आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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अपि तथा व्यवस्थाप्याः। सर्वेषामेव तेषां ता तामर्थक्रिया
प्रति प्रयोजकताया अन्वयव्यतिरेकगोचरत्वात्।
स्यादेतत्, न धर्मान्तराकारेण प्रतिभासभेदो भेदहेतुः
किन्तु परोक्षापरोक्षरूपतया। सा हि न धर्मभेदानप्युपादाय
समर्थयितु शक्या, तेष्वपि परोक्षापरोक्षज्ञानोदयात्, तत्रापि
धर्मन्तरानुसरणेऽनवस्थानादिति चेत्, न, तयोरविषयाकार-
त्वात्। द्विविधो हि ज्ञानधर्मो विषयावच्छेदो जातिभेदश्च। तत्र
विषयावच्छेदभेदेन विषयस्य भेदस्थितिर्भेदनिराकरणं वा, न
क्रियाके प्रति प्रयोजक है, यह बात अन्वय-व्यतिरेकसे सिद्ध है। जैसे, वही
सीसम द्रव्यरूपमें सयोगके प्रति, पृथिवीरूपमे गन्धके प्रति वृक्षरूपमें
सामान्यत पत्रकाण्डादिके प्रति और शिंशपारूपमें विशेष ढङ्गके पत्र
काण्डादिके प्रति कारण होता है। इसलिये केवल शिंशपाप्रतीति ही
प्रामाणिक नहीं है कि तु द्रव्यादिप्रतीति भी वैसे ही धर्मिविषयक है और
प्रामाणिक है।
(पूर्वपक्ष) अस्तु किन्हीं अन्य धर्मोंके कारण नहीं किन्तु परोक्ष
और अपरोक्षरूप होनेमे अनुमानादि और प्रत्यक्षज्ञान परस्पर भिन्न हैं
और इसीलिये दोनोंके विषय भिन्न सिद्ध होते हैं। यहाँ ऐसा समर्थन
नहीं किया जा सकता कि "ज्ञानोंकी परोक्षता या अपरोक्षता स्वतः नहीं
है किन्तु परोक्षत्व अपरोक्षत्व विषयके ही धर्म हैं और इन परोक्ष अप
रोक्ष विषयोंके ही कारण ज्ञान भी परोक्ष अपरोक्ष कहे जाते हैं। क्योंकि
आपके मतमे परोक्ष विषयमे भी योगियोंको अपरोक्षज्ञान और अपरोक्ष
विषयमें भी सर्वसाधारणको शाब्दबोधादि परोक्षज्ञान होता है। यदि
इन ज्ञानोंकी भी परोक्षता अपरोक्षताके समर्थनके लिये किन्हीं अन्य
धर्मोंका सहारा लिया जाय तो इस प्रकारकी कल्पनाकी विश्रान्ति न
हो सकनेके कारण अनवस्थादोष हो जायगा। अतः परोक्ष अपरोक्ष
स्वरूप प्रतिभासके भेदसे प्रत्यक्ष अनुमानादि ज्ञानोंका विषयभेद
आवश्यक है।
(उत्तरपक्ष) उक्त आक्षेप ठीक नहीं है। क्योंकि मेरे मतमे भी