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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 190, कुल 530 में से

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पृष्ठ 190

किन्तेषु गृह्यमाणेष्वगृह्यमाणेषु वा ? नाद्यः, अतेषामपि स्वल-
क्षणानां विकल्पागोचरत्वात् । न द्वितीयः, अविज्ञाता१-
वधेर्भेदस्याप्रथनात्, प्रथने वाऽध्यवसेयाभिमतस्वलक्षणादपि
भेदो गृह्येत, अविशेषात् । गृहीतादद्य भेदस्यागृहीतेभ्यस्तु

शाब्दसामानाधिकरण्य (शाब्दबोध) हो, यह नियम नहीं बन
सकता है।
यहाँ यदि यह कहो कि—जो अतन् (उससे भिन्न) हैं, उनसे इस
अलीकका भेद गृहीत होता है—तो क्या वे अतत् (तद्भिन्न) स्वयं गृह्यमाण
हैं या अगृह्यमाण हैं ? यहा प्रथम नहीं हो सकता, क्योंकि अतत् भी
आपके मतानुसार स्वलक्षण हैं । इसलिये वे सविकल्पक ज्ञानके विषय
नहीं हो सकते हैं। द्वितीय भी नहीं हो सकता, क्योंकि अवधिका
ज्ञान हुए बिना भेदका ज्ञान नहीं होता। यदि हो तो अलीका-
ध्यवसायका अधिष्ठानभूत जो आपका अभिमत गवादि स्वलक्षण है, वह
भी अतद्भूत महिषादिकोंके समान ही अज्ञात है। इसलिये उससे भी
अलीकमे भेदग्रह होने लगेगा, जिसके परिणामस्वरूप गोविषयक
सविकल्पक ज्ञानसे गौमें ही प्रवृत्ति न हो सकेगी।
यदि कहो कि—अभिमत गोस्वलक्षणका निर्विकल्पक ग्रहण होता है
और उसके बाद जो सविकल्पक होता है, वह भी निर्विकल्पक जैसा ही
होता है। इसलिये गोस्वलक्षणके गृहीत होनेसे उससे अलीक मे भेदग्रह
नहीं होगा और अतद् (तद्भिन्न) महिषादिकोंके तो उभयथा अगृहीत
होनेसे उससे गृह्यमाण अलीकमे भेदका ग्रह होगा ही। अत गौमे
ही प्रवृत्ति करायेगा न कि महिषादिमे—तो यहा यह भेद यदि धर्मरूप
माना जाय तो उक्त कथनके विपरीत ही होगा। अर्थात् प्रतियोगीका
ज्ञान होनेपर ही उसके अन्योन्याभावका ज्ञान होता है। इसलिये
अज्ञात महिषादिकोंका अन्योन्याभाव अलीक अपोहमे नहीं गृहीत हो
सकता है। इस प्रकार भेदका अग्रह प्रवृत्तिका कारण हो तो गोविक-
ल्पसे महिषादिमे भी प्रवृत्ति होनी चाहिये।
यदि वह भेद अधिकरणस्वरूप माना जाय तो अधिकरणस्वरूपके


१ अनिर्णीता इति १पु० पा०