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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 530 में से

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पृष्ठ 184

क्षणभङ्गवादः १३५
क्रियाविरहादेकमेव तत्र वस्तु, न चैकस्मिन् प्रतिभासभेद
इत्येक एव प्रत्ययस्तत्र सालम्बन इति ब्रूम इति चेत्, तथापि
कतम इत्यनिश्चये स एवानाश्वासः ।
असंकीर्णाऽपि चार्थक्रिया न व्यक्तिः, सामग्रीतः सर्व-
संभवात् । अत एव न सन्तानतः । न ह्येकसन्ताननियता
काचिदर्थक्रिया नाम । काञ्चिदर्थक्रियां प्रति प्रत्यक्षानुपलम्भ-
गोचर एव तथा व्यवस्थाप्यत इति चेत्, तर्हि दूरतमाद्युपलब्धा
यदि कहो कि—यद्यपि कोई निश्चायक नहीं है, फिर भी वहाँ अर्थ-
क्रियाके सङ्कीर्ण नहीं होनेसे एक ही वस्तु है, और एक वस्तुमें भिन्न
प्रतीति नहीं हो सकती, अतः एक ही प्रतीति वहाँ सविषयक है और शेष
प्रतीतियाँ निरालम्बन हैं—तो सत्त्वसे लेकर शिशपात्वप्रतीति तक कौन
सी प्रतीति ऐसी है, इसका निश्चय नहीं होनेसे किसी खास प्रतीतिकी
प्रामाणिकताके सम्बन्धमें वही अविश्वास कायम रहा।
यदि कहो कि—शिशपामे विशेष प्रकारकी पत्रकाण्ड आदि अर्थ-
क्रिया उसके सत्, द्रव्य, पृथिवी या वृक्षमात्र होनेसे होती तो कटहलके
भी सत्, द्रव्य, पृथिवी या वृक्ष होनेसे उसमें भी शिशपा जैसे ही पत्र
काण्डादि होते । अतः उस विशेष अर्थक्रियाके कारण शिशपाप्रतीति ही
प्रामाणिक निश्चित होती है—तो फिर भी यह असङ्कीर्ण अर्थक्रिया एक
व्यक्तिमात्रसे नहीं होती किन्तु सामग्रीसे होती है। इसीलिये व्यक्तिकी
अविच्छिन्न सन्ततिसे भी नहीं हो सकती । क्योंकि कोई भी अर्थक्रिया
(जैसे, अंकुरादि) एकमात्र बीजसन्ततिसे नहीं होती है किन्तु उसमें भी
मिट्टी पानी आदिकी सन्ततिकी भी अपेक्षा पहले बतायी जा चुकी है।
यदि कहो कि—किसी अर्थक्रियाके प्रति कारणरूपसे वही व्यवस्थित
किया जा सकता है, जिसका उस कार्यके प्रति अन्वय व्यतिरेक सहचार
हो। अर्थात् जिसके रहनेपर ही यह कार्य उत्पन्न हो और नहीं रहने-
पर न हो, वही उस कार्यका कारण है—तो दूरतम, दूरतर, दूर और
निकटसे द्रव्य, पृथिवी, वृक्ष और शिशपाके रूपमें उपलब्ध पदार्थके
सम्बन्धमें भी वही व्यवस्था होनी चाहिये। क्योंकि वे सभी उस अर्थ-