अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
DevanagariHindipublished297 पृष्ठ
पृष्ठ 213, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 213जुबाँ तक नहीं हम हिलाने के काबिल।
जुबाँ तक नहीं हम हिलाने के काबिल।
• बुजुर्गों का किस मुंह से हम राग गाएँ।
जब इकगुन भी उसका न अपने में पाएँ।
किसी को नहीं मुँह दिखाने के काबिल।।
• चमन में खिज़ा अपने इठला रही है,
कपायत गुलों-गुंचों पर आ रही है।
जमी चर्ख़ बनकर सितम ढा रही है,
सुनो रो के बुलबुल ये क्या गा रही है।
• कभी खार था इसका बागे-अदन को,
नजर हाय किसकी लगी इस चमन को।।
• कभी यों न उजड़ा था मसकन किसी का,
न यों जल गया होगा खिरगन किसी का।
हरदयाल आता है यूरोप से न पाल आता है,
दिल में रह-रह के बस इतना ख़याल आता है।
भरने जाते हैं कहीं उम्र के पैमाने को,
हिन्द को छोड़ते हैं रंजोअलम खाने को¹
(7)
• उरूजे-कामयाबी पर कभी हिंदोस्ताँ होगा,
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियाँ होगा।
• जुदा मत हो मिरे पहलू से ए दर्दे-वतन हरगिज़,
न जाने वादे मुरदन मैं कहाँ, और तू कहाँ होगा।
- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विघार्थी, पृष्ठ -86
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