आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः १४९
तृतीये तु व्यक्तमात्माश्रय', स्वव्यवहार¹ नियमं प्रत्येव
निमित्ता²नुसरणात् ।
कारणशक्तेरसदुत्पत्तिवन्नियम इति चेत्, सत्यम्, एतच्चि-
न्तनीयम्, कारणशक्त्याऽपि नियतजातिनियतया भवितव्यम् ।
अन्यथा ज्वलनविकल्पाज्जलेऽपि प्रवृत्तिप्रसङ्गात् ।
दाहादिसमर्थाकारविकल्पजातीय तात्त्विके वह्नौ प्रवर्त-
यतीति जातिरुपाधिर्वा नियामक इति चेत्, न तर्हि रत्न-
मरीचिनिचये ततः प्रवर्तेत, तज्जातीयस्य दहन एव प्रवर्तन-
तृतीय पक्षमें तो स्पष्ट ही आत्माश्रयदोष है। क्योंकि इस पक्षमे
जो लौकिक व्यवहार सम्बन्ध्यरूपसे निमित्त माना गया है, वही नियत
प्रवृत्ति आदि लौकिक व्यवहार उस निमित्तानुसरणका उद्देश्य भी
है। इस प्रकार स्वमे स्वकी अपेक्षा होनेसे यहा आत्माश्रयदोष
आ जाता है।
यदि कहो कि—दण्डरूप कारणका असत् घटके साथ कोई सम्बन्ध
नहीं रहने पर भी दण्ड घटको ही पैदा करता है, पटादिको नहीं, उसी
प्रकार गोविकल्पका गोस्वलक्षणके साथ सम्बन्ध न होने पर भी गोविकल्प
से गौमे ही प्रवृत्ति होगी महिषादिमे नहीं—तो यह सही है, किन्तु यह
भी विचारणीय है कि जैसे किसी अनुगत जाति (धर्म) से युक्त कारणका
किसी अनुगत जातिसे युक्त कार्यके साथ नियत अन्वय व्यतिरेक रहता
है, उसी प्रकार गोविकल्पका गोविषयक प्रवृत्तिके साथ अन्वय व्यतिरेक
होनेमे नियामकके रूपमें कोई अनुगत जाति होनी चाहिये। नहीं तो
अग्निविषयक विकल्पज्ञानसे जलमे भी प्रवृत्ति होने लगेगी।
यदि कहो कि—"दाहादिसमर्थोऽयम्" इस आकारवाला जो जो
विकल्प होगा वह स्वलक्षणविषयक नहीं होने पर भी स्वलक्षणात्मक
तात्त्विकवह्निमे प्रवृत्ति करायेगा, इस प्रकार दाहादिसामर्थ्यरूप जो उक्त
विकल्पज्ञानका आकार है वही अनुगत जाति या धर्मके रूपमे प्रवृत्तिका
१. अव्यवहार इति २ पु० पा० २. निबन्धनानुस० इति २ पु० पा०