आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः १३९
निमित्तो नाप्यनेकासंसर्गैकनिमित्तः, अतिप्रसङ्गात् । ततोऽने-
कसंसर्गैकनिमित्तोऽयं परिशिष्यते। तथा च तादृशस्य विधि-
रूपत्वे को विरोधः ? येन व्याप्तिः स्यात् । प्रत्युत निषेधरूप-
तायामेव विरोधो दर्शितः प्रागिति कृतं पल्लवसमुल्लासैः ।
नापि प्रवृत्त्यादिव्यवहारनिर्वाहकत्वमपोहकल्पनायाः,
अन्यावभासादन्यत्र प्रवृत्तावतिप्रसङ्गात् । अध्यवसायादयम-
दोष इति चेत्, अथ कोऽयमध्यवसायः ? किमलीकस्य वस्तु-
धर्मतयाऽवभासः ? किं वा वस्त्वात्मकतया ? ततो भेदाग्रहो,
वस्तुवासनासमुत्थं वा ?
यह भी नहीं हो सकता कि समानता व्यवहारके अनेक निमित्त हों,
क्योंकि तब अनुगत व्यवहार नहीं हो सकेगा । इसी प्रकार अनेकके
साथ असंसर्गकी दशामे भी उक्त समानता व्यवहार नहीं हो सकता ।
अत परिशेषात् अनेकके साथ संसर्ग ही एकमात्र उक्त समानता व्यवहार-
का निमित्त हो सकता है । ऐसी स्थितिमें उस निमित्तके विध्यात्मक
जातिरूप होनेमें क्या विरोध है ? जिससे आपके द्वारा प्रदर्शित उक्त
व्याप्ति ( न्याय ) सिद्ध हो सके । बल्कि उस निमित्तके निषेधरूप
( अतद्व्यावृत्तिरूप ) होनेमे ही पूर्वमें विरोध दिखाया जा चुका है ।
इसे अत्यधिक पल्लवित करना व्यर्थ है ।
एवं अपोहकल्पना पक्षमे प्रवृत्ति आदि व्यवहारोंका निर्वाह भी नहीं
हो सकता है । क्योंकि अन्य वस्तुके अवभाससे अन्य वस्तुमें प्रवृत्ति हो
तो घटज्ञानसे पटमें भी प्रवृत्ति होने लगेगी । अर्थात् बौद्धमतानुसार
यदि सविकल्पकज्ञानका विषय घटत्व न होकर अघटव्यावृत्ति हो तो उस
ज्ञानसे घटमें प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी ।
यदि कहो कि घटत्वका अध्यवसाय स्वीकार करनेसे उक्त दोष नहीं
होगा, तो यह अध्यवसाय क्या वस्तु है ? क्या अलीकका ( मिथ्याका )
वस्तुके धर्मके रूपमें भासित होना अध्यवसाय है ? या वस्तुके रूपमें
भासित होना ? अथवा उसका वस्तुके साथ भेदका अग्रह होना