अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
DevanagariHindipublished297 पृष्ठ
पृष्ठ 217, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 217• वतन हमेशा रहे शादकाय और आज़ाद,
• वतन हमेशा रहे शादकाय और आज़ाद,
हमारा क्या है अगर हम रहे रहे न रहें।¹
• वह जुर्मे-आरजू पै जिस कदर-चाहें सज़ा दे लें,
मुझे खुद ख्वाहिशे-ताजीर है मुलजिम हूँ इकरारी।²
• बुज़दिलों को ही सदा मौत से डरते देखा,
गो कि सौ बार उन्हें रोज़ ही मरते देखा।
वीर को मौत से हमने नहीं डरते देखा,
तख्तये मौत पे भी खेल ही करते देखा।
• मौत इक रोज जब आनी है तो डरना क्या है,
हम सदा खेल ही समझा किये मरना क्या है।³
• तंग आकर हम भी उनके जुल्म के बेदाद से,
चल दिए सूए-अदम ज़िंदाने फैज़ाबाद से।
जबकि गैरों से उन्हें इक दम की भी फुरसत नहीं,
फिर वह क्यों मिलने लगे अब हसरते-नाशाद से।
• बाइसे नाज़ जो थे अब वह फसाने न रहे,
जिन तरानों में मज़ा था वह तराने न रहे।
घर छूटा बार छूटा अहले वतन छूट गए,
माँ छूटी, बाप छूटा भाई बहन छूट गए।
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -89
- भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त पृष्ठ -201
- काकोरी शहीद स्मृति, सम्पादक-भगवानदास माहौर, पृष्ठ -230
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