आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 192, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें६ . . . नवादः १४३
तम् ? आद्येऽप्रतिपत्तिर्वा स्यात् । उभयथापि सामानाधि-
-करण्यप्रवृत्ती न स्याताम् । द्वितीयस्तु प्रागेव दूषितः ।
नापि चतुर्थः, नीलानुभववासनासमुत्थस्य पीतानुभवस्य
नीले प्रवर्त्तकत्वप्रसङ्गात् । नानुभवः प्रवर्त्तकोऽपि तु विकल्पः, स
च यस्मात् , तस्यैव विषये इति चेत् , यस्मादिति साक्षात्
और प्रवृत्ति नहीं हो सकती तथा उसके निःस्वरूपत्वज्ञानमे भी सामाना-
धिकरण्य और प्रवृत्ति नहीं हो सकती है ।
द्वितीय पक्षका तो पहले ही खण्डन किया जा चुका है । क्योंकि
सविकल्पक ज्ञानमे जब गोस्वलक्षणका स्पर्श ही नहीं होता तो उसके
द्वारा अपोह गोस्वलक्षणस्वरूप कैसे भासित हो सकता है ?
एव 'वस्तुज्ञानसे जन्य जो वासना, उससे उत्पन्न होना ही
अध्यवसाय है" यह पूर्वोक्त चतुर्थ पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि
बौद्ध मतमे वासना कोई स्थायी सस्कार नहीं होती, किन्तु एक ज्ञानके
बाद उत्पन्न होनेवाला दूसरा ज्ञान ही वासना है । इस प्रकार नीला
नुभवरूप वासनाके अनन्तर उत्पन्न जो पीतानुभव उससे भी नीलमें
प्रवृत्ति होने लगेगी ।
यदि कहो कि-कोई भी निर्विकल्पक अनुभव प्रवर्त्तक नहीं होता
किन्तु सविकल्पक ही प्रवृत्तिका जनक होता है । और वह सविकल्पक भी
जिस निर्विकल्पकसे उत्पन्न होता है, उसीके विषयमे प्रवृत्ति कराता
है । इसलिये पीतका निर्विकल्पक अनुभव प्रवृत्तिका जनक नहीं होगा
किन्तु उसके सविकल्पकसे ही प्रवृत्ति होगी । और वह प्रवृत्ति भी
पीतविषयमे ही होगी न कि नीलविषयमे । क्योंकि पीतविषयक निर्वि-
कल्पकसे ही वह सविकल्पक उत्पन्न हुआ है, इसलिये निर्विकल्पकका
विषयीभूत जो पीत, उसीमे प्रवृत्ति करायेगा, नीलमे नहीं-तो यहाँ
सविकल्पकका निर्विकल्पकसे साक्षात् उत्पन्न होना विवक्षित है ? अथवा
परम्परया ? यदि साक्षात् उत्पन्न होना विवक्षित हो तो शाब्दज्ञान
और अनुमितिज्ञानसे प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी । क्योकि शाब्दज्ञान
सकेतविषयक सविकल्पक ज्ञानसे उत्पन्न होता है और अनुमितिज्ञान
भी व्याप्तिविषयक सविकल्पक ज्ञानसे ही उत्पन्न होता है । यदि