आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 195, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वरूपस्य स्वतोऽवगतेः विषयभेदस्य च प्रागेन निरूपणात् ।
नाप्यापारोक्ष्यम्, तस्यापि स्वात्मनि सर्वज्ञानसाधारणत्वात् ।
विषये च विकल्पस्य तदभावात् । तथाभावेऽप्यन्यत्र नियत-
प्रवृत्त्यनुपपत्तेः ।
नापि विषयसारूप्यम्, तदभावात् । का हि परमार्थ-
सदलीकयोः समानरूपता नाम । यदि रूपशब्दो धर्मिवाचक
सविकल्पक ज्ञान अनुभव (निर्विकल्पक) से स्वरूपभेदको स्वतः ग्रहण
करता हुआ ही उत्पन्न होता है ।
यदि अनुभव और विकल्पके अलीकविषयगत भेदका अग्रह होना
पुरस्कार मानें तो इसका विवेचन पूर्वमें ही किया जा चुका है।
अर्थात् विकल्पके अलीक विषयमे अनुभवविषयका पारमार्थिक भेद नहीं
रह सकता।
"जैसी अपरोक्षता अनुभवमे है वैसी ही विकल्पमें भी है।
इसलिये विकल्पज्ञान अनुभवविषयमें ही प्रवृत्ति कराता है, अन्यत्र
नहीं", इस प्रकारका अपारोक्ष्य भी अनुभवव्यापारका पुरस्कार नहीं
कहा जा सकता है। क्योंकि यहाँ यदि ज्ञानगत अपरोक्षता ली जाय
तो सभी ज्ञान अपने स्वरूपमें अपरोक्ष ही हैं। इसलिये सब ज्ञानसे
सब विषयमे प्रवृत्ति होने लगेगी। यदि विषयगत अपरोक्षताको लेकर
अनुभव और विकल्पका साम्यसम्बन्ध कहा जाय, तो विकल्प विषयके
अलीक होनेके कारण उसमें अपरोक्षताका ही अभाव है। विकल्प
विषयमे यदि अपरोक्षता मान भी ली जाय तो भी अलीक विषयक
विकल्पज्ञानसे अलीकभिन्न स्वलक्षणत्मक विषयमें नियत प्रवृत्ति
नहीं बन सकेगी। क्योंकि अन्य विषयके ज्ञानसे अन्य विषयमे
प्रवृत्ति नहीं होती है।
निर्विकल्पक ज्ञानका विषय जो स्वलक्षण और सविकल्पक ज्ञानका
विषय जो अलीक इन दोनोंमें सारूप्य होना भी विकल्पद्वारा अनुभव
(निर्विकल्पक) के व्यापारको पुरस्कृत करना नहीं है। कारण, यहाँ
सारूप्य नहीं हो सकता है। क्योंकि पारमार्थिक और अलीकमें कौन
सी समानरूपता है ? यदि 'समानरूपता' इस शब्दमे रूपशब्द धर्मीका