अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें• वह गुलशन जो कभी आजाद था गुज़रे जमाने में,
मैं शाखे खुश्क हूँ हाँ हाँ उसी उजड़े गुलिस्ताँ की।
• नहीं तुमसे शिकायत हम सफीराने चमन मुझको,
मेरी तकदीर ही में था कफस और कैद जिंदाँ की।
• करो जब्ते मुहब्बत गर तुम्हें दावाएं उलफत है,
खामोशी साफ बतलाती है ये तस्वीरे-जानाँ की।
• यू ही लिक्खा था किस्मत में चमन पैराये-आलम ने,
कि फसले-गुल में गुलशन छूटकर है कैद जिन्दाँ की।
• जमीं दुश्मन जयाँ दुश्मन जो अपने थे पराये हैं,
सुनोगे दास्ताँ क्या तुम मेरे हाले-परीशाँ की।
• ये झगड़े और बखेड़े मेटकर आपस में मिल जाओ,
थे तफरीके अगस है, तुम में हिन्दू और मुसलमा की।
• सभी सामाने-इशरत थे मजे से अपनी कटती थी,
वतन के इश्क ने मुझको हवा खिलवाई जिंदाँ की।
• खुदा वाकिफ है जैसी भी गुज़रती है गुज़रती है,
सुनोगे दास्ताँ क्या यार तुम बीमारे-हिजराँ की।
• मिसाले-कैस दीवाना किसी लैला की खातिर में,
महीनों ठोकरें खाया किया को हो बियाबाँ की।
• बहमदल्ला चमक उठ्ठा सितारा मेरी किस्मत का,
कि तकलीदे-हकीकी की अता शाहे-शहीदाँ की।
• इधर खौफे-खिजाँ है आशियाँ का डर उधर दिल को,
हमें यकसाँ है तफ़रीहे-चमन कैद और जिंदा की।
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