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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

१३४ आत्मतत्त्वविवेके
ग्धानेकान्तिकस्य वा परिहारः, तावतापि प्रतिभासभेदस्यो-
पपत्तेः ।
यदि च नैवम्, दूरतमादिप्रत्ययेषु कः समाश्वासविषयः ?
यस्यार्थो लभ्यत इति चेत्, ननु लाभोऽपि पूर्वपूर्वोप्लब्धानुप-
मर्दनेनैव । न हि सत्त्वद्रव्यत्वपार्थिवत्ववृक्षत्वादिकं परिभूय
शिंशपा लभ्यते ।
यत्रार्थक्रियासिद्धिरिति चेत्, सर्वेषामनुवृत्तेः कस्यार्थ-
क्रियेति कि निश्चायकम् ? न किञ्चित्, किन्तु संकीर्णार्थ-
व्यभिचारका सन्देह तो अवश्य है और व्यभिचारका सन्देह भी अनु-
मितिको रोक देता है ।
यदि ऐसी बात न हो तो दूरतम ( सर्वाधिक दूर ) आदि प्रतीतियोंमे
कौन सी प्रतीति विश्वसनीय होगी । अर्थात् दूरतमप्रतीतिमें “कोई द्रव्य
है” ऐसा भासित होता है । दूरतरप्रतीतिमें “वह पार्थिव द्रव्य है”
ऐसा भान होता है । और निकटप्रतीतिमे “वह सीसमका वृक्ष है”
ऐसा स्पष्ट ज्ञान हो जाता है । यहाँ एक ही वस्तु अस्पष्टतम, अस्पष्टतर,
अस्पष्ट और स्पष्टरूपमे मेरे मतानुसार भासित होती है । किन्तु आपके
मतमे किस वस्तुके सम्बन्धमें विश्वास किया जाय कि अमुक वस्तुवाली
प्रतीति प्रमा है ।
यदि कहो कि—जिस प्रतीतिकी वस्तु प्राप्त हो जाती है, वही प्रतीति
विश्वसनीय है—तो निश्चित ही वह प्राप्ति भी पूर्व पूर्वमें प्राप्त वस्तुको
अतिरस्कृत कर ही होती है । क्योंकि निकटसे शिंशपाका ज्ञान अतिदूर
आदिसे जाने गये उसके सत्त्व, द्रव्यत्व पार्थिवत्व और वृक्षत्व आदि
भावोंको तिरोहित करके नहीं होता ।
यदि कहो कि—जिसमें पत्र काण्डादिस्वरूप अर्थक्रिया देखी जाती
है, उसीकी प्रतीति प्रमा है और शेषकी अप्रमा—तो शिंशपाप्रतीतिदशा-
में सत्त्व, द्रव्यत्व, पार्थिवत्व और वृक्षत्वकी भी अनुवृत्ति रहती ही है,
उनका उपमर्द होता नहीं । अत इनमे किसमे अर्थक्रिया होती है,
इसका क्या निश्चायक है ?