्षणश्चेत्, अविशेषात् सर्वतस्तद्ग्रहोऽन्यत्र तादात्म्यग्रहात् ।
निःस्वरूपत्वात् तस्य न स्वरूपलक्षणो भेद इति चेत्,
अगृहीतादपि तथा स्यात्, अविशेषात् । निःस्वरूपमपि सस्व-
रूपमिव भिन्नमिव प्रथितमिति चेत्, तत् किमध्यवसेयापेक्षया
सस्वरूपमिव न प्रथितम् ? अध्यवसेयस्वरूपमिव वा स्फुरि-
ज्ञानके लिये प्रतियोगीविशेषकी अपेक्षा नहीं हुआ करती, इसलिये
उस स्वरूपलक्षण भेदका ग्रह जैसे महिषादि स्वलक्षणसे होता है,
वैसे ही गोस्वलक्षणसे भी होने लगेगा । कारण, एकमात्र तादात्म्यग्रह ही
भेदग्रहका प्रतिबन्धक होता है और आपके अपोहका किसी भी वस्तुके
साथ तादात्म्यग्रह है नहीं । इसलिये अपोहरूप अलीकाध्यवसायसे
गौ महिष आदि सभी स्वलक्षणोंमे समानरूपसे प्रवृत्ति होनी चाहिये ।
यदि कहो कि—अलीक होनेके कारण अपोह निःस्वरूप है, इस-
लिये निर्विकल्पकवेद्य गोस्वलक्षणके प्रति उसका स्वरूपलक्षण भेद कैसे
हो सकता है ?—तो वहा गोविषयक निर्विकल्पक ज्ञानसे नहीं गृहीत
होनेवाले महिषादिके प्रति भी अगोपोहका स्वरूपलक्षण भेद कैसे हो
सकता है ? क्योंकि महिषके प्रति भी वह अपोह निःस्वरूप ही है ।
यदि कहो कि —निःस्वरूप होता हुआ भी वह अपोह महिषादिके
प्रति सस्वरूप जैसा और भिन्न जैसा प्रतीत होता है —तो क्या
अध्यवसायके अधिष्ठानभूत गोस्वलक्षणके प्रति वह अपोह सस्वरूप जैसा
नहीं प्रतीत होता ? या अध्यवसेय जो गोस्वलक्षण तत्स्वरूप भासित
होता है ? आद्य पक्ष मे दो प्रकार हो सकते हैं । या तो ज्ञानका
विषय नहीं होनेसे अपोह सस्वरूप जैसा नहीं भासित होगा अथवा
सस्वरूप जैसा भासित न होनेका अभिप्राय है—निःस्वरूप भासित
होना । दोनों ही दशाओंमे गोके सविकल्पक ज्ञानसे गौमें प्रवृत्ति
नहीं हो सकेगी । और "अय गौ" ऐसा शब्दसामानाधिकरण्य भी
नहीं हो सकता है । अर्थात् अपोहके अज्ञानमे भी उक्त सामानाधिकरण्य
६ . . . नवादः १४३
तम् ? आद्येऽप्रतिपत्तिर्वा स्यात् । उभयथापि सामानाधि-
-करण्यप्रवृत्ती न स्याताम् । द्वितीयस्तु प्रागेव दूषितः ।
नापि चतुर्थः, नीलानुभववासनासमुत्थस्य पीतानुभवस्य
नीले प्रवर्त्तकत्वप्रसङ्गात् । नानुभवः प्रवर्त्तकोऽपि तु विकल्पः, स
च यस्मात् , तस्यैव विषये इति चेत् , यस्मादिति साक्षात्
और प्रवृत्ति नहीं हो सकती तथा उसके निःस्वरूपत्वज्ञानमे भी सामाना-
धिकरण्य और प्रवृत्ति नहीं हो सकती है ।
द्वितीय पक्षका तो पहले ही खण्डन किया जा चुका है । क्योंकि
सविकल्पक ज्ञानमे जब गोस्वलक्षणका स्पर्श ही नहीं होता तो उसके
द्वारा अपोह गोस्वलक्षणस्वरूप कैसे भासित हो सकता है ?
एव 'वस्तुज्ञानसे जन्य जो वासना, उससे उत्पन्न होना ही
अध्यवसाय है" यह पूर्वोक्त चतुर्थ पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि
बौद्ध मतमे वासना कोई स्थायी सस्कार नहीं होती, किन्तु एक ज्ञानके
बाद उत्पन्न होनेवाला दूसरा ज्ञान ही वासना है । इस प्रकार नीला
नुभवरूप वासनाके अनन्तर उत्पन्न जो पीतानुभव उससे भी नीलमें
प्रवृत्ति होने लगेगी ।
यदि कहो कि-कोई भी निर्विकल्पक अनुभव प्रवर्त्तक नहीं होता
किन्तु सविकल्पक ही प्रवृत्तिका जनक होता है । और वह सविकल्पक भी
जिस निर्विकल्पकसे उत्पन्न होता है, उसीके विषयमे प्रवृत्ति कराता
है । इसलिये पीतका निर्विकल्पक अनुभव प्रवृत्तिका जनक नहीं होगा
किन्तु उसके सविकल्पकसे ही प्रवृत्ति होगी । और वह प्रवृत्ति भी
पीतविषयमे ही होगी न कि नीलविषयमे । क्योंकि पीतविषयक निर्वि-
कल्पकसे ही वह सविकल्पक उत्पन्न हुआ है, इसलिये निर्विकल्पकका
विषयीभूत जो पीत, उसीमे प्रवृत्ति करायेगा, नीलमे नहीं-तो यहाँ
सविकल्पकका निर्विकल्पकसे साक्षात् उत्पन्न होना विवक्षित है ? अथवा
परम्परया ? यदि साक्षात् उत्पन्न होना विवक्षित हो तो शाब्दज्ञान
और अनुमितिज्ञानसे प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । क्योकि शाब्दज्ञान
सकेतविषयक सविकल्पक ज्ञानसे उत्पन्न होता है और अनुमितिज्ञान
भी व्याप्तिविषयक सविकल्पक ज्ञानसे ही उत्पन्न होता है । यदि
१४४ आत्मतत्त्वविवेके
परम्परया वा ? प्रथमे शाब्दलैङ्गिकज्ञानानामप्रवर्त्तकत्वप्रसङ्गः ।
द्वितीये तु स एवातिप्रसङ्गः ।
अनुभवव्यापारपुरस्कारान्नियम इति चेत् , कः पुरस्का-
रार्थः ? न तावदनुभवैकविषयत्वम् , विकल्पेन तदसंस्पर्शात् ।
नाप्यनुभवत्वारोपः, स्वात्मनि कल्पनापोढाभ्रान्तत्वात् ,
विषये चाभिलापसंसर्गयोग्यप्रतिभासत्वात् , तथानवभासे वा
विकल्पत्वव्याघातात् , विशेषोपलब्धौ चारोपासम्भवात् ।
परम्परया कहें तो नीलविषयक निर्विकल्पक भी पीतविषयक सविकल्पक
का परम्परया जनक होता है, इसलिये आपके नियमानुसार पीत-
सविकल्पकसे भी नीलमे प्रवृत्ति होने लगेगी ।
यदि कहो कि—जो विकल्प जिस अनुभवके धर्मको पुरस्कृत कर
उत्पन्न होता है, वह उसीके विषयम प्रवृत्ति कराता है । इस नियमसे
अन्यत्र प्रवृत्तिका वारण हो जाता है—तो यहा पुरस्कारका क्या अर्थ है ?
यह नहीं हो सकता कि 'अनुभव (निर्विकल्पक) के समान विषयवाला
होना ही उसके धर्मको पुरस्कृत करना है' क्योंकि आपके मतमे सवि-
कल्पक ज्ञान अनुभवविषयीभूत स्वलक्षणको छूता ही नहीं है ।
यह भी नहीं हो सकता कि "नीलानुभवत्वधर्मका नीलविकल्पमे
आरोप ही पुरस्कार है, इसलिये नीलविकल्पसे नीलमे ही प्रवृत्ति होगी"
क्योंकि अनुभवत्वका आरोप विकल्पके स्वरूपमे नहीं हो सकता ।
कारण विकल्प अपने स्वरूपके सम्बन्धमें काल्पनिकतासे रहित होनेसे
अनारोपित वस्तु है ।
एव विकल्पका जो विषय, उसमे भी अनुभवत्वका आरोप नहीं हो
सकता, क्योंकि विकल्पका जो विषय होता है, वह शब्दप्रयोगके योग्य
होनेके कारण आपके मतमे बाह्य और अलीकरूपसे भासित होता है ।
इसलिये अलीकत्वरूप अपने विशेषधर्मके साथ भासित होनेवाले
विकल्प विषयमे अनुभवत्वधर्मका आरोप हो नहीं सकता। क्योंकि
अन्यधर्मके आरोपके प्रति अपना विशेषधर्मदर्शन बाधक होता है ।
यदि अलीकत्वरूप विशेषधर्मके साथ विकल्प विषयका भान न हो
क्षणभङ्गवाद. १४५
नापि तद्धर्मप्रामाण्यारोपः, तस्यानियतविषयत्वे प्रवृत्ति-
नियमानुपपत्तेः। परमार्थसद्विषयत्वे च तस्य विकल्पसंसर्ग-
प्रसङ्गात् । अलीकविषयत्वे चाप्रवृत्तेः । अलीकस्यानलीक-
तया स्फुरणं तु निषिद्धम् ।
नाप्यनुभवात् स्वात्मनो भेदाग्रह एव तद्व्यापारपुरस्कारः,
तो वह विकल्प ही नहीं हो सकता और यदि हो तो तथाकथित आरोप
नहीं हो सकता है ।
अनुभवगत प्रामाण्यका सविकल्पकमें आरोप भी पुरस्कारका अभि-
प्राय नहीं हो सकता । क्योंकि वह प्रामाण्य यदि अनियतविषयक हो
अर्थात् विषयविशेषसे अघटित होता हुआ सामान्यरूपसे आरोपित
होता हो तो उस विकल्पसे किस विषयमे प्रवृत्ति होगी, इसका नियम
नहीं हो सकता है ?
यदि वह प्रामाण्य स्वलक्षणात्मक पारमार्थिक विषयसे गर्भित हो
तो सविकल्पक ज्ञानमें भी स्वलक्षणका संसर्ग होने लगेगा, जो आपको
अनिष्ट है । अर्थात् जो सविकल्पक स्वलक्षणात्मक वस्तुको ग्रहण नहीं
करता, वह उससे गर्भित प्रामाण्यका ग्राहक कैसे हो सकता है ? और यदि
वह प्रामाण्य अलीक विषयसे गर्भित हो तो, चूँकि आपके मतमे अलीक
वस्तु अनुभवका विषय नहीं होती, इसलिये अलीकसे गर्भित प्रामाण्य
अनुभवका धर्म भी नहीं हो सकता है । ऐसी स्थितिमे अनुभवगत
प्रामाण्यका आरोप नहीं हो सकनेके कारण सविकल्पक ज्ञानसे फिर
भी नियत विषयमे प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी ।
यदि कहो कि-पहले अलीक विषयमे पारमार्थिकत्वका आरोप होगा
और बादमे तद्गर्भित प्रामाण्यका आरोप सविकल्पकमे हो जायगा,
इसलिये विषयविशेषमे प्रवृत्ति होनेमे कोई भी बाधा नहीं है—तो उक्त
कथन पूर्वमे ही निषिद्ध हो चुका है । अर्थात् अलीकत्वरूपविशेषधर्मके
दर्शनके कारण उसमे पारमार्थिकवस्तुबुद्धि ही नहीं उत्पन्न हो सकती है ।
"अनुभवका विकल्पमे भेदग्रह न होना ही अनुभवव्यापारको
विकल्पद्वारा पुरस्कृत करना है" यह भी नहीं कहा जा सकता । क्योंकि
बौद्धमतमे सभी ज्ञान स्वयंप्रकाश होते हैं, इसलिये उत्पन्न होता हुआ
१०
स्वरूपस्य स्वतोऽवगतेः विषयभेदस्य च प्रागेन निरूपणात् ।
नाप्यापारोक्ष्यम्, तस्यापि स्वात्मनि सर्वज्ञानसाधारणत्वात् ।
विषये च विकल्पस्य तदभावात् । तथाभावेऽप्यन्यत्र नियत-
प्रवृत्त्यनुपपत्तेः ।
नापि विषयसारूप्यम्, तदभावात् । का हि परमार्थ-
सदलीकयोः समानरूपता नाम । यदि रूपशब्दो धर्मिवाचक
सविकल्पक ज्ञान अनुभव (निर्विकल्पक) से स्वरूपभेदको स्वतः ग्रहण
करता हुआ ही उत्पन्न होता है ।
यदि अनुभव और विकल्पके अलीकविषयगत भेदका अग्रह होना
पुरस्कार मानें तो इसका विवेचन पूर्वमें ही किया जा चुका है।
अर्थात् विकल्पके अलीक विषयमे अनुभवविषयका पारमार्थिक भेद नहीं
रह सकता।
"जैसी अपरोक्षता अनुभवमे है वैसी ही विकल्पमें भी है।
इसलिये विकल्पज्ञान अनुभवविषयमें ही प्रवृत्ति कराता है, अन्यत्र
नहीं", इस प्रकारका अपारोक्ष्य भी अनुभवव्यापारका पुरस्कार नहीं
कहा जा सकता है। क्योंकि यहाँ यदि ज्ञानगत अपरोक्षता ली जाय
तो सभी ज्ञान अपने स्वरूपमें अपरोक्ष ही हैं। इसलिये सब ज्ञानसे
सब विषयमे प्रवृत्ति होने लगेगी। यदि विषयगत अपरोक्षताको लेकर
अनुभव और विकल्पका साम्यसम्बन्ध कहा जाय, तो विकल्प विषयके
अलीक होनेके कारण उसमें अपरोक्षताका ही अभाव है। विकल्प
विषयमे यदि अपरोक्षता मान भी ली जाय तो भी अलीक विषयक
विकल्पज्ञानसे अलीकभिन्न स्वलक्षणत्मक विषयमें नियत प्रवृत्ति
नहीं बन सकेगी। क्योंकि अन्य विषयके ज्ञानसे अन्य विषयमे
प्रवृत्ति नहीं होती है।
निर्विकल्पक ज्ञानका विषय जो स्वलक्षण और सविकल्पक ज्ञानका
विषय जो अलीक इन दोनोंमें सारूप्य होना भी विकल्पद्वारा अनुभव
(निर्विकल्पक) के व्यापारको पुरस्कृत करना नहीं है। कारण, यहाँ
सारूप्य नहीं हो सकता है। क्योंकि पारमार्थिक और अलीकमें कौन
सी समानरूपता है ? यदि 'समानरूपता' इस शब्दमे रूपशब्द धर्मीका
समानशब्दश्चैकपर्यायः, क्वार्थसंगतिः प्रकृते। यदि वा रूपं
धर्मः समानश्चैको वैकजातीयो वेति, तथापि क्वार्थसङ्गतिः
प्रकृते। अतद्व्यावृत्तिरिति चेत्, न, तस्य चालीकानलीक-
निष्ठतया एकत्वैकजातीयत्वयोरभावात्। आभिमानिकोऽयं
सारूप्यव्यवहारो न पारमार्थिक इति चेत्, न, अभिमानस्यैव
चिन्त्यमानत्वात्। न हि चिन्तितप्रकारान् परिभूयापरोऽ-
भिमानो नाम।
स्वभावादेव कश्चिद् विकल्पः कस्मिंश्चिदेवास्फुरितेऽपि
वाचक हो और समानशब्दका अर्थ एकत्व हो तो प्रकृतमे कैसे अर्थसंगति
हो सकती है ? क्योंकि आपके मतमे सविकल्पक और निर्विकल्पक दोनों
ज्ञानोंमे एक धर्मी (वस्तु) नहीं भासित होता है। यदि रूपशब्दसे वस्तुका
धर्म लिया जाय और समानशब्दका अर्थ हो एक अथवा एकजातीय, तो
भी प्रकृतमे अर्थकी सङ्गति कैसे हो सकती है ? क्योंकि विकल्प और
अनुभवका विषय न एक धर्म है और न एक जातिका धर्म है।
यदि कहो कि—अतद्व्यावृत्ति ही विकल्पविषय और अनुभवविषय
मे रहने वाला समान धर्म है—तो यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि
जो अतद्व्यावृत्ति विकल्पविषयमे रहेगी वह अलीकनिष्ठ होनेसे असद्-
रूप होगी और जो अनुभवविषयमे रहनेवाली अतद्व्यावृत्ति होगी वह
अलीकभिन्ननिष्ठ अर्थात् सत्यनिष्ठ होनेके कारण सद्रूप होगी। इसलिये
सद् और असद्रूप होनेसे दोनों विषयोंकी अतद्व्यावृत्ति न एक होगी
और न एक जातिकी होगी।
यदि कहो कि—विकल्प और अनुभवके विषयोंमे सारूप्य व्यवहार
पारमार्थिक नहीं है, किन्तु आभिमानिक ( काल्पनिक ) है, इसलिये
अर्थसङ्गति होना आवश्यक नहीं है—तो यह कथन भी ठीक नहीं है।
क्योकि अभिमान ( कल्पना या आरोप ) ही तो यहा विचारणीय विषय
है। साथ ही विकल्प एव अनुभवसम्बन्धी आरोपके बारेमे अबतक
जितने प्रकार विचारे जा चुके हैं, उनसे अतिरिक्त अभिमानका कोई
दूसरा स्वरूप हो भी नहीं सकता है।
यदि कहो कि—स्वभावसे ही कोई विकल्प किसी खास वस्तुमे ही
१४८ आत्मतत्त्वविवेके
प्रवर्तयति, किमत्र क्रियताम् । स चास्य स्वभावभेदः स्वकार-
णादेवायात., तत्र कः पर्य्यनुयोज्यतामिति चेन्, तत् किम-
प्रत्यासन्न एव विकल्पस्तत्र प्रवर्तयति ? प्रत्यासत्त्यन्तरा-
भावात् स्वभावप्रत्यासन्नो वा व्यहृतिरेव वा प्रत्यासत्ति. ?
न प्रथमः, अतिप्रसङ्गात् । द्वितीये तु स्वभावेनोत्तर स्यात्,
किन्तु तदेव स्फुरणम् । न हि व्यवहारे प्रवर्तयितव्ये स्वभाव-
प्रत्यासत्तिमनधूय ज्ञानज्ञेययोरपरः कश्चिद् विषयविषयिभावः ।
सदसदनिर्वचनीयार्थख्यातिवादिभिरपि स्वभावप्रत्यासत्तेरवर्ज-
नीयत्वादिति वक्ष्यमाणत्वात् ।
प्रवृत्ति कराता है, भले ही वह वस्तु उस विकल्पद्वारा भासित न होती हो ?
इसमे क्या किया जाय ? और विकल्पका यह स्वभावविशेष उसे अपने
कारणसे ही प्राप्त है। इसलिये स्वभावके सम्बन्धमे भी कुछ कहनेके
लिये किसे बाध्य किया जाय—तो क्या वह विकल्प उस वस्तुसे
असम्बद्ध ही रहकर उसमें प्रवृत्ति कराता है ? या स्वभावातिरिक्त
सम्बन्धके नहीं रहनेसे उस वस्तुसे स्वभावत सम्बद्ध होकर उसमे
प्रवृत्ति कराता है ? अथवा उस वस्तुके बारेमें लौकिक व्यवहारोंको
कराना ही उसके साथ विकल्पका सम्बन्ध है ?
इनमे प्रथमपक्ष नहीं माना जा सकता है। क्योंकि उस विकल्पसे
अनियन्त्रितरूपमें सभी वस्तुओंमें प्रवृत्ति होने लगेगी । द्वितीयपक्षमे
तो स्वभाववाला उत्तर हो सकता है, किन्तु वही तो वस्तुका स्फुरण है।
क्योंकि प्रवृत्ति आदि व्यवहार करानेके लिये स्वाभावरूप सम्बन्धके
अलावे ज्ञान (विकल्प) और ज्ञेय (वस्तु) का दूसरा कोई विषय
विषथिभाव नहीं है। अर्थात् नियत विषयमें प्रवृत्तिके लिये उस विषय
के साथ सविकल्पक ज्ञानको स्वभावत सम्बद्ध माना जाय तो वह
स्वलक्षणात्मक वस्तु भी विकल्पका विषय हो ही गयी। जिनका यह मत
है कि सत् या असतरूपसे अनिर्वचनीय वस्तुका ही विकल्पद्वारा भान
होता है, उन्हें भी वस्तु और विकल्पका स्वाभाविक सम्बन्ध मानना ही
पडता है। यह बात आगे कही जायगी ।
क्षणभङ्गवादः १४९
तृतीये तु व्यक्तमात्माश्रय', स्वव्यवहार¹ नियमं प्रत्येव
निमित्ता²नुसरणात् ।
कारणशक्तेरसदुत्पत्तिवन्नियम इति चेत्, सत्यम्, एतच्चि-
न्तनीयम्, कारणशक्त्याऽपि नियतजातिनियतया भवितव्यम् ।
अन्यथा ज्वलनविकल्पाज्जलेऽपि प्रवृत्तिप्रसङ्गात् ।
दाहादिसमर्थाकारविकल्पजातीय तात्त्विके वह्नौ प्रवर्त-
यतीति जातिरुपाधिर्वा नियामक इति चेत्, न तर्हि रत्न-
मरीचिनिचये ततः प्रवर्तेत, तज्जातीयस्य दहन एव प्रवर्तन-
तृतीय पक्षमें तो स्पष्ट ही आत्माश्रयदोष है। क्योंकि इस पक्षमे
जो लौकिक व्यवहार सम्बन्ध्यरूपसे निमित्त माना गया है, वही नियत
प्रवृत्ति आदि लौकिक व्यवहार उस निमित्तानुसरणका उद्देश्य भी
है। इस प्रकार स्वमे स्वकी अपेक्षा होनेसे यहा आत्माश्रयदोष
आ जाता है।
यदि कहो कि—दण्डरूप कारणका असत् घटके साथ कोई सम्बन्ध
नहीं रहने पर भी दण्ड घटको ही पैदा करता है, पटादिको नहीं, उसी
प्रकार गोविकल्पका गोस्वलक्षणके साथ सम्बन्ध न होने पर भी गोविकल्प
से गौमे ही प्रवृत्ति होगी महिषादिमे नहीं—तो यह सही है, किन्तु यह
भी विचारणीय है कि जैसे किसी अनुगत जाति (धर्म) से युक्त कारणका
किसी अनुगत जातिसे युक्त कार्यके साथ नियत अन्वय व्यतिरेक रहता
है, उसी प्रकार गोविकल्पका गोविषयक प्रवृत्तिके साथ अन्वय व्यतिरेक
होनेमे नियामकके रूपमें कोई अनुगत जाति होनी चाहिये। नहीं तो
अग्निविषयक विकल्पज्ञानसे जलमे भी प्रवृत्ति होने लगेगी।
यदि कहो कि—"दाहादिसमर्थोऽयम्" इस आकारवाला जो जो
विकल्प होगा वह स्वलक्षणविषयक नहीं होने पर भी स्वलक्षणात्मक
तात्त्विकवह्निमे प्रवृत्ति करायेगा, इस प्रकार दाहादिसामर्थ्यरूप जो उक्त
विकल्पज्ञानका आकार है वही अनुगत जाति या धर्मके रूपमे प्रवृत्तिका
१. अव्यवहार इति २ पु० पा० २. निबन्धनानुस० इति २ पु० पा०