सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 196

समानशब्दश्चैकपर्यायः, क्वार्थसंगतिः प्रकृते। यदि वा रूपं
धर्मः समानश्चैको वैकजातीयो वेति, तथापि क्वार्थसङ्गतिः
प्रकृते। अतद्व्यावृत्तिरिति चेत्, न, तस्य चालीकानलीक-
निष्ठतया एकत्वैकजातीयत्वयोरभावात्। आभिमानिकोऽयं
सारूप्यव्यवहारो न पारमार्थिक इति चेत्, न, अभिमानस्यैव
चिन्त्यमानत्वात्। न हि चिन्तितप्रकारान् परिभूयापरोऽ-
भिमानो नाम।
स्वभावादेव कश्चिद् विकल्पः कस्मिंश्चिदेवास्फुरितेऽपि
वाचक हो और समानशब्दका अर्थ एकत्व हो तो प्रकृतमे कैसे अर्थसंगति
हो सकती है ? क्योंकि आपके मतमे सविकल्पक और निर्विकल्पक दोनों
ज्ञानोंमे एक धर्मी (वस्तु) नहीं भासित होता है। यदि रूपशब्दसे वस्तुका
धर्म लिया जाय और समानशब्दका अर्थ हो एक अथवा एकजातीय, तो
भी प्रकृतमे अर्थकी सङ्गति कैसे हो सकती है ? क्योंकि विकल्प और
अनुभवका विषय न एक धर्म है और न एक जातिका धर्म है।
यदि कहो कि—अतद्व्यावृत्ति ही विकल्पविषय और अनुभवविषय
मे रहने वाला समान धर्म है—तो यह कथन ठीक नहीं है। क्योंकि
जो अतद्व्यावृत्ति विकल्पविषयमे रहेगी वह अलीकनिष्ठ होनेसे असद्-
रूप होगी और जो अनुभवविषयमे रहनेवाली अतद्व्यावृत्ति होगी वह
अलीकभिन्ननिष्ठ अर्थात् सत्यनिष्ठ होनेके कारण सद्रूप होगी। इसलिये
सद् और असद्रूप होनेसे दोनों विषयोंकी अतद्व्यावृत्ति न एक होगी
और न एक जातिकी होगी।
यदि कहो कि—विकल्प और अनुभवके विषयोंमे सारूप्य व्यवहार
पारमार्थिक नहीं है, किन्तु आभिमानिक ( काल्पनिक ) है, इसलिये
अर्थसङ्गति होना आवश्यक नहीं है—तो यह कथन भी ठीक नहीं है।
क्योकि अभिमान ( कल्पना या आरोप ) ही तो यहा विचारणीय विषय
है। साथ ही विकल्प एव अनुभवसम्बन्धी आरोपके बारेमे अबतक
जितने प्रकार विचारे जा चुके हैं, उनसे अतिरिक्त अभिमानका कोई
दूसरा स्वरूप हो भी नहीं सकता है।
यदि कहो कि—स्वभावसे ही कोई विकल्प किसी खास वस्तुमे ही