अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै रजा उसकी तो हम बहरहाल यह फर्ज
शुक्रे हमलब पर रहे शिकवये आदान करें।
मान ले फैसला ये दोस्त को बेचूनों चरा,
फिकरे इमरोज ही रखें गमे फरदा न करें।
बस जाने खुदाबन्दी के सामने सरेनियाज खम कर दें और अपने
को उसकी मर्जी पर छोड़ दें। रोजे जजा का वह मालिक है। इसका भी
गम ना करें क्योंकि गुलाम हैं जनाबें रसुलेकरीम सलल्ला हो अलैहे
वसल्लम के। ये मातम बुनिन्दागाने अशफाक! सब्र करो और दुआ करो
कि वहाँ की मुसीबत आसान हो।....मेरी जिन्दगी इतनी ही थी। ना वह
घट सकती है ना बढ़ सकती है। ना तुम्हारा नाल ओबुका ही काम आ
सकता है। ना आहबाजरी ही जिन्दगी का एक लम्हा बढ़ा सकती है। हाँ
तुम्हारी दुआएँ वहाँ मेरे काम आ सकती हैं। बस सब्र करो और दुआ से
याद करो। मैं नहीं जानता कि मेरी लाश भी तुम लोगों को दी जाएगी
या न दी जायेगी। यूँ तो सब जान निकल गयी है फिर मिट्टी ढेर है।
मगर फिर भी मुझे तसफीश है। खैर मुर्दा बदस्त जिन्दा का मजमून है।
जबरदस्ती जो चाहे करे। उसका हरफेल दुरस्त है। खैर मैं अपने दिमाग
को इस ख्याल से परेशान करना नहीं चाहता। जो भी हो इसमें कोई शक
नहीं कि मैं तख्तये मौत पर खड़ा हुआ यह खत लिख रहा हूँ, मगर मैं
मुतमइन व खुश हूँ कि मालिक की मर्जी इसी में है बड़ा खुश किस्मत है
वह इंसान जो कुर्बाने वतन पर कुर्बान हो जाये। गो कि यह फिकरा मैं
जिस स्प्रिट के साथ लिख रहा हूँ वह आप लोगों में नहीं है। यूं आपको
तकलीफ महसूस होगी। मेरी गजलियात मकान पर मौजूद होंगी। वह
आज से बहुत पहले की लिखी हुई हैं। उनको पेशीनगोई समझिएगा और
वैसा ही होना था जो कलम से निकला।
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