अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
DevanagariHindipublished297 पृष्ठ
पृष्ठ 215, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 215
(9)
• नहीं गरचे अब वे हरारत दिलों में,
वही खून बाकी है लेकिन रंगों में।
जुनूँ गरचे बाकी नहीं अब सरों में,
मगर अलोगिल है वही हड्डियों में।
• लटे भी तो हाथी लटेगा कहाँ तक,
समंदर घटे से घटेगा कहाँ तक।
• नही गरचे रौनक वो अपने चमन में,
न वो रंग-बू है गुले-यासमन में।
है मुद्दत से गो अपना सूरज गहन में,
मगर खूँ तो है वो ही अपने बदन में।
• वह स्थान गंगोतरी का पवित्तर,
पिथौरा की लाट और उदयपुर के पत्थर।
हिमालय की वे चोटियाँ सर उठाकर-
इक आवाज़ से कह रही है बराबर -
कि, जब तक हैं हम इनको मरने न देंगे।
फना का इन्हें जाम भरने न देंगे।।¹
(10)
• ख्याल आता है जिस दम दिल में चुभता है सिनाँ होकर,
रहे क्यों कब्ज़ा-ए-अग़ियार में हिन्दोस्ताँ होकर।
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 87-88
187