आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 197, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें१४८ आत्मतत्त्वविवेके
प्रवर्तयति, किमत्र क्रियताम् । स चास्य स्वभावभेदः स्वकार-
णादेवायात., तत्र कः पर्य्यनुयोज्यतामिति चेन्, तत् किम-
प्रत्यासन्न एव विकल्पस्तत्र प्रवर्तयति ? प्रत्यासत्त्यन्तरा-
भावात् स्वभावप्रत्यासन्नो वा व्यहृतिरेव वा प्रत्यासत्ति. ?
न प्रथमः, अतिप्रसङ्गात् । द्वितीये तु स्वभावेनोत्तर स्यात्,
किन्तु तदेव स्फुरणम् । न हि व्यवहारे प्रवर्तयितव्ये स्वभाव-
प्रत्यासत्तिमनधूय ज्ञानज्ञेययोरपरः कश्चिद् विषयविषयिभावः ।
सदसदनिर्वचनीयार्थख्यातिवादिभिरपि स्वभावप्रत्यासत्तेरवर्ज-
नीयत्वादिति वक्ष्यमाणत्वात् ।
प्रवृत्ति कराता है, भले ही वह वस्तु उस विकल्पद्वारा भासित न होती हो ?
इसमे क्या किया जाय ? और विकल्पका यह स्वभावविशेष उसे अपने
कारणसे ही प्राप्त है। इसलिये स्वभावके सम्बन्धमे भी कुछ कहनेके
लिये किसे बाध्य किया जाय—तो क्या वह विकल्प उस वस्तुसे
असम्बद्ध ही रहकर उसमें प्रवृत्ति कराता है ? या स्वभावातिरिक्त
सम्बन्धके नहीं रहनेसे उस वस्तुसे स्वभावत सम्बद्ध होकर उसमे
प्रवृत्ति कराता है ? अथवा उस वस्तुके बारेमें लौकिक व्यवहारोंको
कराना ही उसके साथ विकल्पका सम्बन्ध है ?
इनमे प्रथमपक्ष नहीं माना जा सकता है। क्योंकि उस विकल्पसे
अनियन्त्रितरूपमें सभी वस्तुओंमें प्रवृत्ति होने लगेगी । द्वितीयपक्षमे
तो स्वभाववाला उत्तर हो सकता है, किन्तु वही तो वस्तुका स्फुरण है।
क्योंकि प्रवृत्ति आदि व्यवहार करानेके लिये स्वाभावरूप सम्बन्धके
अलावे ज्ञान (विकल्प) और ज्ञेय (वस्तु) का दूसरा कोई विषय
विषथिभाव नहीं है। अर्थात् नियत विषयमें प्रवृत्तिके लिये उस विषय
के साथ सविकल्पक ज्ञानको स्वभावत सम्बद्ध माना जाय तो वह
स्वलक्षणात्मक वस्तु भी विकल्पका विषय हो ही गयी। जिनका यह मत
है कि सत् या असतरूपसे अनिर्वचनीय वस्तुका ही विकल्पद्वारा भान
होता है, उन्हें भी वस्तु और विकल्पका स्वाभाविक सम्बन्ध मानना ही
पडता है। यह बात आगे कही जायगी ।