आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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मात्राकारेण चैकविषयतेति तावन्मात्रनिराकरणेऽसिद्धो हेतुः।
पूर्वत्र सिद्धसाधनम्। न हि शाब्दलैङ्गिकविकल्पकाले देश-
कालनियमादयोऽपि सर्वे एव धर्मविशेषा विषयभावमासाद-
यन्तीत्यभ्युपगच्छामः।
ननु धर्मिण्येव स्फुटास्फुटप्रतिभासभेदः कथम् ? न कथ-
ञ्चित्। यथा यथा हि धर्माः प्रतिभान्ति तथा तथा स्फुटेति
एकविषयता नहीं है। क्योंकि चित्राकार और अचित्राकारसे विरोध
है और केवल नीलाकारसे एकविषयता है—तो निश्चित ही प्रत्यक्ष और
शाब्दबोधादि स्थलमे भी नील, श्वेत, कपिल आदि धर्मोंके आकार-
से विरोध है और गोत्वधर्मवाले पिण्डके आकारसे एकविषयता है।
अर्थात् प्रत्यक्षमे नीलापन उजलापनके साथ साथ गोत्वधर्मवाला पिण्ड
भासित होता है और शाब्दबोधादि स्थलमें केवल गोत्वधर्मयुक्त पिण्ड
का भान होता है। इस प्रकार नीलादि अंशमें ही विरोध है न कि
पिण्डांशमे भी।
इसलिये शब्द और अनुमानद्वारा होनेवाले गोत्वयुक्त पिण्डके भान
का यदि खण्डन करना चाहते हो तो इसके लिये आपका दिया पूर्वोक्त
(प्रतिभासभेद) हेतु स्वरूपासिद्ध है। क्योंकि पिण्ड (वस्तु) के
सम्बन्धमे प्रत्यक्ष शाब्दबोध और अनुमिति सभी ज्ञान समान है।
और यदि नियत देश, काल, अवस्था तथा वस्तुके उजलापन नीलापन
आदि विशेषधर्मोंको लेकर प्रत्यक्ष और शाब्दादि प्रतिभासोंके भिन्न
भिन्न होनेसे उन्हें भिन्नविषयक सिद्ध करना चाहते हो तो सिद्धसाधन
दोष हो जायगा। क्योंकि यह हम भी नहीं मानते कि शाब्द या
अनुमितिज्ञानकालमे नियतदेश काल, अवस्था, नीलत्व, श्वेतत्व आदि
वस्तुके सभी धर्म भासित होते हैं। अर्थात् उस रूपसे शाब्द आदि
ज्ञानको प्रत्यक्षज्ञानसे भिन्नविषयक हम भी मानते ही हैं।
(शङ्का) जो धर्मी (वस्तु) प्रत्यक्षसे भासित होता है, वही यदि
शब्द और अनुमानसे भी भासित होता है तो प्रत्यक्षज्ञान स्फुट और
शाब्दबोध तथा अनुमिति अस्फुट, ऐसा प्रतीतिभेद कैसे होता है ?