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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 530 में से

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पृष्ठ 187

१३८ आत्मतत्त्वविवेके
अयमग्निमान् सोऽग्निमान् इति स्फुरणात् । अनुव्यवसायकाले
तु तत्प्रतिभासः, अमुमनुमिनोमि इमं पश्यामि तं स्मरामी-
त्युल्लेखात् । कथं तर्हि परोक्षोऽर्थः प्रत्यक्षश्चेति व्यवहारः ?
यथाऽनुमितो दृष्टः स्मृत इति ।
यदप्यत्यन्तविलक्षणानामित्यादि-तदपि सन्दिग्धाने-
कान्तिकम्, विधिनापि तथाभूतेन सालक्षण्यव्यवहारस्य निर्वा-
हात् । तथा हि,अय व्यवहारो न निर्निमित्तो नाप्यनेक-
अपरोक्षत्व स्मृतित्व अनुभूतित्वका स्फुरण ( भान ) नहीं होता । कारण,
व्यवसायकालमे 'वह अग्निमान् है ' ' यह अग्निमान् है' इसी प्रकारका
भान होता है । किन्तु अनुव्यवसायकालमें तो परोक्षत्वादिका भान होता
है । क्योंकि इस दशामें "उसका अनुमान करता हूँ ' "इसे देखता हूँ"
"उसका स्मरण करता हूँ" इसी प्रकारका उल्लेख होता है । इस तरह
अनुव्यवसायमे परोक्षत्व, प्रत्यक्षत्व, स्मृतित्व आदिका स्पष्ट भान लोकमे
होता है ।
( शङ्का ) यदि परोक्षत्व-अपरोक्षत्व विषयप्रयुक्त नहीं होते तो "वह
विषय परोक्ष है, यह प्रत्यक्ष है" इस प्रकारका व्यवहार क्यों होता है ?
( उत्तर ) जैसे "यह विषय अनुमित है, दृष्ट है या स्मृत है" यह
व्यवहार होता है, वैसे ही उक्त व्यवहार भी होता है । अर्थात् विषयके
अभिन्न होनेपर भी कारणके भिन्न होनेसे ही अनुमित-दृष्ट स्मृत आदि
व्यवहार जैसे होते हैं, वैसे ही विषयके भिन्न होनेपर भी कारणभेदसे
ही परोक्ष और प्रत्यक्षका भी व्यवहार होता है ।
जो तो पूर्वमें अपोहसिद्धिके लिये न्याय उपस्थित किया गया है कि
"अत्यन्त विलक्षणोंमे भी समानता व्यवहारका जो हेतु है वह अन्य-
व्यावृत्तिस्वरूप होता है—वह भी सन्दिग्धव्यभिचारदोषसे ग्रस्त है।
क्योंकि विध्यात्मक जातिसे भी समानता व्यवहारका निर्वाह हो सकता
है । क्योंकि "अय गौ , अयमपि गौ, सोऽपि गौ " इत्यादि समानता
व्यवहार अकारण नहीं हो सकता है । अकारण होनेपर उक्त व्यवहार
नित्य होने लगेगा ।