अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
खुशियाँ मनाई गयी थी। शुक्राने अदा किये गये थे और किस्सा मुख्तसर
यह कि मुझको आँखों का नूर और दिल का सुरूर समझा जाता था।
आपने इस सिले में खुदा को क्या दिया कि उसने आपको एक इनसान
की शक्ल में औलाद दी। आपसे जो भी पूछता था आप यहीं कहती थीं
कि खुदा का बंदा है, खुदा ने दिया है। उसी की अमानत है और मैं
अमानतदार हूँ। बस अब मालिक अपने गुलाम को तलब करता है।
अमानत रखने वाला अपनी अमानत तलब करता है। आप खयानात न
करे, न आपकी चीज थी न आपसे छीनी गई। इतने दिन के वास्ते
आपको दी गई थी कि रखो, बाद को हम वापस ले लेंगे। अब वापस
लिया जा रहा है फिर आपको क्या हक है कि रद्दोकद करें। क्या आपने
हमेशा से यह सोचा था कि मुझे मौत कभी न आएगी। अरे, तुम भी
जानती थी और मुझे भी मालूम था कि हम तुम सब मरेंगे, कोई आगे
कोई पीछे। या तो मुझको रोना पड़ता तुम्हारे लिये या तुम्हें मेरे लिए।
उसका मंशा यह था कि बूढ़ी माँ जवान औलाद को रोयेगी और बाकीया
तीन भाई अपने छोटे भाई का मातम करेंगे। तो क्या कोई, आज इस
दुनिया में इतनी ताकतवाला है कि खुदाबंद के अहकाम पलट दे? कोई
नहीं। अपने खानदान ही में कितनी ऐसी माँएँ हैं जो बुढ़ापे में जवान
औलाद का दाग खोए बैठी हैं और कितने ऐसे भाई हैं जो अपनी आँखें
अपने भाई के लिए सुर्ख कर चुके है और कितनी ही बहनें, भावजें,
भतीजियाँ, भतीजे, भानजियाँ, भानजे हैं जो कि भाई, देवर, चाचा, मामू
के लिए सीनाकोबी कर चुके हैं। दुनिया का यही धंधा है। दुनिया नाम
ही उसका है। अगर मरना न होता तो जिन्दगी का फायदा ही क्या था।
अगर रात न हो तो दिन में लज्जत ही क्या। अगर गम न हो तो
शादी-ब-मंजिले ग़म है। गरज कि दुनिया एक माज़ने मुरक्कब है। जिसमें
सब जाइके हैं। ऐशो मसर्रत, गमों अंदोह, आराम व तकलीफ, गफलत व
बेघणी, नेकी व बदी, मौत व जीस्त, गरज कि हर चीज यहाँ मिलेगी।
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पास खुशकिस्मत वह है जिसने अच्छी बातें कुबूल की और बुराइयों
से परहेज किया। गलफत पर होशियारी की तरजीह दी और माबूदे हकीकी
की याद में लगा और होशियार रहा अपने फराइज़ की अदायगी में। नेकी
को कबूल किया और बदी को ठुकराया। अबदी आराम की खातिर
तकलीफ बरदाश्त की और इबादत में मसरूफ़ रहा, मौत को पेशेनजर रखा
और जीस्त ही में सामाने आसरत जमा कर लिया।
ऐश व इशरत में पड़कर गफलत नहीं की और पेश आने वाले गम
व अंदोह का खटका महसूस करता रहा। जिसने इन बातों को अख्तियार
किया और हर मुसीबत व तकलीफ व आराम व राहत को मिनजानिब
अल्लाह तस्सवर किया और उसकी निआमतों का शुक्रिया अदा किया।
इसाइब व तकलीफ पर सब्र किया और कहा कि यह सब मिन जानिब
अल्लाह हैं।
दोस्त का दिया हुआ जहरेहलाल भी शहद मसफ्फा ख्याल किया
और सब्र किया, शुक्र किया यस राजी का लिया उसे जो कौनैन का
मालिक और मशरिक व मगरिब का रब है। क्या तुम इसके ख्वाहिशमंद
नहीं हो कि खुदा तुम्हारा पैदा करने वाला है और जिसके सामने तुम्हें
जाना है, तुम्हें अपना दोस्त कहकर पुकारे। अरे दुनिया उसकी मुतयन्नी
है और वह हमको अपना दोस्त कहे। आज मौत के सामने बैठा हुआ
अशफाक कुछ ख्वाहिश नहीं रखता, मगर हाँ यह कह दे कि अशफाक मैं
तुमसे राजी हूँ और तू मेरा बंदा है मैंने बंदानी में कबूल किया। वह
कहता है कि ऐ ईमान वालो! बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है।
दूसरी जगह फरमाता है यानी खुशखबरी सुना दो उन सब्र करने वालों
को कि जब कोई उनको मुसीबत पहुँचती है तो कहते हैं कि बेशक हम
अल्लाह ही के हैं और बेशक हम उसकी तरफ लौटने वाले हैं। फिर
फरमाता है यानी यही हैं जिसपर बरकत है उनके रब की तरफ से और
रहमत है। यही लोग हिदायतवाले हैं। यह कौल आपको जनाबे बारी के
लिख दिए। अब समझना न समझना आपका काम है।
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आपका सब्र व शुक्र आपको उसके दरबार में मकबूल व मुकर्रब
करेगा और अगर खुदानाख्वास्तां आप हद से आगे बढ़ गईं तो आप खुद
समझदार और पढ़ी-लिखी हैं। आपका नाल ओशेवन, आहवजारी,
सीनाकाबी, मुझको जिन्दा नहीं कर सकती, न मौत से बचा सकती है।
हाँ सब्र करना, कलमा व दरूद पढ़ना और बख्शना मेरे लिए कुछ सूदमंद
साबित हो जाए।
यस मेरी अच्छी माँ मेरी खताएँ माफ फरमाकर मशगूले-खुदा हो
जाओ। उसकी मर्जी यही थी और कौन है जो उसके हुक्म को टाल सके।
मुझसे आपको दुख पहुँचा। आपका बुढ़ापा बरबाद हो गया। आपकी
जिन्दगी जीक में पड़ गई। मैंने की। हाँ जाहिर असबाब में से एक मैं भी
हूँ। मगर मौला की मर्जी और उसका हुक्म पोशीरा रहता है। समझदार
मिनजानिब अल्लाह हर बात को समझते है और ना समझ इन्साफों की
तरफ ख्याल दौड़ाते हैं। इससे कब्ल एक कार्ड फैसले के मुतमाल्लिक
मिला होगा। कैसे मजे की बात है कि मैं अपने कलम से अपनी मौत
की खबर आपको पहुँचा रहा हूँ। मैंने एक किताब लिखना शुरू की थी
और वह तकमील को न पहुँच सकी। खैर मालिक की मरजी ही न थी
जिसमें मेरा मकसद बच्चों के लिए नसीहत करना था। खैर उनके लिए
जो मैदाने अमल है और जो सामने आए उस पर गामजन न हो। मुझे
जो लिखना है थोड़ा-थोड़ा सब लिख दूँगा क्योंकि अब वक्त मेरे पास
मजमून तिगारी व कलम फरसाई का नहीं हैं मुख्तसर-मुख्तसर सब को
लिख दूंगा। सब अपना-अपना मतलब निकाल लें। मुझे तो सबसे जरूरी
आप को लिखना था और यूँ तो ये मजमून वाहित तस्सवुर किया जाए।
सभी से सब्र की गुजारिश है और सब्र ही खुशी की कुंजी है। मुझे
बूबू की भी परेशानियों का इल्म है और आप सबकी कोफ्त में ऐसे वक्त
में इजाफा नए गम का है। मगर क्या मौला की मर्जी टाली जा सकती
है? नहीं हरगिज नहीं। वह हर सूरत से आजमाइश कर रहा है। तुम सब्र
को हाथ में न जाने दो। जो दोस्त की तरफ की खुशी व गम मिले
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मुस्कराते हुए चेहरे और मुतमइन दिल के साथ कबूल करो कि फलाहे
दीनी व दुनयवी हासिल कर सका। मैं कोशिश करूँगा कि यह खत
तुमको मेरी मौत से पहले ही मिल जाए ताकि तुम्हारे दुख में कमी हो
जाए और तुम सोच सको कि मरने वाला क्या बात है कि मरते हुए भी
मुतमइन व खुश है-'फना है सबके लिए हमपे कुछ नहीं मौकूफ, बका है
एक फ़क़त जाते किब्रिया के लिए'। आदम अलेहिस्सलाम से लेकर इस
वक्त तक कौन ऐसा है जो मरा न हो? जिसने बिसाते-आलम पर जिन्दगी
के मोहरे बसाए और मौत के हाथों के सामने जरूर मात खाई, यस
उसका गम बेकार है और आने वाली जरूर आने वाली बात के लिए
परेशान होना सरासर गलती है। अब रहा मुहब्बत, डाह, मोह, प्रेम-ये सब
दुनियाबी धंधे हैं। खुदा से मुहब्बत करो। उसको पूजो जो हमेशा जिन्दा व
कायम रहेगा। तुम्हें अपनी बकीया जिन्दगी में कभी तो उसके लिए रोना
नहीं पड़ेगा। बस उसी से मुहब्बत करो और उसी को समझो। अक्ली
दलाइल, महजब़ी मसाइल, फलसफियाना बहस दुखे हुए दिल पर
नमक-मिर्च का काम करते हैं। मैं खूब जानता हूँ कि आप सोंचेगी कि
मैंने अपनी करतूतों से आपका बुढ़ापा खराब किया और भाइयों और
दीगर आइज्जा की जिन्दगी दुख की जिन्दगी बना दी। मैंने क्या किया।
मैंने कुछ नहीं किया। उसका हुक्म रोजेअजल से ऐसा ही था, सो होकर
रहा। जो बात होने वाली होती है असबाब उसमें पेशतर से होना शुरू
होते हैं और असबाब जब पायए तकमील को पहुँच जाते हैं, बात पूरी हो
जाती है। यस मेरे लिए यह मौत और यह दिन था। सो मुझे मिला।
और तुम्हारे लिए दुख, बुढ़ापे का धक्का और सीना सोबी लिखी थी वह
तुम्हें मिल रही है। जो इसके लिए उसने मुनासिब समझा वह उसे
तकसीम कर दिया। यस कौन है जो शिकवा करे और लब शिकायत के
वास्ते खोले ....................
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तुम सबको गम उठाने के लिए इंतखाब किया और मुझे मन्सूरे वक्त
बनाने का चुन लिया। मगर तुमको गिरिए याकूब अता किया तो मुझको
सुन्नते यूसफी अदा करने के लिए पुकारा। अगर तुमको मातम कुनाँ
मिस्ल खानदाने नबवी बनाना चाहा, बना दिया और मुझे मुत्तबए हुसैन
शहीदेतेगेजफा के खिताब से नवाजा! उसकी शान निराली। उसकी अदा
अनोखी, हर जगह नए रंग में हर तरफ नए रूप में, जलवागर है जो कुछ
हुआ और जो होगा और हो रहा है उसकी मरजी से हो रहा है और
होगा। पस कौन है जो सरताबी करे। और कौन है जो उसके हुक्म से
बाहर जा सके। बस उसी पर नजर रखो और सब्र-करार हाथ से न जाने
दो। शुक्र करो उसकी अमानत उसकी तरफ जा रही है और सानआ अपने
मननूअ को बिगाड़ना चाहता है। फिर तुम कौन रोने वाली, तुम कौन
तड़पने वाली? उसकी चीज थी उसको अखतियार है। सब्र करो, सब्र करो
और बकीया जिन्दगी का बेशबहा वक्त मेरे लिए रोने में न सर्फ करो
बल्कि उस सफ़र की तैयारी में लगाओ जो एक दिन दरपेश है। अबावत में
मगफिरत है। गुनाहों में वक्त न गुजार दो क्योंकि यही काम आएगा।
गफलत छोड़ो और उसको पकड़ो। दुनिया फना होने वाली है और तुम्हारा
भी बुढ़ापा है। अच्छा मेरी खताएं माफ करो और मुझे अपने हकूक से
सुबुकदोश करो। तुमको खुदा की अमान में दिया। तुम्हें नेक बीवी और
साबिरा बीवी बनाए। आमीन!
भावजों और भाइयों! अलफराक बीनी व बीनकुम-तुम आपस में
मिल-जुलकर रहना और दुनिया व बदकिस्मत माँ की खिदमत में लगी
रहना और बकीया जिन्दगी को सकून से गुजरने का मौका देना। अगर
तुम लोग ऐसे ही जो आपस में शिकवा व शिकायत करते रहे और
शकररंजी तुम्हारे दरम्यान रही तो कुछ लुत्फ नहीं। शीरो शकर बनकर
रहना और जुदा न होना। मेरी तो यही ख्वाहिश है और मुझे माफी
देना। खुदा की मरजी यही थी।
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भाइयों! तुमने इंतहाई कोशिश की मगर मौत और खुदा का हुक्म
टाले से नहीं टलता और पूरा होकर रहेगा। तुम भी मजबूर हो रहे।
सब्र-शुक्र करो। खुदा की मरजी ही यह है। मैं बताए देता हूँ कि मैं एक
पुरसुकून मौत मर रहा हूँ। मैं नहीं कह सकता कि कौन ख्याल मुझे मस्त
बनाए हुए है। फिर अंदर से फूला चला जाता है। मुझे कतई ख्याल ही
नहीं गुजरता कि मुझे फाँसी दी जायेगी। मरेंगे तो सब ही, कुछ, मैं ही
नहीं मर रहा हूँ। तुम खुदा पर नजर रखो और बजाए रोने-धोने के मेरे
ईसाले सवाब में लगे रहना कि वहाँ काम आए। अब ज्यादा क्या लिखूँ।
खुदा तुम सबको सब्रे जमील अता फरमाए और मुझ गुनहगार को जवारे
रहमत में जगह दें।¹
फकता अशफाक उल्ला खाँ
जेल की कोठरी से अशफाक द्वारा लिखे गये पत्रों को पढ़ने से
उनकी मानसिकता को ठीक से समझा जा सकता है। अशफाक का
व्यक्तित्व बहुत बड़ा था। वे परिवार के माध्यम से पूरे देश को देखते थे
और अपनी संवेदना, अपना सच बयान करते थे। वे चिन्ता करते थे
आने वाली पीढ़ियों का।
- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग-सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 135-144
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बनारस बम काण्ड में गिरफ्तार हुई शचीन्द्रनाथ बख्शी की बड़ी बहन
नलिनी से भी खूब प्रभावित थे। अशफाक नलिनी को 'दीदी' कहते थे।
नलिनी क्रांतिकारियों को आवश्यक संदेश भिजवाती थी। फाँसी घर से
अशफाक ने नलिनी को एक मार्मिक पत्र लिखा है जो निम्नवत् है -
फाँसी घर
फैजाबाद जेल
16.12.1927
अलविदा
मेरी स्नेहमयी दीदी,
मैं अब दूसरी दुनिया में जा रहा हूँ जहाँ दुनियावी मुसीबतें नही
रहेंगी और जीवन को ज्यादा उत्तम बनाने के लिए संग्राम करने की
जरूरत होगी। जहाँ न मौत होगी न मरने का प्रश्न! दीदी! मैं मरने जा
रहा हूँ वरन वस्तुतः अमरत्व प्राप्त करने जा रहा हूँ। जब कभी मेरे साथी
बख्शी जी रिहा हों, उन्हें बताइएगा कि मैंने स्थिर मन तथा प्रसन्नचित्त
होकर जिन्दगी की आखिरी साँस पूरी की है।
अगला सोमवार मेरे जीवन का अन्तिम दिन होगा। आपको मौका
मिले, तो अंतिम बार इस भाई से मुलाकात कर जाइएगा। अगर अनुकूल
परिस्थिति न हो, तो आप सब लोगो से हमेशा के लिए यही से विदा
लेता हूँ। मेरा आखिरी प्रणाम स्वीकार कीजिए और विदा दीजिए। आपको
बाद में पता चलेगा कि मैंने मृत्यु को कैसे अपनाया है। खुदा आप सबके
साथ रहे। बाबा को मेरा विनम्र प्रणाम कहिएगा। सावित्री, गौर, कानू
तथा अन्य बच्चों को प्यार। नेपाल को मेरा नमस्कार। सब बड़ों को
प्रणाम तथा छोटो को प्यार। मेरी यह अभिलाषा है कि आप सबको एक
बार फिर से देखूँ। अगर सम्भव हो तो आप लोग आ जाइएगा। खुदा का
ख्याल कीजिए और मेरे लिए दुखी न होइएगा। मेरे विषय में बख्शी जी
को खबर दीजिएगा।
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मैं आपको अपनी दीदी मानता हूँ। आप मुझे भूलेंगी नहीं।
प्रसन्नचित रहिए यह भी जानिए कि मैं वीरगति प्राप्त कर रहा हूँ। सबको
प्रणाम।¹
आपका,
अशफाक उल्ला खाँ
वारसी,
(मूल हस्ताक्षर अंग्रेजी में)
अपठनीय हस्ताक्षर --------------------
मोहर
ले०कर्नल आई०ए०एस
सुप० जेल, फैजाबाद।
अशफाक उल्ला की समझ व्यापक है वे एकता के पक्षधर थे
खासतौर पर साम्प्रदायिक एकता के। राम प्रसाद बिस्मिल के विषय में
उनकी मित्रता और विचार उल्लिखित ही है और यह पत्र-भाषा से ही ज्ञात
होता है कि वे हिन्दुस्तानी होने का गर्व महसूस करते हैं। हिन्दू को हिन्दी
शब्दों से सजा कर पत्र लिखने वाले अशफाक में साम्प्रदायिक एकता की
कितनी मजबूत संवदेना पल रही थी, यह ज्ञात होता है। अशफाक अपने
परिचितों के परिवार का भी हाल चाल लेना, संदेश देना नही भूलते।
अशफाक उल्ला खाँ की काव्य रचनाएँ -
(1)
• बहार आई हुई शोरिश जुनूने फितना सायाँ की,
इलाही खैर करना तू मेरे ज़ेबो गरीबाँ की।
• सही जज़बाते हुर्रियत कहीं मेटे से मिटते हैं,
अबस हैं धमकियाँ दारोरसन की और ज़िंदाँ की।
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 145
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• वह गुलशन जो कभी आजाद था गुज़रे जमाने में,
मैं शाखे खुश्क हूँ हाँ हाँ उसी उजड़े गुलिस्ताँ की।
• नहीं तुमसे शिकायत हम सफीराने चमन मुझको,
मेरी तकदीर ही में था कफस और कैद जिंदाँ की।
• करो जब्ते मुहब्बत गर तुम्हें दावाएं उलफत है,
खामोशी साफ बतलाती है ये तस्वीरे-जानाँ की।
• यू ही लिक्खा था किस्मत में चमन पैराये-आलम ने,
कि फसले-गुल में गुलशन छूटकर है कैद जिन्दाँ की।
• जमीं दुश्मन जयाँ दुश्मन जो अपने थे पराये हैं,
सुनोगे दास्ताँ क्या तुम मेरे हाले-परीशाँ की।
• ये झगड़े और बखेड़े मेटकर आपस में मिल जाओ,
थे तफरीके अगस है, तुम में हिन्दू और मुसलमा की।
• सभी सामाने-इशरत थे मजे से अपनी कटती थी,
वतन के इश्क ने मुझको हवा खिलवाई जिंदाँ की।
• खुदा वाकिफ है जैसी भी गुज़रती है गुज़रती है,
सुनोगे दास्ताँ क्या यार तुम बीमारे-हिजराँ की।
• मिसाले-कैस दीवाना किसी लैला की खातिर में,
महीनों ठोकरें खाया किया को हो बियाबाँ की।
• बहमदल्ला चमक उठ्ठा सितारा मेरी किस्मत का,
कि तकलीदे-हकीकी की अता शाहे-शहीदाँ की।
• इधर खौफे-खिजाँ है आशियाँ का डर उधर दिल को,
हमें यकसाँ है तफ़रीहे-चमन कैद और जिंदा की।
181
• ज़िब हसाई दरे-हज़रत की हसरत अपना ईमाँ है,
मुबारक हज़रते वाइज़ को ख्वाहिश बागे-रिज़बा की।¹
(2)
• वह रंग अब कहाँ है नसरीनो नसतरन में,
उजड़ा पड़ा हुआ है क्या ख़ाक वतन में।
• कुछ आरज़ू नहीं हैं, है आरज़ू तो यह है,
रख दे कोई ज़रा-सी खाके-वतन कफ़न में।
• ऐ पुख्ताकारे उलफ़त हुशियार डिग न जाना,
मेराज़े आशिकाँ है इस दार और रसन में।
• था नाराए-अनहलक़ और दवाए मुहब्बत,
रखा हुआ था और क्या मन्सूरो कोहकन में।
• मौत और जिंदगी है दुनिया का एक तमाशा,
फरमान कृष्ण का था अर्जुन को बीच रन में।
• जिसने हिला दिया है दुनिया को एक पल में,
अफ़सोस क्यों नहीं है वह रूह अब वतन में।
• ऐ खायनीने मिल्लत ये खूब याद रखना,
हैं बोस और कन्हाई अब भी बहुत वतन में।
• सैयाद जुल्म पेश आया है जब से हसरत,
ऐ बुलबुले क़फ़स में जाओ ज़रा चमन में।²
- काकोरी शहीद स्मृति, भगवान सिंह माहौर पृष्ठ -228
- काकोरी शहीद स्मृति, सम्पादक-भगवानदास माहौर पृष्ठ -227-228
182
हमारी तरह से है और भी कई दिलगीर,
फिराये देखिये हमको कहाँ-कहाँ तकदीर।
असीरे गर्दिशे लैलो निहार हो के चले।।
• तिरे ही वास्ते आलम में हो गये बदनाम,
तिरे सिवा नहीं रखते किसी से हम कुछ काम,
तिरे ही नाम को जपते हैं हम तो सुबहो शाम,
वतन न दे हमें तर्के-वफा का तू इलजाम।
कि आबरू पे तेरी हम निसार हो के चले।।¹
(5)
• वह असीरे-दामे-बला हूँ मैं जिसे साँस तक भी न आ सके।
वही कतीले-खंजरे-जुल्म हूँ जो न आँख अपनी फिरा सके।।
• मिरा हिन्दूकुश हुआ हिंदूकुश ये हिमालिया है दिवालिया।
मेरी गंगा-जमुना उतर गई है बस इतनी है कि नहा सके।।
• मिरे बच्चे भीख है माँगते, उन्हें टुकड़ा रोटी का कौन दे।
जहाँ गावे कहें परे-परे, कोई पास तक न बिठा सके।।
• मिरे कोहेनूर को क्या हुआ, उसे टुकड़े-टुकड़े ही कर दिया।
उसे खाक में ही मिला दिया, नहीं ऐसा कोई कि ला सके।।²
(6)
• नही अपनी हालत है बताने के काबिल।
नही माज़रा ये सुनाने के काबिल।।
- काकोरी शहीद स्मृति, सम्पादक-भगवानदास माहौर, पृष्ठ -230
- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विघार्थी, पृष्ठ -85
184
जुबाँ तक नहीं हम हिलाने के काबिल।
• बुजुर्गों का किस मुंह से हम राग गाएँ।
जब इकगुन भी उसका न अपने में पाएँ।
किसी को नहीं मुँह दिखाने के काबिल।।
• चमन में खिज़ा अपने इठला रही है,
कपायत गुलों-गुंचों पर आ रही है।
जमी चर्ख़ बनकर सितम ढा रही है,
सुनो रो के बुलबुल ये क्या गा रही है।
• कभी खार था इसका बागे-अदन को,
नजर हाय किसकी लगी इस चमन को।।
• कभी यों न उजड़ा था मसकन किसी का,
न यों जल गया होगा खिरगन किसी का।
हरदयाल आता है यूरोप से न पाल आता है,
दिल में रह-रह के बस इतना ख़याल आता है।
भरने जाते हैं कहीं उम्र के पैमाने को,
हिन्द को छोड़ते हैं रंजोअलम खाने को¹
(7)
• उरूजे-कामयाबी पर कभी हिंदोस्ताँ होगा,
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियाँ होगा।
• जुदा मत हो मिरे पहलू से ए दर्दे-वतन हरगिज़,
न जाने वादे मुरदन मैं कहाँ, और तू कहाँ होगा।
- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विघार्थी, पृष्ठ -86
185
• वचन की आबरू का पास देखें कौन करता है,
सुना है आज मक़्तल में हमारा इम्तहाँ होगा।
• ये आये-दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ खंज़रे-क़ातिल,
बता कब फैसला उनके हमारे दरमिया होगा।
• शहीदों के मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।
• कभी वो दिन भी आएगा जब अपना राज़ देखेंगे,
जब अपनी ही ज़मी होगी, जब अपना आसमाँ होगा।¹
(8)
• जमाना बना यूँ न दुश्मन किसी का,
खिज़ाँ से लुटा यूँ न गुलशन किसी का।
• रहा एक बुलबुल भी जिसमें न बाक़ी,
फ़साना जो उजड़े चमन का सुनाती।
• हमें ख़ाक में वो मिलाये हुए हैं,
ज़माने के रौंदे सताये हुए हैं।
तनज्जुल के चक्कर में आये हुए हैं,
कि अपने ही घर में पराये हुए हैं।
• ये सब कुछ सही है, मगर जान तन में है,
शरारा है ये अपने ठंडे अगन में।।²
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ - 159-160
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ - 160
186
(9)
• नहीं गरचे अब वे हरारत दिलों में,
वही खून बाकी है लेकिन रंगों में।
जुनूँ गरचे बाकी नहीं अब सरों में,
मगर अलोगिल है वही हड्डियों में।
• लटे भी तो हाथी लटेगा कहाँ तक,
समंदर घटे से घटेगा कहाँ तक।
• नही गरचे रौनक वो अपने चमन में,
न वो रंग-बू है गुले-यासमन में।
है मुद्दत से गो अपना सूरज गहन में,
मगर खूँ तो है वो ही अपने बदन में।
• वह स्थान गंगोतरी का पवित्तर,
पिथौरा की लाट और उदयपुर के पत्थर।
हिमालय की वे चोटियाँ सर उठाकर-
इक आवाज़ से कह रही है बराबर -
कि, जब तक हैं हम इनको मरने न देंगे।
फना का इन्हें जाम भरने न देंगे।।¹
(10)
• ख्याल आता है जिस दम दिल में चुभता है सिनाँ होकर,
रहे क्यों कब्ज़ा-ए-अग़ियार में हिन्दोस्ताँ होकर।
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 87-88
187
• शहीदाने-वतन का खून एक दिन रंग लाएगा,
चमन में फूट निकलेगा यह बरगे-अर्गवाँ होकर।
• फ़कत दारोरसन ही कामयाबी का ज़रिया है,
मकासिद तक यह पहुँचाएगी हमको निर्दबाँ होकर
• नहीं वाकिफ़ ये मादर और पिदर इस अमरे-शुदनी से,
कि आफ़त में पड़ेंगे उनके बच्चे नौजवाँ होकर।
• सता ले ऐ फलक मुझको जहाँ तक तेरा जी चाहे,
सितम परवर सितम झेलूँगा शेरे नेसताँ होकर।
• करूँ मैं इन किलाबे दहर का शिकवा मआज अल्लाह,
है तुफ़ मुझे पर डरूँ गर जेल से मैं नौजवाँ होकर।
• दलहता है कलेजा दुश्मनों का देखकर 'हसरत',
चला करते हो जब बेड़ी पहनकर शादमाँ होकर।¹
(11) कुछ शेर-अशआर
• आनी थी हमको मौत सो आई वतन से दूर,
अब देखना ये है कि ये मिट्टी कहाँ की है।
• बहुत ही जल्द टूटेंगी गुलामी की ये जंजीरे,
किसी दिन देखना आज़ाद ये हिंदोस्तां होगा।
• जिन्दगी बादेफ़ना तुझको मिलेगी हसरत,
तेरा ज़ीना तिरे मरने की बदौलत होगा।
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -88-89
188
• वतन हमेशा रहे शादकाय और आज़ाद,
हमारा क्या है अगर हम रहे रहे न रहें।¹
• वह जुर्मे-आरजू पै जिस कदर-चाहें सज़ा दे लें,
मुझे खुद ख्वाहिशे-ताजीर है मुलजिम हूँ इकरारी।²
• बुज़दिलों को ही सदा मौत से डरते देखा,
गो कि सौ बार उन्हें रोज़ ही मरते देखा।
वीर को मौत से हमने नहीं डरते देखा,
तख्तये मौत पे भी खेल ही करते देखा।
• मौत इक रोज जब आनी है तो डरना क्या है,
हम सदा खेल ही समझा किये मरना क्या है।³
• तंग आकर हम भी उनके जुल्म के बेदाद से,
चल दिए सूए-अदम ज़िंदाने फैज़ाबाद से।
जबकि गैरों से उन्हें इक दम की भी फुरसत नहीं,
फिर वह क्यों मिलने लगे अब हसरते-नाशाद से।
• बाइसे नाज़ जो थे अब वह फसाने न रहे,
जिन तरानों में मज़ा था वह तराने न रहे।
घर छूटा बार छूटा अहले वतन छूट गए,
माँ छूटी, बाप छूटा भाई बहन छूट गए।
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -89
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त पृष्ठ -201
- काकोरी शहीद स्मृति, सम्पादक-भगवानदास माहौर, पृष्ठ -230
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• अपना यह अहद सदा से था कि मर जायेंगे,
नाम माता तेरे उश्शाक में कर जायेंगे।¹
• कौन वाकिफ था कि यूँ सर पे बला आएगी,
बैठे बिठलाए हुकूमत यह गज़ब ढायेगी।
• फना है सबके के लिए हम पे कुछ नहीं मौकूफ,
बका है एक फकत जाते किब्रिया के लिए।
• तनहाई गुरबत से मायूस न हो 'हसरत',
कब तक न खबर लेंगे याराने-वतन तेरी।²
(12) अशफाक की एक हिन्दी कविता
• हे मातृभूमि तेरी सेवा किया करूँगा।
फाँसी मिले मुझे या हो जन्म कैद मेरी,
बेड़ी बजा-बजाकर तेरा भजन करूँगा।³
(13) अकीदत के फूल
• जुबाने हाल से अशफाक की तुरबत ये कहती है।
मुहब्बाने वतन ने क्यों हमें दिल से भुलाया है।।
बहुत अफसोस होता है बहुत तकलीफ होती है।
शहीद अशफाक की तुरबत है और धूमों का साया है।।⁴
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -90
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 90
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 91
- काकोरी शहीद स्मृति - सम्पादक- भगवानदास माहौर, पृष्ठ -231
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अशफाक उल्ला खाँ अपने नाम के आगे वारसी लगाते थे और
'हसरत' उपनाम से कविताएँ लिखा करते थे। उनकी काव्य रचना पर एक
दृष्टि देने पर ज्ञात होता है कि वे उच्च कोटि के शायर थे, शायरी पर
उनका अधिकार था। उन्होंने अच्छी गज़लें कहीं हैं, वही कत्आत, नज़्मों
में भी कम नहीं दिखते। कविता में उनकी आंतरिक वेदना, संवेदना,
भावना का पता चलता है। कुछ रचनाएँ तो दार्शनिक भाव से कही गयी
है तो कुछ आत्मलाप की मुद्रा में। उनकी रचनाओं से स्पष्ट है कि वे
सिर्फ क्रांतिकारी ही नही थे, भावुक हृदय कवि भी थे। कहीं वे सरकारी
वकील पर व्यंग्य करते हैं तो कही बसंत के आगमन की मस्ती। इस्लाम
में उनका विश्वास था लेकिन वे सभी धर्मों का आदर करते थे। यह
उनके व्यक्तित्व की खास पहचान थी। कुल मिलाकर सम्पूर्ण व्यक्तित्व
रेखांकित करने योग्य, प्रेरणा के योग्य और युवाओं के आदर्श।
अशफाक की कुछ अन्य कविताएं भी (गज़लें) रेखांकित करना
आवश्यक है, जो उनके व्यक्तित्व को (काव्य प्रतिभा) निखारता है :-
‘‘पहिनाने वाले अगर बेड़िया पहनाएँगे।
खुशी से कैद के गोशे को हम बसाएँगे।।
जो सन्तरी वीर जिन्दा के सो भी जाएँगे।
वह राग गा के उन्हें नींद से जगाएँगे।
तलब फजूल है काँटे को फूल के बदले।
न ले बहिश्त भी हस होमरूल के बदले।।
सन्तरी देख कर इस जोश को शरमाएँगे।
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राग जंजीर की झन्कार में हम गायेंगे।।¹
‘ ‘सितमगर अब यह आलम है तेरे बीमारे फुरकत का।
लबों पर दम है दिल में बलबला शौके शहादत का।।
मेरी दीवानगी पर चारागर हैरां न हो इतना।
यही अंन्जाम होना चाहिए नाकाम उलफत का।।
बुताने संग दिल सुनते नहीं फरियाद बेकस की।
निराला ढंग है उन खुदपरस्तों की हुकूमत का।।
मिटाकर जानो दिल अपना किसी जालिम जफाजू पर।
तमाशा अपनी आँखों देखता हूँ अपनी किस्मत का।।
हविस हूरों की हो जिसमें दिलाये याद गिल्मां को।
जनाबे शेख़ मैं कायल नहीं ऐसी रियाज़त का।।
बर आएँ हसरतें हासिल स्कूने कल्ब मुज़तर हो।
कहाँ ऐसा मुकद्दर हाय मुझ बरमश्ता किस्मत का।।
मज़ा जब है कि वह कह उठें ‘अशफाक’ उनका क्या कहना।
गज़ल है या मुरक्का है तेरे वक्ते मुसीबत का।।’’²
अशफाक की काव्य रचनाएँ आजादी के उद्गार हैं। यही नही वे देश
प्रेमी होने का दावा भी करते हैं। अपनी मिट्टी से प्यार की बुलन्दी छूने
वाले अशफाक ऐसे वियोगी जान पड़ते है जिसमें उनका देश प्रेम छूट रहा
है या यूँ कह ले कि वे कुछ और करना चाहते थे। अशफाक की कविताएँ
सदैव प्रेरणा देती रहेंगी और इतिहास की थाती साबित होगी।
- रामप्रसाद बिस्मिल, रचनावली, सम्पादक-दिनेश शर्मा, पृष्ठ -188
- राम प्रसाद बिस्मिल रचनावली, सम्पादक-दिनेश शर्मा, पृष्ठ -188
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अशफ़ाक़ की सम्पूर्ण शायरी (ग़ज़लें, नज्में) एवं अमर बलिदान उपसंहार
अध्याय-दस