सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
खंड (५)
गुहा पर उत्कीर्ण अभिलेख
६४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
गुहा : बराबर / ६५
मूल अभिलेख
हिंदी रूपांतर
गुहा : बराबर
गुहा : बराबर
प्रथम मूल अभिलेख
प्रथम अभिलेख
लाजिना पियदसिना दुवाडसवसाभिसितेना
अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर राजा प्रियदर्शी द्वारा यह न्यग्रोध-गुहा
इयं निगोहकुभा दिना आजीविकेहि
आजीविकों को दी गयी।
द्वितीय मूल अभिलेख
द्वितीय अभिलेख
लाजिना पियदसिना दुवाडसवसाभिसितेना इयं
अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर राजा प्रियदर्शी द्वारा खलतिक पर्वत
कुभा खलतिकपवतसि
पर यह गुफा आजीविकों को दी गयी।
दिना आजीविकेहि
तृतीय अभिलेख
तृतीय मूल अभिलेख
राजा प्रियदर्शी के अभिषेक के उन्नीस वर्ष हो चुकने पर अतीव मनोहारी
लाज पियदसी एकुनवी-
खलतिक पर्वत पर) यह गुफा वर्षा (से बचाव) के लिए दी गयी।
सतिवसाभिसिते जलघो-
सागमथात मे इयं कुभा
सुपिये ख........ दिना
शब्द-विवेचन
स्पष्टीकरण
शब्दों के विवेचन का क्रम प्रायःकर निम्न प्रकार से रखा गया है –
१. अभिलेख में प्रयुक्त हुए शब्द-विशेष
२. उनका हिंदी में अर्थ
३. इन शब्दों का सँस्कृत स्वरूप
४. सँस्कृत पदों का विश्लेषण (यथासंभव शब्दकोषों की सहायता से)
५. पालि शब्द अपने सामान्य रूप में (कोष्ठक में तत्सम सँस्कृत शब्द
सहित)
उदाहरण -
गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख
(पृष्ठ ६९-७०)
१. समाजो
२. समाज (अर्थात इंद्रियलोलुपता को बढ़ाने वाले जमघट अथवा उत्सव)
३. समाजः (संवीयते अत्रेति)।
४. ‘पशुभिन्नानां सङ्घः’ (हलायुध०)। ‘समजस्तु पशूनां स्यात्
समाजस्त्वन्यदेहिनाम्’ (अभिधान० ३.४८१)। समाजः- ‘पशुभिन्नानां
समूहे, सभायाम्, हस्तिनि च’ (शब्द०)।
५. समज्ज समज्जा। [सँ.- √अज् (हांकना)]
[नोट - संदर्भ-ग्रंथों के लिए कृपया देखें संदर्भ-सूची पृष्ठ सं (ix) पर]
शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन
गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख
▪ इयं = यह।
▪ धंमलिपी = धर्म से संसिक्त अक्षररचना (अथवा अक्षरसंस्थान)। सँ.-
धर्मलिपी। 'धर्म:'-'ध्रियते लोकोऽनेन, धरति लोकं वा। 'लिपी', 'लिपि:'-
√लिप् से। इनके अन्य रूप 'लिबी', 'लिबि:' भी देखने को मिलते हैं।
'अक्षरन्यासे लिपिर्लिबि:' (अभिधान० ४८४)।
▪ देवानंप्रियेन प्रियदसिना राजा = देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा।
'देवानांप्रिय'-मौर्य राजाओं की उपाधि। 'प्रियदर्शी'-राजा अशोक का
विशेषण। 'देव:'-दीपनात्, द्योतनात्, दानात् (नि० ७.१५)।
'प्रिय:'-प्रीणातीति। मनोरम, मञ्जुल, हृद्य। 'राजा'-राजतेः (नि० २.३)।
Lat. 'Rex' (a king)
▪ लेखापिता = लिखवायी गयी।
▪ इध = यहां (अर्थात, मेरे साम्राज्य में)। सँ.-'इह'। पालि-'इध'। (हिंदी
का 'इधर' शब्द इसी से निष्पन्न हुआ प्रतीत होता है।)
▪ किंचि = कोई। सँ.- किञ्चित्।
▪ जीवं = प्राणी को। सँ.- जीवः (जीवतीति 'जीव् प्राणधारणे')। 'जीवः
पुरुषपुद्गलौ' (त्रिकाण्ड० ११९)।
▪ आरभित्पा = मार कर। सँ.- आलभ्य। आलम्भः, आलम्भनं -पकड़ना,
स्पर्श करना, चीरना, फाड़ना, यज्ञ में बलिदान के लिए पशु का वध करना,
यथा 'अश्वालम्भं, गवाल्म्भं'। (सँस्कृत०)। ('प्रातर्वै पशूनालभन्ते।' शतपथ०
३.७.२.४)
▪ प्रजूहितव्यं = होम किया जाय। (प्र - √हु से)।
▪ च = और। सँ.- च। पालि = च। 'च पादपूरणे पक्षान्तरे हेतौ विनिश्चये'
(त्रिकाण्ड० १०१८)
▪ समाजो = समाज (अर्थात, इंद्रियलोलुपता बढ़ाने वाले जमघट अथवा
उत्सव)। सँ.- समाजः (संवीयतेऽत्रेति)। 'पशुभिन्ननां सङ्घ:' (हलायुध०)।
'समजस्तु पशूनां स्यात् समाजस्त्वन्यदेहिनाम्' (अभिधान० ३.४८१)।
७० / सम्राट अशोक के अभिलेख
समाजः - 'पशुमित्राणां समूहे, समभ्यायाम्, हस्तिनि च।' (शब्द०)। पालि-
समज्ज, समज्जा। [सं.- $\sqrt{अज्}$ (हांकना)।]
• कतव्यो = किया जाना चाहिए। सं.- कर्तव्यः। पालि-कतब्बो।
• बहुकं = बहुत। ('बहु' से)। सं.- बहु (वंहुते इति)। 'प्रभूतं प्रचुरं
प्राज्यमदभ्रं बहुलं बहु' (अमर० ३.१०८०)।
• हि = क्योंकि। (वाक्य के आरंभ में इसका प्रयोग वर्जित है)। 'हि
हेताववधारणे' (अमर० ३.१४३१)।
• दोसं = दोष। सं.- दोषः (दूष्यते इति दूषणम् अथवा दुष्यत्यनेनेति
पापम्)। 'दोष आर्त्तितवौ मतः' (हाला०-१९८)। 'दोषः दूषणे पापे च'
(शब्द०)।
• समाजम्हि = समाज में।
• पसति = देखता है। सं.- पश्यति। पालि-पस्सति।
• अस्ति = (इस प्रकरण में) 'हैं' (अन्यथा 'है')।
• पि = भी। सं.- अपि। पालि-पि।
• एकुचा = कोई-कोई। पालि-एकच्चे।
• साधुमत्ता = अनिन्द्य माने गये। सं.- साधु (साध्नोति परकार्यमिति)
'साध्वनिन्दिते' (त्रिकाण्ड० ५२०)। 'मतं तु संमतेऽभिहिते' (अनेकार्थ०
२.१९८)।
• पुरा = पूर्व काल में। सं.- पुरा (पुरति अग्रे गच्छतीति)।
• महानसम्हि = पाकशाला में। सं.- महानसम् (महत्त्वं तदनश्वरीतीति
'महदनः। पाकस्थानम्।' (शब्द०) (महत्-महति पूज्येऽसन्निविते)। (महता
मंहनीयो भवतीति-नि० ३.१३)। 'सूदशाला रसवती पाकस्थानं महानसम्'
(अभिधान० १९८)।
• अनुदिवसं = प्रतिदिन। सं.- दिवसः (दीव्यत्यत्रेति)।
• बहूनि = बहुत से। सं.- बहु (प्रभवतिती सतः-नि० ३.१३)। 'प्रभूतं
प्रचुरं प्राज्यमदभ्रं बहुलं बहु' (अमर० ३.१०८०)।
• पाणसतसहसानि = सैकड़ों-हजारों प्राणी। सं.- शतं (शतं दशदशतः-
नि० ३.१०)। सं.- सहस्रं (सहस्रं सहदन्-नि० ३.१०)। 'प्राणात्तु जीवितेन्द्रियं'
(अनेकार्थ० २.१६३)। 'दशशतसंख्यायां, बहुसंख्यायां, तरुसख्यान्विते च'
(शब्द०)
शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन / ७१
• आरभिंसु = मारे जाते थे। (आ-$\sqrt{रभ्}$ से लुङ् लकार में। कर्मवाच्य,
प्रथम पुरुष, बहुवचन)।
• सूपथाय = सूप के लिए। सं.- सूपः (सुखेन पीयते)।
• ते = परंतु। सं.- तुद्।
• अज = अब। सं.- अद्य। (अस्मिन्नहनि इदंशब्दस्य निपातः सप्तम्यर्थे)
(शब्द०)। पालि - अज्ज।
• ती = तीन। सं.- त्रि।
• पाणा = प्राणी।
• आरभरे = मारे जाते हैं।
• द्वे = दो। सं.- द्वौ।
• मोरा = मोर। सं.- मयूरः (मयूरिव रौति शब्दायते इति। यद्वा मिनाति
हन्ति सर्पानिती1) 'छत्रमांसी मयूरस्तु' (त्रिकाण्ड० २.२८७)।
• एको = एक। सं.- एक (एक इता सङ्ख्या-नि० ३.१०)। Persian yak.
• मगो = मृग। सं.- मृगः (मार्गयन्तिकर्मिणः-नि० १.२०)। (मृग्यते
अन्वेष्यति तृणादिकम्। यद्वा मृग्यते अन्विष्यतेऽसौ व्याधैः)। मृगः कुरङ्गः
सारङ्गो वातायुर्हरिणोऽपि (अभिधान० ४.१२९३)। 'पशु'-मात्र को भी 'मृग'
कहते हैं, देखिए अमर० ३.११९३) - 'पशवोऽपि मृगाः' (३.११९३)।
• धुवो = निश्चित। सं.- ध्रुव (ध्रु गतियेर्थे। यद्वा ध्रुवति स्थिरीभवतीति।)
'ध्रुवो निश्चितनित्ययोः' (शब्दरत्न० III.२०)।
• पछा = पीछे, उत्तर काल में। वैदिक रूप-पश्चा, पश्चात्। 'पश्चात्ततीच्यां
चरमे' (अनेकार्थ० १७९२)। पालि-पच्छा।
• आरभिंसरे = मारे जायेंगे।
गिरनार शिला : द्वितीय अभिलेख
• सर्वत = सर्वत्र। सब स्थानों पर।
• विजितम्हि = राज्य में।
• एवमपि = इसी प्रकार।
• प्रचंतेसु = सीमा से सटे हुए पड़ोसी राज्यों में। सं.- प्रत्यन्तेषु। 'प्रत्यन्तो
म्लेच्छदेशः' (अमर० २८७) म्लेच्छदेशे।
... wait! Is that नहीं-जड़ियाँorयहाँ-जड़ियाँ? Wait! Look at नहीं: Letters: न ह ीं? Wait! Look at the first letter: Is it त थ ा? तथा? Wait! Look at: ओसुढानि = ओषधियाँ।Then:[...] तथा जड़ियाँ।? NO! Let's read very carefully: ओ स ु ढा नि = ओ ष धि याँ ।Next word:गं ध म ा द क? No. Wait, let's look at the letters: Is it संस्कृत नहीं? No. Let's look at: ओसुढानि = ओषधियाँ।Then:[ ? ] नहीं-जड़ियाँ।Wait, look at the word beforeनहीं: Could it be दवाइयां नहीं-जड़ियाँ? No. Wait, let's look at the third word: नहींhasनandहwithी? Wait! The word is तथा! Look at it: It's त(ta),थwithा(thaa)!तथा! WAIT! Is it तथा`?
No
सप्त स्तम्भलेख, लघु शिलालेख (मास्की, भाब्रू), गुहालेख व उपसंहार
.
Line 17:
(अन्यो नानार्थो भवति-नि० १.६) (कर्म कस्मात्, क्रियत इति सतः-नि०
Line 18:
३.१)। पालि-अञ्ञो। कम्मं।
Line 19:
• सूस्रूसा = आराधना। कहना मानना। सं.- शुश्रूषा
Line 20:
'शुश्रूषापारचर्यानोपवित्तिव्यासपारीत्ययः' (अभिधान० ३.४१७)। 'शुश्रूषा श्रोतु
Line 21:
चैव ग्रहणं धारणं तथा' (अभिधान० २.३९०)। पालि - सुस्सूसा।
Line 22:
• मितसंस्तुतज्ञातीनं बाम्हणसमणानं = मित्रों, परिचितों, संबंधियों और
Line 23:
ब्राह्मणों तथा श्रमणों को। सं.- मित्रम् (मेद्यति खिद्यति इति)। मित्र-निधीयते
Wait, look at line 23-24:
मित्रम् (मेद्यति खिद्यति इति)। 'मित्र-निधीयते
Wait, does line 23 have a quote?
मित्रम् (मेद्यति खिद्यति इति)। 'मित्र-निधीयते or मित्र-निधीयते?
In line 23: `सं.- मित्रम् (मेद्यति खिद्यति
Here is the complete, line-by-line transcription of both pages from the image:
[पृष्ठ ७६]
७६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• विमानदसणा = देवयान दिखलाने से। सं. - विमानदर्शनात्। (विमानं-
विगतं मानमुपमा यस्य। देवयानम्।)
• हस्तिदसणा = हाथी दिखलाने से। सं. - हस्तिदर्शनात्। पालि-हत्थी-
दस्सनं।
• अगिखंधानि = आग की मशालों को। सं. - अग्निस्कन्धान्। 'स्कन्धाग्निः
स्थूलशाखानिश्रिताग्निस्तु भवेत्समः' (हारा० २०४)। 'स्कन्धः-प्रकाण्डे
आरुहत्तंसं। अंसे, वृक्षस्य काण्डे, नृपे, व्यूहे, युद्धे, समूहे, इत्यादि
(शब्द०)। (अग्निः - अञ्चति ऊर्ध्वं गच्छतीति) (स्कन्धः - स्कन्दते
आरुह्यतेऽसौ सुखेन शाखया वा)। पालि-अग्गिक्खन्धो।
• रुपानि = दृश्य। सं. - रूपाणि। (रूपं रोच
७८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• आदिकरे = पहल करने वाला। सं.-आदिकरः। पालि-आदि (प्रथम्-आदिकम्)।
• कचंति = करता है। सं.-करोति। पालि-करोति।
• ममया = मेरे द्वारा। सं.-मया। पालि-मया।
• ममा = मेरे। सं.-मम। पालि-मम।
• नतानं = नाती। सं.-नप्तारः। 'नप्ता पौत्रः सुपुत्रयः' (अनेकार्थ० ३.३९९)।
• पलं = परा। आगे। सं.-परम्। पालि-परं।
• अपतिये = संतान। सं.-अपत्यम्। (न पतति वंशो यस्मात्)। 'अपत्यं पततिने पित्तुरंगजेन। पुत्रदुहितृभ्ये सन्ताने' (शब्द०)।
• आवकपं = कल्पान्त तक। सं.-यावत्कल्पम्।
• अनुवत्तिसंति = अनुवर्तन करेंगे। सं.-अनुवर्त्तिष्यन्ते।
• सुकटं = पुण्य का काम। सं.-सुकृतम्। 'सुकृतं पुण्ये, धर्मे, शुभे
द्धम्-बध्यते स्म इति। बन्धयुक्तं, नियमितम्। पालि-बन्धनां।)"
Wait, let's look at the first word of L17:
"(बद्धम्-बध्यते स्म इति। बन्धयुक्तं, नियमितम्। पालि-बन्धनं।)"
Wait, is it "पालि-बन्धनां" or "पालि-बन्धनं"?
In L18: "पालि-बन्धनं।"
Check L21:
"• मोखाये = रिहाई के लिए। सं.- मोक्षाय। (मोक्षः-मोक्ष्यते दुःखमनेनेति।"
Wait, look at end of L21:
"दुःखमनेनेति।" - yes, 'दुः' 'ख' 'म' 'ने' 'ने' 'ति'।
Check L22:
"'मोक्षो निःश्रेयसे वृक्षाद्विशेषे मोचने मृता' (अनेकार्थ० २.५७३)।"
Wait, is it "मृता" or "स्मृतः"?
Look at L22: "मोचने" then "मृ" "तौ"? No, "स्मृतः"!
'स्' 'मृ' 'तः'!
"मोचने स्मृतः" - in Sanskrit lexicons: '...मोचने स्मृतः'।
Yes, 'स्मृतः'!
Check L24:
"• एवं अनुबंधा = इस
).
Let's transcribe every single word and line accurately.
Let's read Page 82 in detail:
Header:
८२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
Lines on Page 82:
• वयसि = पशुशाला में। सं.- व्रजे। (व्रजः-व्रजन्ति सहोभूय गावश्चा
गोष्ठम् ।) । 'व्रजः समूहे, गोष्ठे, पथि, मधुरासमीपस्थे देशभेदे च' (शब्द०)।
'प्रजन्त्यस्माद् गाव इति व्रजो घोषः गोवाटो वा उच्यते।' (उद्ग) [or (उद्व) / (उद्ग०)]
Let's look closely at '(उद्ग)' or '(उद्द)' or '(उद्ध)'?
It looks like '(उद्द)' or '(उद्ध)' or '(उ०)'?
Wait, "उज्ज्वलदत्तः"? "उणादिसूत्रवृत्ति" by Ujjvaladatta: (उज्ज्व०) or (उद्ग)?
Wait, look at the letters: 'उ' 'द्' 'ग' -> wait, it's (उज्ज्व)? No, look at: (उ०)?
Let's check the letters: '(' then 'उ' then 'द्' with something below? 'द्व'?
Wait, let's zoom in on: (उ... )
Letters: ( then उ द् `
८४ / सम्राट् अशोक के अभिलेख
भवेत्। स भावः कथ्यते सद्भिस् तस्योत्कर्षः रसः स्मृतः' (हल्युध० १०)।
पालि-भावो (भावः)। सुद्धि (शुद्धिः)।
• उचावचछंदो = नाना प्रकार की इच्छाओं वाले। सं.- उच्चावच्छन्दाः
(उच्चावचः -उदक् च अवाक् च। अनेकप्रकारः)। 'उच्चावचं विघेमद्गदं
(अमर० ३.१.१००)। 'छन्दोऽभिप्राय आकूतं मतमन्वाशया अपि।
(अभिधान० ६.१३८२)। पालि-उच्चावचो (उच्चावचः)। छन्दो (छन्दः)।
• उचावचरागो = नाना प्रकार की आसक्तियों वाले। सं.- उच्चावचरागः।
'रागोऽनुरागोऽनुरक्तिः' (अभिधान० २.२९६)। पालि -रागो (रागः)।
• कासंति = करेंगे। सं.- करिष्यन्ति।
• कतज्ञता = कृतज्ञता। सं.- कृतज्ञता। 'कृतज्ञः -कृतं कृतोपकारं जानाति'
(शब्द०)। पालि-कतञ्ञुता।
• दढभत्तिता = निश्चल भक्ति। सं.- दृढभक्तित्ता। दृढ= 'प्रगाढं 'दृढः शक्तो
भृशो स्थूले' (अनेकार्थ० २.१४४)। 'भक्तिः -सेवायाम् आराधनेयाम्
तदेकाग्रचित्तवृत्तिविशेषे।' (शब्द०)। (भक्तिः -भज्यते इति। अनुरागविशेषः
श्रद्धा।)। पालि-दळ्हो (दृढ)। भत्ति (भक्तिः)।
• निचा = नीचा। सं.- नीचाः। निचः - निकृष्टमों लक्ष्मीं चमति। प्रमने,
निमे, वासमे च। (शब्द०)। 'नीचः पामरखर्वयोः' (अनेकार्थ० २.७३)
(नीचः -निकृष्टतमों शोभां चिनोती)।
• बाढं = निश्चय ही। सं.- बाढम्। 'बाढं प्रगाढं भृशकृच्छ्रयोः' (अमर०
३.११.११७)। पालि-बाळ्हं (=exceedingly) [Childers]
गिरनार शिला : अष्टम अभिलेख
• विहारयातां = विहारयात्रा पर। सं.- विहारयात्राम्। विहारस्तु जिनालयै,
लीलयां भ्रमणं स्कन्धै।' (अनेकार्थ० ३.२२०३)। 'गमत्तोसव्योद्योर्यात्रा
(त्रिकाण्ड० ३.१२२)। पालि -विहारो (विहारः)। यात्रा (यात्रा)।
• अयासु = जाया करते थे। सं.- न्ययासुः, नियायिपुः। (लुङ् लकार)।
• मगया = आखेट। सं.- मृगया (मृग्यन्ते पश्वोऽस्यामिति)। 'मृगया-मृग
याट्यन्था। (शिकार)। पशुवध्यच्छले व्यापारं आखेटकं। (शब्द०)।
पालि-मिगवं (मृगवः)।
• अभीरमकनि = आमोद-प्रमोद। सं.- आभिरमकाणि। पालि-अभिरमणं
(अभिरम्यः)।
शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन / ८५
• अभुंसु = होते थे। सं.- अभूवन्।
• संतो = हुआ हुआ। सं.- सन्। पालि-संतो (सन्)।
• अयाय = गया। सं.- इयाय।
• संबोधिं = बोधगया को। सं.- सम्बोधिम्। पालि-संबोधि (=perfect
knowledge or enlightenment) (Childers).
• धंमयाता = धर्मयात्रा। सं.- धर्मयात्रा।
• हिरण्यपटिविधानो = सुवर्ण से पोषण। सं.- हिरण्यप्रतिविधानम्।
(हिरण्यम् - ध्रियत आयम्यमानमिति वा, ह्रियते जनैरुज्ज्वलमिति वा, हर्यतेर्वा
स्यात्तन्नामकरणैः। हिरण्यं हितरमणं युम्मर्म्य-वैभवम्वा अपि' (अमर० २.९४७)।
२.१०)। 'हिरण्यं द्रविणं द्युम्नमह्रै-वैभवम्वा अपि' (अमर० २.९.४७)।
'प्रतिविधानं प्रतीकारः' (शब्द०)। पालि-हिरञ्ञं (हिरण्यम्)।
• जानपदस य जनस = जनपद के लोगों का। सं.- जानपदस्य च जनस्य।
जनपद - जनपदे भवः, तत आगतो वा। देशे। (शब्द०)। (जानपदः -जानेन
जनपदः -जनाः पद्यन्ते गच्छन्ति यत्र। देशे। (शब्द०)। (जानपदः -जानेन
उत्पन्ना पद्यते, जनपदे भवः इति वा।)। 'त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं
त्यजेत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥' (चाणक्य० ३१)।
पालि-जानपदो (जनपदः)। जनपदो (जनपदः)।
• धंमपरिपुछा = धर्म-संबंधी परिप्रश्ना सं.-धर्मपरिपृच्छा। पालि-परिपुच्छा
(परिपृच्छा)।
• तदोपया = इस (अवसर) के अनुकूल। सं.- तदुपगा।
• भूय रती = अधिक आनंद। सं.- भूयः रतिः। 'भूयः-अतिशयेन बहुः।
बहूतरं।' 'रतिः रागं' (शब्द०)। (भूयः-अतिशयेन बहु)। (रतिः -रम्यते अनया
इति। प्रीतिः।)। सब्वदानं धम्मदानं जिनाति। सब्बं रसं धम्मरसो जिनाति॥ सब्वं
रतिं धम्मरती जिनाति। तण्हक्खयो सब्वदुक्खं जिनाति॥ (सद्धम्म० Ch.
XI.२०)। पालि-रति (रतिः)।
• भागे = भाग। सं.-भागः (भज्यते इति। अंशः।) (अथवा) ऐश्वर्य-समूह।
सं.-भागः (भगनाम् ऐश्वर्यानाम् समूहः इति।)
गिरनार शिला : नवम अभिलेख
• एव = ऐसा। सं.- एवम्। पालि-एवं।
पृष्ठ ८६
८६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• मंगले = मङ्गल (मङ्गलाचार)। सं.- मङ्गलम्। (मङ्गं नितरामशुभमर्द्दति,
गिरत्यपनयतीति वा -नि० ९.१४। (अथवा, मङ्गति विस्तार्य सर्पति, पद्यतेऽनेन
दुष्टदुर्मनस्तन्नाशयतीति आरेष्टम् । कुलकम्।) । 'मङ्गलं शुभे' (त्रिकाण्ड०
३.२५८)। 'मङ्गलम् अभीष्टार्थसिद्धिं' (शब्द०)। 'कल्याणं मङ्गलं श्रेमं क्षेमं शातं शुभं
शिवं शुभम्' (वैजय०)। पालि-मङ्गलं।
• आवाधेषु = रोगों के समय। सं.- आबाधेषु। आबाधः -क्लेश, कष्ट।
छड्छाड, हानि। (शब्द०)। पालि -आबाधो (आबाधः)।
• आवाहविवाहेसु = पुत्रो, पुत्रियों के परिणय के समय। (आवाह-कन्या
संस्कार करना। विवाह-कन्या-दान करना।) सं.- आवाहविवाहेषु।
'आवाहविवाहाभ्यां वा कृत्वा स्वांगमसंतोषयुतान् नयेत्।' (कौटिल्य -१.६)।
पालि-आवाहो (आवाहः)। विवाहो (विवाहः)।
• पुतालाभेसु = पुत्र-प्राप्ति के समय। सं. - पुत्रलाभेषु। पालि-लाभो (लाभः)।
• पवासासि = परदेस जाते समय। सं.- प्रवासे। (प्रवसत्यस्मिन्निति प्रवाशो
देशान्तरम्। प्रपूर्वाद्विच्प्रत्ययौ ।-उपसर्गगणो, प्रथम खंड, पृ.४४) । 'प्रवासः
विदेशवासं' (शब्द०)। पालि-पवासो (प्रवासः)।
• एत तु = पर इन (अवसरों) पर। सं.- अत्र तु। पालि -अत्र। अथवा [तु]
• महिडायो = महिलाएँ। सं.- महिलाः। (महिला - मह्यते इती। स्त्रीमात्रम्)
'महिला मार्या मुग्धायाम्' (अनेकार्थ० ३.१२७७)। 'महिला, महुला -योषिति'
(शब्द०)। पालि-महिला (महिला)।
• बहुविधं = बहुत प्रकार के। सं.- बहुविधम्। पालि-बहुविधो (बहुविधः)।
• खुदं = तुच्छ। घटिया। सं.- क्षुद्रम्। 'क्षुद्रो दरिद्र कृपणे
निकृष्टेऽल्पशत्रुसंज्ञयोः' (अनेकार्थ० २.४१०)। पालि-खुद्दो (क्षुद्रः)।
• निरथं = निरर्थक। सं.- निरर्थकम्। (निर्गताऽर्थो यस्मात्)। पालि-निरत्थो
(निरर्थः)।
• अपफलं = अल्प फल देने वाला। सं.- अल्पफलम्।
• खो = निश्चय ही। सं.- खलु। 'खलु प्रगे, सान्वने, वीप्सायां, माने,
निषेधे, अनुनये, वाक्यस्य भूषापूरणयोः, निश्चये, हेतौ च।' (शब्द०)।
पालि-खलु।
• एतारिसं = ऐसा। सं.- एतादृशम्। पालि -एतादिसो। एतारिसो।
(एतादृशः)।
पृष्ठ ८७
शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन / ८७
• ततेत = उसमें यह होता है। सं.- तत्रैतत्। पालि-तत्र। तथा। एतद्
(एतत्)।
• दासभतकम्हि = दासों और भृत्यों के प्रति । सं.- दासभृतकेषु। (दासो
ह्यस्तने, उपास्यतेति कर्माणि - नि० २.१७)। (अथवा, दायन्ते दीयते
भृत्यैर्भृत्यादिकं यस्मै सः।) 'दासः प्रेष्यः परिकरन्डो भुजिष्यपरिकर्मिणौ परावः
पराणपुत्रादः परगाजः परेषितः॥' (अभिधान० ३.३६०-३६१)। 'भृतको
भृतिभुक्कन्करों वेतनोपजीवि सः।' (अमर० २.९८३)। पालि-दासो (दासः)।
भतको (भृतकः)।
• सम्मप्रतिपत्ती = शिष्ट व्यवहार। सं.- सम्यक्प्रतिपत्तिः। (सम्यक्-अर्यन सह
सम्प्रतिपत्ति सङ्खच्यते इति। सङ्गतः।) । (प्रतिपत्तिः-प्रतिपद्यनमिति। प्राप्तव्यम्।
'प्रवृत्तियाम्' प्रत्यर्थो यदि तं प्रतिपद्यते सा तु सम्प्रतिपत्तिः स्यात्' । (शब्द०)।
पालि-सम्मा (सम्यक्)। पटिपत्ति (प्रतिपत्तिः)।
• गुरुनं = गुरुजनों के प्रति। सं.- गुरूणाम्। (गुरुः-गीयते सूयते
देवाग्न्यर्चनगुर्वादयभिः, गुणाति उपदिशति वा।) 'गुरुः-नितरत्यानं गुणाति
उपदिशति वा धर्मम्' (शब्द०)। 'गुख्यमोंपदेशकः' (अभिधान० १.७७)।
'मातामही मातुलानी तथा मातृष्व सोदरा। श्वश्रूः पितामही ज्येष्ठा धात्री च
गुरवः स्त्रियः॥' पालि-गुरु (गुरुः)।
• अपचिति = आदर का भाव। सं.-अपचितिः। 'अपचितिः -पूजायां, हानी
व्ययाप्याञ्च' (शब्द०)। पालि-अपचिती।
• वतव्यं = कहना चाहिए। सं.- वक्तव्यम्। पालि-वत्तब्बं।
• स्वामिकेन = स्वामी से। सं.- स्वामिकेन। 'स्वामी प्रभौ गृहे।' (अनेकार्थ०
२.३०२)। 'स्वामी अधिपतौ, ईश्वरे च' (शब्द०)। पालि-सामिको
(स्वामिकः)।
• निव्तानय = सिद्धि। सं.- निष्ठानम्। 'निष्ठानं तु तेमनं स्यात्'
(अभिधान० ३.३९९)। (निष्ठा-नितरां स्थितिः)। पालि-निट्ठानं (निष्ठानम्)
=accomplishment, completion (Childers).
• अस्ता = है। सं.- अस्ति। पालि-अत्थि।
• अनुग्रहो = अनुग्रह। सं.- अनुग्रहः। 'अनुग्रहोऽभ्युपपत्तिः' (अभिधान०
६.१५०८)। 'अनुग्रहोः अभीष्टसम्पादनलक्षणे प्रसादे, आनुकूल्ये।' (शब्द०)।
पालि-अनुग्गहो (अनुग्रहः)।
८८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• सुहृदयेन = सहानुभूति रखने वाले के द्वारा। सं.- सुहृदयेन। 'सुहृदयः-
सुष्ठु हृदयं यस्य। प्रयत्नसम्पन्नः।' (शब्द०)। पालि-सुहृदयो (सुहृदयः)।
• सहायेन = सहायक द्वारा। सं.- सहायेन। (सहायः-सह एति इति
सहायः। अनुकूलः।) पालि-सहाये (सहायः)।
• ओवादितव्य = दृढ़तापूर्वक कहना चाहिए। सं.- अववदितव्यम्।
(कार्यमवलम्ब्य वादो वदनं कथनमुपवादः)। 'अववादः-निन्यायाम्, विश्वस्ते,
आज्ञायाम्, अववचने च।' (शब्द०)। 'अववादस्तु निर्देशो निदेशः शासनं च
तत्' (अमर०)। 'अवः सान्त्वन इति षड्गविणयः' (उपसर्गार्थ-द्वितीय
खंड, पृ.३०१)। पालि-ओवदति (अववदति)।
• पकरणे = मामले में। सं.- प्रकरणे। 'प्रकथं स्यात्सत्त्वार्थे' (अनेकार्थ०
[L
..."
Wait, what is that word? Let's check "गृहस्थ" definition:
"गृहस्थः-गृहे वसन् तिष्ठति"?
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ग, ृ, हे
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र / स / व ?
There is a matra 'ा' and then 'स'?
Wait, "गृहे वास तिष्ठति"? No, "गृहे वा स तिष्ठति" or "गृहे रात्रौ तिष्ठति"?
Wait, look at "रापु":
First letter: looks like 'र' with 'ा' -> 'रा' or 'स' with 'ा' -> 'सा' or 'ग' with 'ा' -> 'गा'?
Second letter: 'र' or 'ध' or 'प'? It has 'ु' below: 'तु' or 'धु' or 'पु'?
Wait! Could it be "गृहे साधु तिष्ठति"?
Wait, in Sanskrit: "गृहे साधु तिष्ठतीति गृहस्थः"? No, "साधु" is used in etymologies when forming words with affixes, but गृहस्थ is from 'सुपि स्थः' (क प्रत्यय).
Wait, look at: "गृहे दारैः सह तिष्ठति"? No.
Could it be "गृहे रतः तिष्ठति"?
Wait, let's look at the next line:
"अभिसम्पद्यते । (छान्दो०) । पालि-घरवासा (गृहवासः)।"
- is itनिक्षीयतेorनिचीयते? "निचीयते इति" -> grammatically निकायः = नि + चि + घञ्, so "निचीयते इति"! Look at the text: निचीयते! Yes, चwith dirgha ee!निचीयते इति।`
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शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख
• कलिङ्गा = कलिंग देश (अथवा कलिंग देश के निवासी)। सं.-कलिङ्गाः।
'कलिङ्गु -पु. जगन्नाथात् पूर्वनिणे कृष्णातीरान्तरं शिले! कलिङ्गदेशः सप्रोक्तः'
इन्दुप्रतंदर्शी। (शब्द०)। [तंत्रों में कलिंग देश का वर्णन इस प्रकार से किया गया
है-'जगन्नाथात्समाभ्य कृष्णातीरान्तः प्रिये। कलिङ्गदेशः समाख्यातो
वाममार्गपरायणः॥'] पालि-कलिङ्गा (कलिङ्गाः, कलिङ्गः)।
Wait, let's look at:
'कलिङ्गु -पु. -> कलिङ्गः -पु. or कलिङ्ग -पु.? Looks like कलिङ्ग -पु.
पूर्वनिणे -> पूर्वनिणे or पूर्वभागे? Looks like पूर्वभागे or पूर्वनिणे? Let's check:
"
Here is the complete and accurate transcription of the text from both pages (Page 94 and Page 95) of the book सम्राट अशोक के अभिलेख:
[पृष्ठ ९४]
९४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• हते = मारे गये। सं.-हतम्। (हत - 'नाशितो। प्रतिहते, प्रतिरुद्धे, आशारहिते, गुणिते चा' (शब्द०)। पालि-हतो (हतः)।
• बहुतवकं = (उससे) कई गुना। सं.-बहुतावकम्। पालि-बहु (बहु)। तावतकं (तावकः)।
• मृटे = मर गये। सं.-मृताम्। 'मृतं मृतौ याचिते च' (अनेकार्थ० २.२०१)। पालि-मतो (मृतः)।
• ततो पच = उसके पश्चात। सं.-ततः पश्चात्। 'पश्चात् प्रतीच्यां चरमे' (अनेकार्थ० १७९२)। पालि-ततो (ततः)। पच्छा (पश्चात्)।
• अधुन = अब। सं.-अधुना (अस्मिन्काले)। 'साम्प्रतमधुनेदानीं सम्प्रति' (अभिधान० ६.१५३०)। पालि-अधुना
९६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
९६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• व्यसन = विपत्ति। सं.-व्यसनम्। 'स सुहृद् व्यसने यः स्यात्' (पञ्च०
१.३३७)। 'व्यसनं विपत्तौ, भ्रंशे, कामजाते, कोपजाते च स्त्रीसम्भवापन्नादौ
दोषे, दैवादिकृते उपद्रवे च' (शब्द०)। पालि -व्यसनं, व्यसन।
• अपग्रथो = आयातः। सं.-अपग्रथः।
• प्रतिभागं = भागीदारी। सं.-प्रतिभागः। पालि -पटिभागो (परंतु इसका
अर्थ भिन्न है। संज्ञा होने पर -'शत्रु'। विशेषण होने पर -'समान, सदृश')।
• सवमनुशानं = सब मनुष्यों की। सं.-सर्वमनुष्याणाम्। (मनुष्यः मानवे
जातिभेदे' -शब्द०)। पालि-सब्वो (सर्वः)। मनुस्सो (मनुष्यः)।
• एकतरे पि प्रपडसि = किसी न किसी संप्रदाय में। सं.-एकतरे अपि
पाषण्डे।
• यमत्रे = जितने भी। सं.-यन्मात्रः।
• अपकरेति = अपकार करे। सं.-अपकुर्यात्। पालि -अपकरोति
(अपकरोतीति)।
• खमितवियमते = (देवानांप्रिय के) मत में क्षमा कर देना चाहिए।
सं.-क्षन्तव्यमेतन्मते। पालि-खमितब्बो (क्षन्तव्यः)। मतं (मतम्)।
• शक्यं = शक्य। सं.-शक्यम्। 'शक्य - समर्थनीये, साधयितुं योग्ये'
(शब्द०)।
• क्षमनवे = क्षमा करने के लिए। सं.-क्षमणाय। (क्षमा - 'वादो यद्यद्यालिके
चैव दुःखे चोत्पादिते क्वचित्। न क्रुध्यति न वा हन्ति सा क्षमा
परिकीर्तिता ॥ - एकादशी०)। पालि -खमनं (क्षमणम्)।
• अटवि = अटवी-निवासी। वनवासी। सं.-अटव्याः (=अटवीवासिनः)।
'अटव्यरण्यं विपिनं गहनं काननं वनम्' (अमर० २.३२७)। पालि-अटवी
(अटवी)।
• अनुनेति = अनुग्रह करता है। सं.-अनुगृह्णाति (=अनुकूल्याय प्रेरयति)।
पालि-अनुनेओ (अनुनेयः)।
• अनुनिजपेति = (अपने विचारों में) ढालता है। सं.-अनुध्यापयति।
• अनुतपे पि = संतप्तित होने पर भी। सं.-अनुतापे अपि। पालि-अनुतापो
(अनुतापः)।
• प्रभवे = प्रभाव। शक्ति। सं.-प्रभावः। 'प्रभावस्तेजसि शक्तौ'
(अनेकार्थ० ३.१३०४)। पालि-प्पभावो।
शिला अभिलेख : शब्द-विवेचन / ९७
शिला अभिलेख : शब्द-विवेचन / ९७
• वुचति तेषु = उनको कहा जाता है। सं.-उच्यते तेभ्यः। पालि -वुच्चति
(उच्यते)। तेसं (तेभ्यः)।
• अवत्रपेयु = लज्जित हों। सं.-अवत्रपेरन्। [अथवा, अपत्रपेरन्
(अप - √त्रप् से निष्पन्न) = लज्जा के मारे सिर झुका लेना। 'न चात्मनापत्रपते
नृशंसः न सः सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत' (महाभा०)।
• हंञेयुं = मारे जायें। सं.-हन्येरन्। पालि-हन्ति (हन्ति)।
• समाचरियं = शांति का जीवन। सं.-शमचर्याम्। (तुलना करें - व्रतचर्या,
तपश्चर्या)। पालि-समाचरिया (शमचर्या)।
• रमसिये = जोर-जबरदस्ती होने पर (भी)। सं.-रभस्ये। 'रमसो
वेगाद्ययोः (अनेकार्थ० ३.१३५४)। पालि-रभस (रभस) [तुलना करें - Lat.
'rabies' (=madness, anger).
• अयि = यह। सं.-अयम्। (अयम् एतत्तदोऽसुम्भात् -नि० ३.१६)।
पालि-अयं।
• मुख्यत = मतानुसार मुख्य। सं.-मुख्यमतः। (मुख्यः-मुखे आदौ भवः।
श्रेष्ठः। अग्रमः। प्रधानः।) 'प्रधानमुत्तमं रव्यं श्रेष्ठं मुख्यमनुत्तमम्। वरं वरेण्यं
प्रमुखं पार्यं प्रवरं तथा॥' (वैद्यक०)। 'मतं तु संमतेऽभिहिते' (अनेकार्थ०
२.१९८)। पालि-मोक्खो (मुख्यो)।
• धर्मविजयो = धर्मविजय। सं.-धर्मविजयः। 'विजयो जयः' (अभिधान०
३.८०३)। पालि-विजयेति (विजयः)।
• अंतेषु = सीमावर्ती राज्यों में। सं.-अन्तेषु। (अन्तोऽन्तेः-नि० १.६)।
'अन्तोऽवसानं सीमा च' (अभिधान० ४.९६२)।
• अ षु पि योजनशतेषु = छः सौ योजन (दूरी तक) भी। सं.-आ षड्भ्यः
अपि योजनशतेभ्यः। 'षड्भ्यश्चिः स्याद्बहुष्ठ एतैर्दशाभिश्चेति॥ वितस्तिः
स्यात्ततो द्वाभ्यां हस्तः स्यात्तच्चतुष्टयम्। दण्डो धन्वन्तरं तस्य सहस्रद्वितयेन तु॥
क्रोशात्स्यात्तु गव्युतिस्तद्द्वयं योजनं मतम्।' (त्रिकाण्ड० २.२०२-२०४)।
'चतुष्क्रोशं तु योजनम्' (अभिधान० ३.८८८)। षट्-षट् पुनः सहतेः-नि०
४.२७)। (योजनं - √युज् से। A measure of distance equal to four
krośas or eight or nine miles - V.S.Apte) (600 योजन = about 1,500
miles - Romila Thapar). पालि -आ (आ)। योजनं (योजनम्)। 'I look
upon the yōjan as about equivalent to 12 miles.' (Childers)
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
बायाँ स्तम्भ (पृष्ठ ९८):
९८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• परं = परे। सं.-परम्। पालि-परं।
• चतुरे ४ रञो = चार (४) राजा। सं.-चत्वारः ४ राजानः।
पालि-चत्तारो (चत्वारः)।
• तुरमये नाम = तुरमय नाम का। सं.-तुरमयः नाम। (नाम-नामयतीति
वा, नम्यते नायतेनेन वा। 'एवं नामाङ्कः।' प्रकाशस्यम्।
उदाहरण- 'हिमालयो नाम नगाधिराजः' (हिमालयः प्रकाशोऽग्निरूपैस्तैः
इत्यर्थः।) पालि-नाम। तुरमय = Ptolemy II Philadelphos of Egypt
(B.C. 285-247)
• अंतिकिनि = अंतोकिन। सं.-अन्तीकिनः। Antigonos II Gonatas,
King of Macedonia (B.C. 278-7 to 242 or 239), grandson of
Antigonos I.
• मक = मक। सं.-मकः। Magas, King of Cyrene in North Africa,
west of Egypt (c. B.C. 285-258).
• अलिकसुदरो = अलिकसुन्दर। सं.-अलिकसुन्दरः। (अलिकम्-अल्पं
भूयते इति। छलञ्चम्) (सुन्दरः-सुष्ठु उनत्ति आर्द्रीकरोति विनामति
मनोहरम्। मनोरमम्। अभिरामम्।) Alexander, King of Epirus, son of
Pyrrhus (c.B.C. 272-255) or Alexander of Corinth (c.B.C.
252-244).
• निच = नीचे (दक्षिण में)। सं.-नीचाः। (नीच-नीचेर्निचितं भवति-नि०
४.२४)। 'नीच - निकृष्टर्मी लक्ष्मीं चमति पामरे निमं वामने च।' (शब्द०)
'च्युडूणीचवर्हह्रस्वाः' (अमर० ३.१०८८)।
• चोडपंड = चोल और पाण्ड्य। 'चोडः कञ्चुकवेशयोः' (अनेकार्थ०
२.१३३२)। 'चोल-चोला इति ख्याते पुंसो वस्तभेदे च द्राविड़क्षोणिपयोश्च
देशभेदे पु.।' (शब्द०)। सं.-चोलपाण्ड्याः।
• अव = तक। सं.-यावत्। 'यावत्-त्रि. यसरीमाणमय्या । यत्परिमाणे।
यावती। (शब्द०)
• रज़िविषविस = राजा के राज्य में। सं.-राज्ञविषये। विषय आश्रये'
(अमर० ३.२१४२)। 'विषयः-इन्द्रियगोचरे शब्दादौ, देशे च।' (शब्द०)
पालि - विसयो (विषयः)।
दायाँ स्तम्भ (पृष्ठ ९९):
शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन / ९९
• योनकंपोजेषु = यवनों और कम्बोजों में। सं.-यवन-कम्बोजेषु।
'यवन-पु. देशभेदे, तद्देशस्थे जने व.व.।' (शब्द०)। कम्बोज-'पञ्चनदं
समाश्रय देशदक्षिणपूर्वतः कम्बोजदेश' इत्युक्तदेशे च। (शब्द०)।
नाभकमनाभिपंतिष = नाभकों और नाभपंक्तियों में। सं.-नाभकनाभपंक्तिषु।
भोजपितिनिकेषु = भोजों तथा पितिनिकों में। सं.-भोजपिनितनिकेषु।
• अंध्रपालिदेषु = आंध्रों एवं पुलिंदों में। सं.-अन्ध्रपुलिन्देषु। अन्ध्रः-
देशभेदे, तन्त्य-लोके, जातिभेदे च। (शब्द०)। 'पुलिन्दः-चाण्डालभेदे।'
(शब्द०)। 'पुलिन्दा नाहला निष्ट्याः शबरा बर्बरा भटाः। मल्ला भिल्लाः
किराताश्च सर्वोऽपि म्लेच्छजातयः' ॥ (अभिधान० ३.९३४)
• अनुवदंति = अनुवर्तन करते हैं। सं.-अनुवर्तन्ते (=अविच्छेदेन
प्रवर्तयन्ति। अनुः सात्ये।) पालि-अनुवत्तति (अनुवर्तते)।
• दुत = दूत। सं.-दूताः। (दूतः-दूतो जवेनैर्वा, द्रवतेर्वा, वार्यतेर्वा-नि०
५.२)। 'दूतः सन्देशहरे वार्ताहरे' (शब्द०)। पालि-दूतो (दूतः)।
• व्रजंति = जाते हैं। सं.-व्रजन्ति। पालि-वजन्ति (व्रजन्ति)।
• श्रुतु = सुनकर। सं.-श्रुत्वा। पालि-सुत्वा, सुत्वान, सुणित्वान, सुणिय।
• धंमवुटं = धर्मवृत्त। सं.-धर्मवृतम्। पालि-वतं (वृत्तम्)।
• विधानं = विधान। सं.-विधानम्। 'विधानं हस्तिकवचे प्रेरणेऽध्वर्युने धने।
चेतोपायविधेषु प्रकारे वैरकमिणि'॥ (अनेकार्थ० ३.१०१६- १०१७)।
पालि-विधानं।
• अनुविधिर्यंति = अनुसरण करते हैं। सं.-अनुविध्यन्ति। 'उपत्तिष्ठति
तिष्ठन्तं गच्छन्तमनुगच्छति। करोति कुर्वतः कर्मच्छायानुरोधीयते ॥'
(महाभा० ६. ७५३)
• प्रितिरसो = तृप्ति का आस्वादन। सं.-प्रीतिरसः। 'प्रीतिः हर्षे, आमोदे,
तृप्तौ च' (शब्द०)। 'रसः-रस्यते इति। आस्वाद्ये।' (शब्द०)। परायत्तः प्रीतिः
कस्येव सं सेतुः पुरुकृः (मुद्रा० ३.४)। पालि-पीति (प्रीतिः)। रसो (रसः)।
• परात्रिकम् = पारलौकिक। सं.-पारत्रिकम्। पारत्रिकं - परत्र भवं।
पारलोक-हितकारके कम्मणि परलोकभवे च। (शब्द०)। पालि-परत्थ (परत्र)।
• मंञति = मानता है। सं.-मन्यते। पालि-मञ्जति।
• एताये च अटये = और इस प्रयोजन के लिए। सं.-एतस्मै च अर्थाय।
'अर्थो हेतौ प्रयोजने' (अनेकार्थ० २.२२४)।
यहाँ प्रस्तुत चित्र के दोनों पृष्ठों (पृष्ठ १०२ एवं १०३) का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:
[पृष्ठ १०२]
१०२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
धौली शिला : प्रथम पृथक् अभिलेख
• वचनेन = आज्ञा से। हवाले से। सं.-वचनेन। 'व्याहार उक्तिर्लपितं
भाषितं वचनं वचः।' (अमर० १.२५७)। पालि - वचनेन (वचनम्)।
• तोसलियं = तोसली में। सं.-तोसल्याम्।
• नगरव्योवहालका = नगर व्यवहाराध्यक्ष। सं.-नगरव्यवहारकाः। (नगरम्
पञ्च हस्व प्रासादादयः सन्ति यत्र। बहुलो जनसम्पन्नश्च। पुः। पुरम्।) पुरका वा
पौरव्यवहारिक (कीथेल)। पालि-नगरे (नगरम्) वोहारिक
(व्यावहारिक) = A royal officer skilled in the law, a magistrate
(Childers).
• अं किछि = जो कुछ। सं.-यत्किञ्चित्। पालि-यं किञ्चि।
• दखामि = (उचित) समझता हूँ। सं.-पश्यामि। पालि-पस्सति (पश्यति)।
• हकं = मैं। सं.-अहम्। पालि-अहं।
• कंम = कर्म द्वारा। सं.-कर्मणा। (कर्म कश्यायः क्रियते इति सतः-सि०
३.१)। पालि-कम्मन, कम्मना।
• दुवालते = (उचित) उपायों से। सं.-द्वारतः। 'उपाये निर्गमे द्वारा'
(त्रिकाण्ड० ३.३०४)। पालि-द्वारं। दुवारं (द्वारम्)।
• आलभेहं = मैं आरंभ करूँ। सं.-आरभे अहम्। पालि-आरभति
(आरभते)।
• तुफेसु = आप में। सं.-युष्मासु। पालि-तुम्हेसु।
• आयत = स्थापित हैं। सं.-आयताः। आयमय उपशमय स्थापयेत्यर्थः
(उपसर्गार्थ०-खंड ३-पृ. ४९०)। पालि-आयतो (आयतः)।
• पनेयं = प्रणय। सं.-प्रणयम्। (प्रणयः-प्रणयनम्। प्रश्रयः। प्रेम)। 'प्रणयः
प्रेम्ण्युपचये।' (अनेकार्थ० ३.१०५२)। पालि-प्पणेयो (प्रणयः)।
• सु = (अत्यधिक)। सं.-स्वित्। 'स्वित् प्रश्ने च वितर्के च तथैव पादपूरणे'
(मेदिनी०)। पालि-सु।
• पजा = संतान। सं.-प्रजा। (प्रजाता इति। सन्ततिः।) 'प्रजा लोके सन्ततौ
च'। (अनेकार्थ० २.८७)। पालि-पजा।
• अथा = जैसा।