आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः १३३
प्रतिभानव्यवहारः । यथा यथा च धर्माणामप्रतिपत्तिस्तथा
तथा प्रतिभानस्य मान्द्यव्यवहारो दूरान्तिकादौ प्रत्यक्षेऽपि
लोकानाम्, न तु सर्वथैवाप्रतिपत्तौ ।
विदूरादिप्रत्ययोऽपि पक्ष एवेति चेत्, अस्तु, न तु ताव-
ताऽपि धर्मधर्मिभेदसिद्धौ प्रत्यक्षबाधस्य, तत्सन्देहेऽपि सन्दि-
(उत्तर) मैं कहूँगा कि प्रतिभास स्फुट ही होता है, अतः उसमें
स्फुटत्व और अस्फुटत्वका भेद कथमपि नहीं होता है । क्योंकि जैसे
जैसे वस्तुके धर्म भासित होते जाते हैं, वैसे "स्फुट प्रतीति है" ऐसा
व्यवहार होता है और जैसे जैसे वस्तुगत धर्मोंकी अप्रतीति होती जाती
है, वैसे वैसे "मन्द प्रतीति है" ऐसा व्यवहार लोगोंको दूरस्थ और
समीपस्थ वस्तुओंके प्रत्यक्षमें भी होता है। यह बात नहीं है कि वस्तु
की सर्वथा अप्रतीतिमें ही अस्फुटत्व (मन्दत्व) का व्यवहार होता हो ।
इसलिये शब्द और अनुमानमे यदि वस्तुका सर्वथा भान न हो तो
वहाँ अस्फुटत्व भी नहीं कहा जा सकता है ।
यदि कहो कि— विदूरादिप्रतीति भी पक्षके अन्तर्गत ही है। अर्थात्
जैसे शाब्द और अनुमितिप्रतीतियोंको वस्तु (धर्मी) विषयक नहीं
मानते, वैसे ही विदूरादिप्रतीतिमे भी धर्मीका भान नहीं मानते हैं।
इसलिये उसे दृष्टान्तके रूपमें नहीं उपस्थित किया जा सकता है—तो
कहूँगा कि वह भी भले ही पक्षकोटिमे रहे, फिर भी धर्म और धर्मीका
पारस्परिक भेद सिद्ध है। अतः दूरस्थ वस्तुके कुछ धर्मोंका भान न
होनेपर भी उस धर्मीका तो भान होता ही है। इसप्रकार आपका यह
अनुमान करना कि विदूरप्रतीतिमे भी धर्मीका भान नहीं होता है,
प्रत्यक्षप्रमाणसे बाधित है ।
बाधमें कथञ्चित् सन्देह होनेपर भी सन्दिग्धानैकान्तिक दोषका
परिहार नहीं हो सकता है । क्योंकि प्रतिभासभेद (विदूरप्रतीतिका
अस्फुट होने) क कारण ही आप उसे धर्मिविषयक नहीं मानते हैं, किन्तु
उसके धर्मिविषयक होनेपर भी कुछ धर्मोंका भान न होनेमात्रसे भी उस
प्रतीतिका अस्फुट होना संभव है । इसप्रकार आपके अनुमानमें