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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 530 में से

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पृष्ठ 180

क्षणभङ्गवादः १३१
क्वचिद्वस्तुनि प्रत्यक्षप्रतिभासाद् विपरीत: भासो, नासौ तेनै-
कविषयो, यथा घटग्रहात् पटप्रतिभासः । तथा च गवि प्रत्यक्ष-
प्रतिभासाद् विपरीत: प्रतिभासो विकल्पकाल इति ।
इदमप्यवद्यम्, चित्राचित्रप्रतिभासाभ्यां मिथो विरुद्धा-
भ्यामेकनीलविषयाभ्यामनैकान्तात् । न हि चित्राध्यक्षे यन्नीलं
चकास्ति, तदेव पश्चान्न केवलम्, तदेव वा पुरुषान्तरस्य ।
येनाकारेणैकविषयत्वं तयोर्न तेनैव विरोधो, येन च विरोधो
न तेनैकविषयत्वम् ।
धर्मान्तराकारेण विरोधो नीलमात्राकारेण चैकविषय-
तेति चेत्, नन्विहापि धर्मान्तराकारेण विरोधो गोत्ववत्पिण्ड-
ऐसा आकार बनता है—जो ज्ञान किसी वस्तुके प्रत्यक्षज्ञानसे विपरीत
आकारका होता है, वह उसके समान विषयवाला नहीं होता, जैसे—
घटज्ञानसे विपरीत पटज्ञान घटविषयक नहीं होता । वैसे ही, गौके
सम्बन्धमें जो प्रत्यक्षज्ञान होता है, उससे विपरीत आकारका ज्ञान गो-
विषयक शाब्दबोध कालमे होता है। इसलिये शब्दद्वारा प्रत्यक्षके
समान गोस्वरूपका भान नहीं होगा किन्तु अगोव्यावृत्तिका ही
भान होगा ।
(उत्तरपक्ष) आपका यह कथन भी सदोष है। क्योंकि चित्ररूपका
ज्ञान और अचित्ररूप (नीलमात्र) का ज्ञान परस्परमें विरुद्ध होते
हुए भी दोनों ही एक नीलरूपको विषय बनाते हैं। इसलिये आपका
उपर्युक्त नियम कि “परस्पर विपरीत ज्ञान समानविषयक नहीं होते”
व्यभिचारी हो जाता है। ऐसी बात नहीं है कि चित्रके प्रत्यक्षमें जो
नील भासित होता है, वही पीछे अकेला न भासित होता हो, अथवा
उसी समयमें अन्य व्यक्तिको वही नील अकेला न भासित
होता हो ।
यदि कहें कि—जिस आकारसे दोनों ज्ञानोंमें एकविषयता है, उसी
आकारसे उनमें विरोध नहीं है, और जिस आकारसे विरोध है, उससे