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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

है रजा उसकी तो हम बहरहाल यह फर्ज
शुक्रे हमलब पर रहे शिकवये आदान करें।
मान ले फैसला ये दोस्त को बेचूनों चरा,
फिकरे इमरोज ही रखें गमे फरदा न करें।
बस जाने खुदाबन्दी के सामने सरेनियाज खम कर दें और अपने
को उसकी मर्जी पर छोड़ दें। रोजे जजा का वह मालिक है। इसका भी
गम ना करें क्योंकि गुलाम हैं जनाबें रसुलेकरीम सलल्ला हो अलैहे
वसल्लम के। ये मातम बुनिन्दागाने अशफाक! सब्र करो और दुआ करो
कि वहाँ की मुसीबत आसान हो।....मेरी जिन्दगी इतनी ही थी। ना वह
घट सकती है ना बढ़ सकती है। ना तुम्हारा नाल ओबुका ही काम आ
सकता है। ना आहबाजरी ही जिन्दगी का एक लम्हा बढ़ा सकती है। हाँ
तुम्हारी दुआएँ वहाँ मेरे काम आ सकती हैं। बस सब्र करो और दुआ से
याद करो। मैं नहीं जानता कि मेरी लाश भी तुम लोगों को दी जाएगी
या न दी जायेगी। यूँ तो सब जान निकल गयी है फिर मिट्टी ढेर है।
मगर फिर भी मुझे तसफीश है। खैर मुर्दा बदस्त जिन्दा का मजमून है।
जबरदस्ती जो चाहे करे। उसका हरफेल दुरस्त है। खैर मैं अपने दिमाग
को इस ख्याल से परेशान करना नहीं चाहता। जो भी हो इसमें कोई शक
नहीं कि मैं तख्तये मौत पर खड़ा हुआ यह खत लिख रहा हूँ, मगर मैं
मुतमइन व खुश हूँ कि मालिक की मर्जी इसी में है बड़ा खुश किस्मत है
वह इंसान जो कुर्बाने वतन पर कुर्बान हो जाये। गो कि यह फिकरा मैं
जिस स्प्रिट के साथ लिख रहा हूँ वह आप लोगों में नहीं है। यूं आपको
तकलीफ महसूस होगी। मेरी गजलियात मकान पर मौजूद होंगी। वह
आज से बहुत पहले की लिखी हुई हैं। उनको पेशीनगोई समझिएगा और
वैसा ही होना था जो कलम से निकला।
167

मेरे शुकून की वजह मेरी बेगुनाही है और यकीन रखिये कि
अशफाक का दामन इन्सानी खून के धब्बों से पाक व साफ है।
मेरे घर में आने वाले बच्चों और मौजूदा छोटो। तुम सब दुनिया में
आओगे मेरी कहानी सुनते पाओगे और तहरीर देखोगे। मेरे इस तहरीर
में मेरे दिमाग का असर ना समझना मैं बिलकुल सही दिमाग का हूँ और
मेरी अकल ठीक काम कर रही है। मेरा मकसद महज आने वाले बच्चों
के लिए लिखना यूँ है कि वह अपने फरजाइज महसूस करें और मेरी याद
ताजा रखें। प्यारे रजी व खलील-तुम्हारा चाचा चन्द रोज बाद इस दुनिया
में नहीं रहेगा और हमेशा-हमेशा के वास्ते तुम सबों को छोड़ जायेगा।
तुमसे वह कुछ नहीं चाहता और ना ही कहना चाहता है। तुम्हारा खुदा
मददगार रहे। तुम्हें परवान चढ़ाये। आला-तालीम अता फरमाये और तुम्हें
किसी काबिल बनाये। काबिले फखरे खानदान करे।
..............
..............
तुमको बुजुर्गों की राय पर चलना चाहिए और तामील में तन-मन
धन लगा देना चाहिए और बेहतरीन इन्सान अपने को साबित करना।
मेरी तुमसे बस इतनी ख्वाहिश है और मौत का ख्याल रखना। वतन की
मुहब्बत का मुझ पर इलजाम लगाया गया है और यूँ ही मुझे सजाए मौत
मिली। जब तुम इस काबिल होगे तब मेरे मुकदमें की कुल कार्यवाही
पढ़ना। ज्यादा क्या लिखूँ। मेरी दुआएँ तुम्हारे साथ हैं।¹
अशफाक उल्ला खाँ
8 अक्टूबर 1927

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ 144-147
    168

अशफाक पत्रों में आने वाले संतानों का जिक्र करते हैं और उत्साह भरते
है, नेक सलाह तो देते ही हैं, देश प्रेम की प्रेरणा भी देते है। उन्हें यह
पता है कि आने वाली पीढ़ियाँ उनकी कुर्बानी से ऊर्जा पायेगीऔर देश के
लिए कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरित होंगी। अशफाक को बच्चों से प्रेम
था, वे उपदेश देते हैं। उन्हें उम्मीद है कि हमारे बच्चे मेरे मुकदमें की
कार्यवाही पढ़ेंगे तो असलियत का अन्दाजा लगा लेगें।
<u>फैसले के एक दिन पूर्व माँ को लिखा गया पत्र -</u>
जनाबा वालिदा साहिबा,
बखैरियत हूँ और जनाबा की खैरियत का ख्वाहा हूँ। कल फैसला
सुनाया जायेगा। खुदा मुझको हिम्मत दे। ताकत इत्मीनान दे। सुकूने
कल्व अता फरमाए। आप सबको सब्र दे। बीवी दुनिया सराय-फानी है।
कौन रहा है और कौन रह जायेगा। अज आदम-ताईदम मौत व जीस्त
का सिलसिला चला आ रहा है और चला जायेगा। कहाँ तक गम कहाँ
तक रंज किया जाय। मुझे अपनी सजा का कोई गम नहीं, कोई रंज
नही। सजाए कैद या कोई भी हो मेरा ईमान है कि सब मिन जानिब
अल्लाह होगी। फिर 'सरे तसलीम खम है जो मिज़ाजे यार में आए'।
मगर जो दुख है वह तुम्हारी जईफी का है। तकलीफ है वह तुम्हारी
कमजोरी और काबिले-रहम हालत पर। खुदा वाकिफ है कि इस इतवार
की मुलाकात के बाद किसी घड़ी किसी पल तुम्हारा कमजोर चेहरा और
नाउम्मीदी से भरे हुए अल्फाज फरामोश नहीं कर सका। खैर, जो मर्जी
मौला। मेरी गुजारिश और आखिरी गुजारिश यह है कि अगर खुदा ने
जिन्दा मुझको बाहर निकाला, तो आपकी जईफी देखकर जिसकी मुझको
उम्मीद तो है नहीं, वैसे दुआ है कि खुदा आपको उम्रेनूह अता फरमाएं।
आप अपनी तस्वीर हिंगू से खिंचवा लीजिएगा। आप कुछ फिक्र न करें।
वह आपका दामाद है और सामने आता है यानि साफिया का खाविंद।
कम-अज-कम बाहर आकर आपकी तस्वीर से कुछ तसल्ली होगी। आप
बखूबी वाकिफ है कि आपको बिना देखें हुए मैं दो रोज भी नहीं रह
169

सकता। मगर यह मसला मजबूरी और इज्जत व जिल्लत का था।
लिहाजा उन लोगों के कहने पर नहीं चला। क्योंकि जिन्दगी जैसी जलील
चीज के लिए दुनिया की नजरों में और अपनी नजरों में गिरकर रहने से
मौत बेहतर व अफजल है। काश कि खुदा एक मौका और अता करता कि
आपकी खिदमत करूँ और कदमों से जुदा न हूँ। मैं निहायत बदकिस्मत
हूँ कि आपकी खिदमत करने का जब मेरा वक्त आया तो आपके कदमों
से दूर हूँ। खैर खुदा की मर्जी यही थी। आप भी सब्र कीजिए और मेरे
लिए दुआ कीजिए। आपको जईफी में जो मुझसे दुख पहुँचा, आप खुदारा
मुझे माफ फरमाइएगा। तब दिल को तस्कीन होगी। ज्यादा क्या लिखूँ।
हाँ एक बात और वह है कि मेरे फैसले के बाद लोगों को ढोंग न फैलाने
देना, जो बिहीख्वाह और दोस्त थे, सब मालूम हो गये। आपके खानदान
वालों को भी देख लिया। मेरा खानदान मेरे हकीकी भाई, मेरी भावज,
बहन व बहनोई हैं और मुल्क के हिन्दू और मुसलमान मेरे भाई व बुजुर्ग
हैं और किसी बदमाश से वास्ता नहीं। जो मुसीबत में शरीक था, वह
बहादुर और दोस्त है। बाकी सब कमीने हैं, जो आरामो-आसाइश के
साथी और दुख दर्द पर अलग। मैं कसम खाकर कहता हूँ कि मैं उन
सबसे नाराज हूँ। अगर बाहर निकलने का मौका मिल गया तो उनसे
कितात आल्लुक करके जानवरों से दोस्ती कर लूँगाँ। साँपों से प्यार
करूँगा। भेड़ियों के गिरोह में बैठा रहूँगा, मगर इन अजीजों से अलग
रहूँगा। फीअमानिल्लाह। अपना फोटो जरूर खिंचवाइएगा और जिन्दा
बाहर निकला तो मेरे लिए वही काफी होगा।

170

अगर वक्त बराबर आ गया है तो खैर खुदा के सुपुर्द किया।¹
आपका खादिम
अशफाक वारसी
अशफाक के पत्र संवेदना के स्तर पर काफी महत्वपूर्ण हैं। उनके पत्रों
में विचार और उपदेश के साथ-साथ एक समग्र भारतीय युवा का स्वर भी
निहित है। दिनाँक 15 दिसम्बर 1927 को फाँसी घर से माँ के नाम उन्होंने
अन्तिम पत्र लिखा है। पत्र से स्पष्ट है कि वे दर्द और दुख से बोझिल थे,
लेकिन यह दर्द मौत का डर नहीं है। अशफाक बहुत कुछ कहना चाहते थे
लेकिन तमाम अवरोधों और विवशताओं के चलते वे अपनी सारी बातें
नहीं लिख सके, फिर भी उनका यह माँ को लिखा अंतिम पत्र खासा
महत्वपूर्ण है जो उनकी आन्तरिक वेदना और व्यक्तित्व को समझने में
सहायक सिद्ध हुआ है। यह पत्र कुछ लम्बा अवश्य है लेकिन आवश्यक
है। पत्र निम्नलिखित है -
अज जिंदाने फैजाबाद,
फाँसी की कोठरी
15 दिसम्बर 1927
दुखिया और बूढ़ी माँ की खिदमत में उनके मरते हुए फरजंद का
सलाम पहुँचे, जो इसी हफ्ते में इस फानी दुनिया को अलविदा कहकर उस
मुल्क जावेंदा को जा बसाएगा, जहाँ कि उससे पहले भी सब जा चुके हैं
और हाजी रूह उसके बाद भी जायेगा -
फना है सबके लिए हमपे कुछ नहीं मैकूफ,
बफा है एक फकत जाने किब्रिया के लिए।

  1. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग - पृष्ठ 135-137
    171

आप भी बखूबी वाकिफ है और तालीमयाफ्ता है मगर यह जरूर है
बूढ़ी सिनासीदा दुखिया माँ के लिए यह सदमा जरूर बड़ा है कि उसका
जवान बेटा नामुराद दुनिया से उठ जाए और वह उसकी लाश पर दो
आँसू भी न डाल सके या उसकी मरी हुई सूरत देख सके। मगर यह तो
बताओ यह हुक्म किसका है? क्या दुनिया के किसी इनसान का हुक्म है?
क्या मुझे उसके हुक्म के बिला मार सकता है? उसने रोजेअज़ल से ऐसा
ही लिखा था कि अशफाक तुझको फाँसी पर मरना है और जब तू मरेगा
तो कोई तेरे पास तेरे आइञ्ज़ा व अकरूबा व अहबाब में से न होगा। पर
हुक्म खुदाबंदी पूरा होकर रहेगा और ऐसा ही होता चला आया है। मैं यह
लिख देना चाहता हूँ कि मैं ब इतमीनान और पुरसुकून मौत मर रहा हूँ।
हुक्म खुदा ऐसा ही था और वह अटल है, होकर रहेगा। मौत सबके लिए
है और सब मरेंगे। दुनियावी तकलीफ, माद्दी बंदिशें, इनसानी क्यूदात
सब पीर के रोज तक खत्म हो जायेगी और मेरी रूह इस कफ से अंसरी
से आजाद हो जायेगी। तब दूसरी मंजिल सामने है, देखिये वहाँ कैसी
गुजरे। यह उनकी बख्शीश व करम पर मुनहसिर है। सफर दरपेश है,
जादेराह पास नहीं। बस उसी की उम्मीदे करम पर खुश-खुश मर रहा हूँ।
मैं तो आपको अलविदा कहता हुआ आप सबको और खसूसन आपको
बकीया जिन्दगी में वक्फे-नौहा व बुका करके उस तरफ जा रहा हूँ जहाँ से
आया था और फिर वापस जाने का वायदा था। वायदा पूरा करना है।
आप सबके सामने राहे अमल क्या है? मैंने तो बुरा किया या अच्छा। मैं
इकरार करता हूँ कि मेरी जिन्दगी की इतनी बरसें गुमराही, मासियत,
सियाकारी और गुनाहों में गुजरी उसके लिए मेरे दोस्त, मेरे अजीज मेरे
भाई और मुख्तसिर यह कि हर हमदर्द मुसलमान दुआए मगफिरत करे
और आप सब लोग सब्र कीजिए। सब्र तल्खअस्त व लेकिन बरे शीरी
दारद- मुझे डर है कि आप घबरा न उठें और यह न कह बैठे कि जिसकी
जवान औलाद मर जाए वह कैसे सब्र करे तो सुनिए, मेरी प्यारी माँ।
खुदा ने मुझको आपके शिकम से पैदा किया था। मेरी पैदाइश पर
172

खुशियाँ मनाई गयी थी। शुक्राने अदा किये गये थे और किस्सा मुख्तसर
यह कि मुझको आँखों का नूर और दिल का सुरूर समझा जाता था।
आपने इस सिले में खुदा को क्या दिया कि उसने आपको एक इनसान
की शक्ल में औलाद दी। आपसे जो भी पूछता था आप यहीं कहती थीं
कि खुदा का बंदा है, खुदा ने दिया है। उसी की अमानत है और मैं
अमानतदार हूँ। बस अब मालिक अपने गुलाम को तलब करता है।
अमानत रखने वाला अपनी अमानत तलब करता है। आप खयानात न
करे, न आपकी चीज थी न आपसे छीनी गई। इतने दिन के वास्ते
आपको दी गई थी कि रखो, बाद को हम वापस ले लेंगे। अब वापस
लिया जा रहा है फिर आपको क्या हक है कि रद्दोकद करें। क्या आपने
हमेशा से यह सोचा था कि मुझे मौत कभी न आएगी। अरे, तुम भी
जानती थी और मुझे भी मालूम था कि हम तुम सब मरेंगे, कोई आगे
कोई पीछे। या तो मुझको रोना पड़ता तुम्हारे लिये या तुम्हें मेरे लिए।
उसका मंशा यह था कि बूढ़ी माँ जवान औलाद को रोयेगी और बाकीया
तीन भाई अपने छोटे भाई का मातम करेंगे। तो क्या कोई, आज इस
दुनिया में इतनी ताकतवाला है कि खुदाबंद के अहकाम पलट दे? कोई
नहीं। अपने खानदान ही में कितनी ऐसी माँएँ हैं जो बुढ़ापे में जवान
औलाद का दाग खोए बैठी हैं और कितने ऐसे भाई हैं जो अपनी आँखें
अपने भाई के लिए सुर्ख कर चुके है और कितनी ही बहनें, भावजें,
भतीजियाँ, भतीजे, भानजियाँ, भानजे हैं जो कि भाई, देवर, चाचा, मामू
के लिए सीनाकोबी कर चुके हैं। दुनिया का यही धंधा है। दुनिया नाम
ही उसका है। अगर मरना न होता तो जिन्दगी का फायदा ही क्या था।
अगर रात न हो तो दिन में लज्जत ही क्या। अगर गम न हो तो
शादी-ब-मंजिले ग़म है। गरज कि दुनिया एक माज़ने मुरक्कब है। जिसमें
सब जाइके हैं। ऐशो मसर्रत, गमों अंदोह, आराम व तकलीफ, गफलत व
बेघणी, नेकी व बदी, मौत व जीस्त, गरज कि हर चीज यहाँ मिलेगी।

173

पास खुशकिस्मत वह है जिसने अच्छी बातें कुबूल की और बुराइयों
से परहेज किया। गलफत पर होशियारी की तरजीह दी और माबूदे हकीकी
की याद में लगा और होशियार रहा अपने फराइज़ की अदायगी में। नेकी
को कबूल किया और बदी को ठुकराया। अबदी आराम की खातिर
तकलीफ बरदाश्त की और इबादत में मसरूफ़ रहा, मौत को पेशेनजर रखा
और जीस्त ही में सामाने आसरत जमा कर लिया।
ऐश व इशरत में पड़कर गफलत नहीं की और पेश आने वाले गम
व अंदोह का खटका महसूस करता रहा। जिसने इन बातों को अख्तियार
किया और हर मुसीबत व तकलीफ व आराम व राहत को मिनजानिब
अल्लाह तस्सवर किया और उसकी निआमतों का शुक्रिया अदा किया।
इसाइब व तकलीफ पर सब्र किया और कहा कि यह सब मिन जानिब
अल्लाह हैं।
दोस्त का दिया हुआ जहरेहलाल भी शहद मसफ्फा ख्याल किया
और सब्र किया, शुक्र किया यस राजी का लिया उसे जो कौनैन का
मालिक और मशरिक व मगरिब का रब है। क्या तुम इसके ख्वाहिशमंद
नहीं हो कि खुदा तुम्हारा पैदा करने वाला है और जिसके सामने तुम्हें
जाना है, तुम्हें अपना दोस्त कहकर पुकारे। अरे दुनिया उसकी मुतयन्नी
है और वह हमको अपना दोस्त कहे। आज मौत के सामने बैठा हुआ
अशफाक कुछ ख्वाहिश नहीं रखता, मगर हाँ यह कह दे कि अशफाक मैं
तुमसे राजी हूँ और तू मेरा बंदा है मैंने बंदानी में कबूल किया। वह
कहता है कि ऐ ईमान वालो! बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है।
दूसरी जगह फरमाता है यानी खुशखबरी सुना दो उन सब्र करने वालों
को कि जब कोई उनको मुसीबत पहुँचती है तो कहते हैं कि बेशक हम
अल्लाह ही के हैं और बेशक हम उसकी तरफ लौटने वाले हैं। फिर
फरमाता है यानी यही हैं जिसपर बरकत है उनके रब की तरफ से और
रहमत है। यही लोग हिदायतवाले हैं। यह कौल आपको जनाबे बारी के
लिख दिए। अब समझना न समझना आपका काम है।
174

आपका सब्र व शुक्र आपको उसके दरबार में मकबूल व मुकर्रब
करेगा और अगर खुदानाख्वास्तां आप हद से आगे बढ़ गईं तो आप खुद
समझदार और पढ़ी-लिखी हैं। आपका नाल ओशेवन, आहवजारी,
सीनाकाबी, मुझको जिन्दा नहीं कर सकती, न मौत से बचा सकती है।
हाँ सब्र करना, कलमा व दरूद पढ़ना और बख्शना मेरे लिए कुछ सूदमंद
साबित हो जाए।
यस मेरी अच्छी माँ मेरी खताएँ माफ फरमाकर मशगूले-खुदा हो
जाओ। उसकी मर्जी यही थी और कौन है जो उसके हुक्म को टाल सके।
मुझसे आपको दुख पहुँचा। आपका बुढ़ापा बरबाद हो गया। आपकी
जिन्दगी जीक में पड़ गई। मैंने की। हाँ जाहिर असबाब में से एक मैं भी
हूँ। मगर मौला की मर्जी और उसका हुक्म पोशीरा रहता है। समझदार
मिनजानिब अल्लाह हर बात को समझते है और ना समझ इन्साफों की
तरफ ख्याल दौड़ाते हैं। इससे कब्ल एक कार्ड फैसले के मुतमाल्लिक
मिला होगा। कैसे मजे की बात है कि मैं अपने कलम से अपनी मौत
की खबर आपको पहुँचा रहा हूँ। मैंने एक किताब लिखना शुरू की थी
और वह तकमील को न पहुँच सकी। खैर मालिक की मरजी ही न थी
जिसमें मेरा मकसद बच्चों के लिए नसीहत करना था। खैर उनके लिए
जो मैदाने अमल है और जो सामने आए उस पर गामजन न हो। मुझे
जो लिखना है थोड़ा-थोड़ा सब लिख दूँगा क्योंकि अब वक्त मेरे पास
मजमून तिगारी व कलम फरसाई का नहीं हैं मुख्तसर-मुख्तसर सब को
लिख दूंगा। सब अपना-अपना मतलब निकाल लें। मुझे तो सबसे जरूरी
आप को लिखना था और यूँ तो ये मजमून वाहित तस्सवुर किया जाए।
सभी से सब्र की गुजारिश है और सब्र ही खुशी की कुंजी है। मुझे
बूबू की भी परेशानियों का इल्म है और आप सबकी कोफ्त में ऐसे वक्त
में इजाफा नए गम का है। मगर क्या मौला की मर्जी टाली जा सकती
है? नहीं हरगिज नहीं। वह हर सूरत से आजमाइश कर रहा है। तुम सब्र
को हाथ में न जाने दो। जो दोस्त की तरफ की खुशी व गम मिले
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मुस्कराते हुए चेहरे और मुतमइन दिल के साथ कबूल करो कि फलाहे
दीनी व दुनयवी हासिल कर सका। मैं कोशिश करूँगा कि यह खत
तुमको मेरी मौत से पहले ही मिल जाए ताकि तुम्हारे दुख में कमी हो
जाए और तुम सोच सको कि मरने वाला क्या बात है कि मरते हुए भी
मुतमइन व खुश है-'फना है सबके लिए हमपे कुछ नहीं मौकूफ, बका है
एक फ़क़त जाते किब्रिया के लिए'। आदम अलेहिस्सलाम से लेकर इस
वक्त तक कौन ऐसा है जो मरा न हो? जिसने बिसाते-आलम पर जिन्दगी
के मोहरे बसाए और मौत के हाथों के सामने जरूर मात खाई, यस
उसका गम बेकार है और आने वाली जरूर आने वाली बात के लिए
परेशान होना सरासर गलती है। अब रहा मुहब्बत, डाह, मोह, प्रेम-ये सब
दुनियाबी धंधे हैं। खुदा से मुहब्बत करो। उसको पूजो जो हमेशा जिन्दा व
कायम रहेगा। तुम्हें अपनी बकीया जिन्दगी में कभी तो उसके लिए रोना
नहीं पड़ेगा। बस उसी से मुहब्बत करो और उसी को समझो। अक्ली
दलाइल, महजब़ी मसाइल, फलसफियाना बहस दुखे हुए दिल पर
नमक-मिर्च का काम करते हैं। मैं खूब जानता हूँ कि आप सोंचेगी कि
मैंने अपनी करतूतों से आपका बुढ़ापा खराब किया और भाइयों और
दीगर आइज्जा की जिन्दगी दुख की जिन्दगी बना दी। मैंने क्या किया।
मैंने कुछ नहीं किया। उसका हुक्म रोजेअजल से ऐसा ही था, सो होकर
रहा। जो बात होने वाली होती है असबाब उसमें पेशतर से होना शुरू
होते हैं और असबाब जब पायए तकमील को पहुँच जाते हैं, बात पूरी हो
जाती है। यस मेरे लिए यह मौत और यह दिन था। सो मुझे मिला।
और तुम्हारे लिए दुख, बुढ़ापे का धक्का और सीना सोबी लिखी थी वह
तुम्हें मिल रही है। जो इसके लिए उसने मुनासिब समझा वह उसे
तकसीम कर दिया। यस कौन है जो शिकवा करे और लब शिकायत के
वास्ते खोले ....................

176

तुम सबको गम उठाने के लिए इंतखाब किया और मुझे मन्सूरे वक्त
बनाने का चुन लिया। मगर तुमको गिरिए याकूब अता किया तो मुझको
सुन्नते यूसफी अदा करने के लिए पुकारा। अगर तुमको मातम कुनाँ
मिस्ल खानदाने नबवी बनाना चाहा, बना दिया और मुझे मुत्तबए हुसैन
शहीदेतेगेजफा के खिताब से नवाजा! उसकी शान निराली। उसकी अदा
अनोखी, हर जगह नए रंग में हर तरफ नए रूप में, जलवागर है जो कुछ
हुआ और जो होगा और हो रहा है उसकी मरजी से हो रहा है और
होगा। पस कौन है जो सरताबी करे। और कौन है जो उसके हुक्म से
बाहर जा सके। बस उसी पर नजर रखो और सब्र-करार हाथ से न जाने
दो। शुक्र करो उसकी अमानत उसकी तरफ जा रही है और सानआ अपने
मननूअ को बिगाड़ना चाहता है। फिर तुम कौन रोने वाली, तुम कौन
तड़पने वाली? उसकी चीज थी उसको अखतियार है। सब्र करो, सब्र करो
और बकीया जिन्दगी का बेशबहा वक्त मेरे लिए रोने में न सर्फ करो
बल्कि उस सफ़र की तैयारी में लगाओ जो एक दिन दरपेश है। अबावत में
मगफिरत है। गुनाहों में वक्त न गुजार दो क्योंकि यही काम आएगा।
गफलत छोड़ो और उसको पकड़ो। दुनिया फना होने वाली है और तुम्हारा
भी बुढ़ापा है। अच्छा मेरी खताएं माफ करो और मुझे अपने हकूक से
सुबुकदोश करो। तुमको खुदा की अमान में दिया। तुम्हें नेक बीवी और
साबिरा बीवी बनाए। आमीन!
भावजों और भाइयों! अलफराक बीनी व बीनकुम-तुम आपस में
मिल-जुलकर रहना और दुनिया व बदकिस्मत माँ की खिदमत में लगी
रहना और बकीया जिन्दगी को सकून से गुजरने का मौका देना। अगर
तुम लोग ऐसे ही जो आपस में शिकवा व शिकायत करते रहे और
शकररंजी तुम्हारे दरम्यान रही तो कुछ लुत्फ नहीं। शीरो शकर बनकर
रहना और जुदा न होना। मेरी तो यही ख्वाहिश है और मुझे माफी
देना। खुदा की मरजी यही थी।
177

भाइयों! तुमने इंतहाई कोशिश की मगर मौत और खुदा का हुक्म
टाले से नहीं टलता और पूरा होकर रहेगा। तुम भी मजबूर हो रहे।
सब्र-शुक्र करो। खुदा की मरजी ही यह है। मैं बताए देता हूँ कि मैं एक
पुरसुकून मौत मर रहा हूँ। मैं नहीं कह सकता कि कौन ख्याल मुझे मस्त
बनाए हुए है। फिर अंदर से फूला चला जाता है। मुझे कतई ख्याल ही
नहीं गुजरता कि मुझे फाँसी दी जायेगी। मरेंगे तो सब ही, कुछ, मैं ही
नहीं मर रहा हूँ। तुम खुदा पर नजर रखो और बजाए रोने-धोने के मेरे
ईसाले सवाब में लगे रहना कि वहाँ काम आए। अब ज्यादा क्या लिखूँ।
खुदा तुम सबको सब्रे जमील अता फरमाए और मुझ गुनहगार को जवारे
रहमत में जगह दें।¹
फकता अशफाक उल्ला खाँ
जेल की कोठरी से अशफाक द्वारा लिखे गये पत्रों को पढ़ने से
उनकी मानसिकता को ठीक से समझा जा सकता है। अशफाक का
व्यक्तित्व बहुत बड़ा था। वे परिवार के माध्यम से पूरे देश को देखते थे
और अपनी संवेदना, अपना सच बयान करते थे। वे चिन्ता करते थे
आने वाली पीढ़ियों का।

  1. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग-सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 135-144
    178

बनारस बम काण्ड में गिरफ्तार हुई शचीन्द्रनाथ बख्शी की बड़ी बहन
नलिनी से भी खूब प्रभावित थे। अशफाक नलिनी को 'दीदी' कहते थे।
नलिनी क्रांतिकारियों को आवश्यक संदेश भिजवाती थी। फाँसी घर से
अशफाक ने नलिनी को एक मार्मिक पत्र लिखा है जो निम्नवत् है -
फाँसी घर
फैजाबाद जेल
16.12.1927
अलविदा
मेरी स्नेहमयी दीदी,
मैं अब दूसरी दुनिया में जा रहा हूँ जहाँ दुनियावी मुसीबतें नही
रहेंगी और जीवन को ज्यादा उत्तम बनाने के लिए संग्राम करने की
जरूरत होगी। जहाँ न मौत होगी न मरने का प्रश्न! दीदी! मैं मरने जा
रहा हूँ वरन वस्तुतः अमरत्व प्राप्त करने जा रहा हूँ। जब कभी मेरे साथी
बख्शी जी रिहा हों, उन्हें बताइएगा कि मैंने स्थिर मन तथा प्रसन्नचित्त
होकर जिन्दगी की आखिरी साँस पूरी की है।
अगला सोमवार मेरे जीवन का अन्तिम दिन होगा। आपको मौका
मिले, तो अंतिम बार इस भाई से मुलाकात कर जाइएगा। अगर अनुकूल
परिस्थिति न हो, तो आप सब लोगो से हमेशा के लिए यही से विदा
लेता हूँ। मेरा आखिरी प्रणाम स्वीकार कीजिए और विदा दीजिए। आपको
बाद में पता चलेगा कि मैंने मृत्यु को कैसे अपनाया है। खुदा आप सबके
साथ रहे। बाबा को मेरा विनम्र प्रणाम कहिएगा। सावित्री, गौर, कानू
तथा अन्य बच्चों को प्यार। नेपाल को मेरा नमस्कार। सब बड़ों को
प्रणाम तथा छोटो को प्यार। मेरी यह अभिलाषा है कि आप सबको एक
बार फिर से देखूँ। अगर सम्भव हो तो आप लोग आ जाइएगा। खुदा का
ख्याल कीजिए और मेरे लिए दुखी न होइएगा। मेरे विषय में बख्शी जी
को खबर दीजिएगा।
179

मैं आपको अपनी दीदी मानता हूँ। आप मुझे भूलेंगी नहीं।
प्रसन्नचित रहिए यह भी जानिए कि मैं वीरगति प्राप्त कर रहा हूँ। सबको
प्रणाम।¹
आपका,
अशफाक उल्ला खाँ
वारसी,
(मूल हस्ताक्षर अंग्रेजी में)
अपठनीय हस्ताक्षर --------------------
मोहर
ले०कर्नल आई०ए०एस
सुप० जेल, फैजाबाद।
अशफाक उल्ला की समझ व्यापक है वे एकता के पक्षधर थे
खासतौर पर साम्प्रदायिक एकता के। राम प्रसाद बिस्मिल के विषय में
उनकी मित्रता और विचार उल्लिखित ही है और यह पत्र-भाषा से ही ज्ञात
होता है कि वे हिन्दुस्तानी होने का गर्व महसूस करते हैं। हिन्दू को हिन्दी
शब्दों से सजा कर पत्र लिखने वाले अशफाक में साम्प्रदायिक एकता की
कितनी मजबूत संवदेना पल रही थी, यह ज्ञात होता है। अशफाक अपने
परिचितों के परिवार का भी हाल चाल लेना, संदेश देना नही भूलते।
अशफाक उल्ला खाँ की काव्य रचनाएँ -
(1)
• बहार आई हुई शोरिश जुनूने फितना सायाँ की,
इलाही खैर करना तू मेरे ज़ेबो गरीबाँ की।
• सही जज़बाते हुर्रियत कहीं मेटे से मिटते हैं,
अबस हैं धमकियाँ दारोरसन की और ज़िंदाँ की।

  1. अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 145
    180

• वह गुलशन जो कभी आजाद था गुज़रे जमाने में,
मैं शाखे खुश्क हूँ हाँ हाँ उसी उजड़े गुलिस्ताँ की।
• नहीं तुमसे शिकायत हम सफीराने चमन मुझको,
मेरी तकदीर ही में था कफस और कैद जिंदाँ की।
• करो जब्ते मुहब्बत गर तुम्हें दावाएं उलफत है,
खामोशी साफ बतलाती है ये तस्वीरे-जानाँ की।
• यू ही लिक्खा था किस्मत में चमन पैराये-आलम ने,
कि फसले-गुल में गुलशन छूटकर है कैद जिन्दाँ की।
• जमीं दुश्मन जयाँ दुश्मन जो अपने थे पराये हैं,
सुनोगे दास्ताँ क्या तुम मेरे हाले-परीशाँ की।
• ये झगड़े और बखेड़े मेटकर आपस में मिल जाओ,
थे तफरीके अगस है, तुम में हिन्दू और मुसलमा की।
• सभी सामाने-इशरत थे मजे से अपनी कटती थी,
वतन के इश्क ने मुझको हवा खिलवाई जिंदाँ की।
• खुदा वाकिफ है जैसी भी गुज़रती है गुज़रती है,
सुनोगे दास्ताँ क्या यार तुम बीमारे-हिजराँ की।
• मिसाले-कैस दीवाना किसी लैला की खातिर में,
महीनों ठोकरें खाया किया को हो बियाबाँ की।
• बहमदल्ला चमक उठ्ठा सितारा मेरी किस्मत का,
कि तकलीदे-हकीकी की अता शाहे-शहीदाँ की।
• इधर खौफे-खिजाँ है आशियाँ का डर उधर दिल को,
हमें यकसाँ है तफ़रीहे-चमन कैद और जिंदा की।
181

• ज़िब हसाई दरे-हज़रत की हसरत अपना ईमाँ है,
मुबारक हज़रते वाइज़ को ख्वाहिश बागे-रिज़बा की।¹
(2)
• वह रंग अब कहाँ है नसरीनो नसतरन में,
उजड़ा पड़ा हुआ है क्या ख़ाक वतन में।
• कुछ आरज़ू नहीं हैं, है आरज़ू तो यह है,
रख दे कोई ज़रा-सी खाके-वतन कफ़न में।
• ऐ पुख्ताकारे उलफ़त हुशियार डिग न जाना,
मेराज़े आशिकाँ है इस दार और रसन में।
• था नाराए-अनहलक़ और दवाए मुहब्बत,
रखा हुआ था और क्या मन्सूरो कोहकन में।
• मौत और जिंदगी है दुनिया का एक तमाशा,
फरमान कृष्ण का था अर्जुन को बीच रन में।
• जिसने हिला दिया है दुनिया को एक पल में,
अफ़सोस क्यों नहीं है वह रूह अब वतन में।
• ऐ खायनीने मिल्लत ये खूब याद रखना,
हैं बोस और कन्हाई अब भी बहुत वतन में।
• सैयाद जुल्म पेश आया है जब से हसरत,
ऐ बुलबुले क़फ़स में जाओ ज़रा चमन में।²

  1. काकोरी शहीद स्मृति, भगवान सिंह माहौर पृष्ठ -228
  2. काकोरी शहीद स्मृति, सम्पादक-भगवानदास माहौर पृष्ठ -227-228
    182

हमारी तरह से है और भी कई दिलगीर,
फिराये देखिये हमको कहाँ-कहाँ तकदीर।
असीरे गर्दिशे लैलो निहार हो के चले।।
• तिरे ही वास्ते आलम में हो गये बदनाम,
तिरे सिवा नहीं रखते किसी से हम कुछ काम,
तिरे ही नाम को जपते हैं हम तो सुबहो शाम,
वतन न दे हमें तर्के-वफा का तू इलजाम।
कि आबरू पे तेरी हम निसार हो के चले।।¹
(5)
• वह असीरे-दामे-बला हूँ मैं जिसे साँस तक भी न आ सके।
वही कतीले-खंजरे-जुल्म हूँ जो न आँख अपनी फिरा सके।।
• मिरा हिन्दूकुश हुआ हिंदूकुश ये हिमालिया है दिवालिया।
मेरी गंगा-जमुना उतर गई है बस इतनी है कि नहा सके।।
• मिरे बच्चे भीख है माँगते, उन्हें टुकड़ा रोटी का कौन दे।
जहाँ गावे कहें परे-परे, कोई पास तक न बिठा सके।।
• मिरे कोहेनूर को क्या हुआ, उसे टुकड़े-टुकड़े ही कर दिया।
उसे खाक में ही मिला दिया, नहीं ऐसा कोई कि ला सके।।²
(6)
• नही अपनी हालत है बताने के काबिल।
नही माज़रा ये सुनाने के काबिल।।

  1. काकोरी शहीद स्मृति, सम्पादक-भगवानदास माहौर, पृष्ठ -230
  2. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विघार्थी, पृष्ठ -85
    184

जुबाँ तक नहीं हम हिलाने के काबिल।
• बुजुर्गों का किस मुंह से हम राग गाएँ।
जब इकगुन भी उसका न अपने में पाएँ।
किसी को नहीं मुँह दिखाने के काबिल।।
• चमन में खिज़ा अपने इठला रही है,
कपायत गुलों-गुंचों पर आ रही है।
जमी चर्ख़ बनकर सितम ढा रही है,
सुनो रो के बुलबुल ये क्या गा रही है।
• कभी खार था इसका बागे-अदन को,
नजर हाय किसकी लगी इस चमन को।।
• कभी यों न उजड़ा था मसकन किसी का,
न यों जल गया होगा खिरगन किसी का।
हरदयाल आता है यूरोप से न पाल आता है,
दिल में रह-रह के बस इतना ख़याल आता है।
भरने जाते हैं कहीं उम्र के पैमाने को,
हिन्द को छोड़ते हैं रंजोअलम खाने को¹
(7)
• उरूजे-कामयाबी पर कभी हिंदोस्ताँ होगा,
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियाँ होगा।
• जुदा मत हो मिरे पहलू से ए दर्दे-वतन हरगिज़,
न जाने वादे मुरदन मैं कहाँ, और तू कहाँ होगा।

  1. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विघार्थी, पृष्ठ -86
    185

• वचन की आबरू का पास देखें कौन करता है,
सुना है आज मक़्तल में हमारा इम्तहाँ होगा।
• ये आये-दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ खंज़रे-क़ातिल,
बता कब फैसला उनके हमारे दरमिया होगा।
• शहीदों के मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।
• कभी वो दिन भी आएगा जब अपना राज़ देखेंगे,
जब अपनी ही ज़मी होगी, जब अपना आसमाँ होगा।¹
(8)
• जमाना बना यूँ न दुश्मन किसी का,
खिज़ाँ से लुटा यूँ न गुलशन किसी का।
• रहा एक बुलबुल भी जिसमें न बाक़ी,
फ़साना जो उजड़े चमन का सुनाती।
• हमें ख़ाक में वो मिलाये हुए हैं,
ज़माने के रौंदे सताये हुए हैं।
तनज्जुल के चक्कर में आये हुए हैं,
कि अपने ही घर में पराये हुए हैं।
• ये सब कुछ सही है, मगर जान तन में है,
शरारा है ये अपने ठंडे अगन में।।²

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ - 159-160
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ - 160
    186

(9)
• नहीं गरचे अब वे हरारत दिलों में,
वही खून बाकी है लेकिन रंगों में।
जुनूँ गरचे बाकी नहीं अब सरों में,
मगर अलोगिल है वही हड्डियों में।
• लटे भी तो हाथी लटेगा कहाँ तक,
समंदर घटे से घटेगा कहाँ तक।
• नही गरचे रौनक वो अपने चमन में,
न वो रंग-बू है गुले-यासमन में।
है मुद्दत से गो अपना सूरज गहन में,
मगर खूँ तो है वो ही अपने बदन में।
• वह स्थान गंगोतरी का पवित्तर,
पिथौरा की लाट और उदयपुर के पत्थर।
हिमालय की वे चोटियाँ सर उठाकर-
इक आवाज़ से कह रही है बराबर -
कि, जब तक हैं हम इनको मरने न देंगे।
फना का इन्हें जाम भरने न देंगे।।¹
(10)
• ख्याल आता है जिस दम दिल में चुभता है सिनाँ होकर,
रहे क्यों कब्ज़ा-ए-अग़ियार में हिन्दोस्ताँ होकर।

  1. अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 87-88
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