अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमुस्कराते हुए चेहरे और मुतमइन दिल के साथ कबूल करो कि फलाहे
दीनी व दुनयवी हासिल कर सका। मैं कोशिश करूँगा कि यह खत
तुमको मेरी मौत से पहले ही मिल जाए ताकि तुम्हारे दुख में कमी हो
जाए और तुम सोच सको कि मरने वाला क्या बात है कि मरते हुए भी
मुतमइन व खुश है-'फना है सबके लिए हमपे कुछ नहीं मौकूफ, बका है
एक फ़क़त जाते किब्रिया के लिए'। आदम अलेहिस्सलाम से लेकर इस
वक्त तक कौन ऐसा है जो मरा न हो? जिसने बिसाते-आलम पर जिन्दगी
के मोहरे बसाए और मौत के हाथों के सामने जरूर मात खाई, यस
उसका गम बेकार है और आने वाली जरूर आने वाली बात के लिए
परेशान होना सरासर गलती है। अब रहा मुहब्बत, डाह, मोह, प्रेम-ये सब
दुनियाबी धंधे हैं। खुदा से मुहब्बत करो। उसको पूजो जो हमेशा जिन्दा व
कायम रहेगा। तुम्हें अपनी बकीया जिन्दगी में कभी तो उसके लिए रोना
नहीं पड़ेगा। बस उसी से मुहब्बत करो और उसी को समझो। अक्ली
दलाइल, महजब़ी मसाइल, फलसफियाना बहस दुखे हुए दिल पर
नमक-मिर्च का काम करते हैं। मैं खूब जानता हूँ कि आप सोंचेगी कि
मैंने अपनी करतूतों से आपका बुढ़ापा खराब किया और भाइयों और
दीगर आइज्जा की जिन्दगी दुख की जिन्दगी बना दी। मैंने क्या किया।
मैंने कुछ नहीं किया। उसका हुक्म रोजेअजल से ऐसा ही था, सो होकर
रहा। जो बात होने वाली होती है असबाब उसमें पेशतर से होना शुरू
होते हैं और असबाब जब पायए तकमील को पहुँच जाते हैं, बात पूरी हो
जाती है। यस मेरे लिए यह मौत और यह दिन था। सो मुझे मिला।
और तुम्हारे लिए दुख, बुढ़ापे का धक्का और सीना सोबी लिखी थी वह
तुम्हें मिल रही है। जो इसके लिए उसने मुनासिब समझा वह उसे
तकसीम कर दिया। यस कौन है जो शिकवा करे और लब शिकायत के
वास्ते खोले ....................
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