आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवाद. १४५
नापि तद्धर्मप्रामाण्यारोपः, तस्यानियतविषयत्वे प्रवृत्ति-
नियमानुपपत्तेः। परमार्थसद्विषयत्वे च तस्य विकल्पसंसर्ग-
प्रसङ्गात् । अलीकविषयत्वे चाप्रवृत्तेः । अलीकस्यानलीक-
तया स्फुरणं तु निषिद्धम् ।
नाप्यनुभवात् स्वात्मनो भेदाग्रह एव तद्व्यापारपुरस्कारः,
तो वह विकल्प ही नहीं हो सकता और यदि हो तो तथाकथित आरोप
नहीं हो सकता है ।
अनुभवगत प्रामाण्यका सविकल्पकमें आरोप भी पुरस्कारका अभि-
प्राय नहीं हो सकता । क्योंकि वह प्रामाण्य यदि अनियतविषयक हो
अर्थात् विषयविशेषसे अघटित होता हुआ सामान्यरूपसे आरोपित
होता हो तो उस विकल्पसे किस विषयमे प्रवृत्ति होगी, इसका नियम
नहीं हो सकता है ?
यदि वह प्रामाण्य स्वलक्षणात्मक पारमार्थिक विषयसे गर्भित हो
तो सविकल्पक ज्ञानमें भी स्वलक्षणका संसर्ग होने लगेगा, जो आपको
अनिष्ट है । अर्थात् जो सविकल्पक स्वलक्षणात्मक वस्तुको ग्रहण नहीं
करता, वह उससे गर्भित प्रामाण्यका ग्राहक कैसे हो सकता है ? और यदि
वह प्रामाण्य अलीक विषयसे गर्भित हो तो, चूँकि आपके मतमे अलीक
वस्तु अनुभवका विषय नहीं होती, इसलिये अलीकसे गर्भित प्रामाण्य
अनुभवका धर्म भी नहीं हो सकता है । ऐसी स्थितिमे अनुभवगत
प्रामाण्यका आरोप नहीं हो सकनेके कारण सविकल्पक ज्ञानसे फिर
भी नियत विषयमे प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी ।
यदि कहो कि-पहले अलीक विषयमे पारमार्थिकत्वका आरोप होगा
और बादमे तद्गर्भित प्रामाण्यका आरोप सविकल्पकमे हो जायगा,
इसलिये विषयविशेषमे प्रवृत्ति होनेमे कोई भी बाधा नहीं है—तो उक्त
कथन पूर्वमे ही निषिद्ध हो चुका है । अर्थात् अलीकत्वरूपविशेषधर्मके
दर्शनके कारण उसमे पारमार्थिकवस्तुबुद्धि ही नहीं उत्पन्न हो सकती है ।
"अनुभवका विकल्पमे भेदग्रह न होना ही अनुभवव्यापारको
विकल्पद्वारा पुरस्कृत करना है" यह भी नहीं कहा जा सकता । क्योंकि
बौद्धमतमे सभी ज्ञान स्वयंप्रकाश होते हैं, इसलिये उत्पन्न होता हुआ
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