अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहमारी तरह से है और भी कई दिलगीर,
फिराये देखिये हमको कहाँ-कहाँ तकदीर।
असीरे गर्दिशे लैलो निहार हो के चले।।
• तिरे ही वास्ते आलम में हो गये बदनाम,
तिरे सिवा नहीं रखते किसी से हम कुछ काम,
तिरे ही नाम को जपते हैं हम तो सुबहो शाम,
वतन न दे हमें तर्के-वफा का तू इलजाम।
कि आबरू पे तेरी हम निसार हो के चले।।¹
(5)
• वह असीरे-दामे-बला हूँ मैं जिसे साँस तक भी न आ सके।
वही कतीले-खंजरे-जुल्म हूँ जो न आँख अपनी फिरा सके।।
• मिरा हिन्दूकुश हुआ हिंदूकुश ये हिमालिया है दिवालिया।
मेरी गंगा-जमुना उतर गई है बस इतनी है कि नहा सके।।
• मिरे बच्चे भीख है माँगते, उन्हें टुकड़ा रोटी का कौन दे।
जहाँ गावे कहें परे-परे, कोई पास तक न बिठा सके।।
• मिरे कोहेनूर को क्या हुआ, उसे टुकड़े-टुकड़े ही कर दिया।
उसे खाक में ही मिला दिया, नहीं ऐसा कोई कि ला सके।।²
(6)
• नही अपनी हालत है बताने के काबिल।
नही माज़रा ये सुनाने के काबिल।।
- काकोरी शहीद स्मृति, सम्पादक-भगवानदास माहौर, पृष्ठ -230
- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विघार्थी, पृष्ठ -85
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