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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 297 में से

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पृष्ठ 200

अगर वक्त बराबर आ गया है तो खैर खुदा के सुपुर्द किया।¹
आपका खादिम
अशफाक वारसी
अशफाक के पत्र संवेदना के स्तर पर काफी महत्वपूर्ण हैं। उनके पत्रों
में विचार और उपदेश के साथ-साथ एक समग्र भारतीय युवा का स्वर भी
निहित है। दिनाँक 15 दिसम्बर 1927 को फाँसी घर से माँ के नाम उन्होंने
अन्तिम पत्र लिखा है। पत्र से स्पष्ट है कि वे दर्द और दुख से बोझिल थे,
लेकिन यह दर्द मौत का डर नहीं है। अशफाक बहुत कुछ कहना चाहते थे
लेकिन तमाम अवरोधों और विवशताओं के चलते वे अपनी सारी बातें
नहीं लिख सके, फिर भी उनका यह माँ को लिखा अंतिम पत्र खासा
महत्वपूर्ण है जो उनकी आन्तरिक वेदना और व्यक्तित्व को समझने में
सहायक सिद्ध हुआ है। यह पत्र कुछ लम्बा अवश्य है लेकिन आवश्यक
है। पत्र निम्नलिखित है -
अज जिंदाने फैजाबाद,
फाँसी की कोठरी
15 दिसम्बर 1927
दुखिया और बूढ़ी माँ की खिदमत में उनके मरते हुए फरजंद का
सलाम पहुँचे, जो इसी हफ्ते में इस फानी दुनिया को अलविदा कहकर उस
मुल्क जावेंदा को जा बसाएगा, जहाँ कि उससे पहले भी सब जा चुके हैं
और हाजी रूह उसके बाद भी जायेगा -
फना है सबके लिए हमपे कुछ नहीं मैकूफ,
बफा है एक फकत जाने किब्रिया के लिए।

  1. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग - पृष्ठ 135-137
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