अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
हाथ में है और दुनियावी ताकतों से बालातर एक ताकत है जो
निज़ामे-आलम को सम्भाले हुए है।
मौत और जिन्दगी का साथ है - जो दुनिया में आया वह एक रोज
जरूर मरेगा-फिर एक ऐसी चीज से, जिसका आना लाजिमी है, जरूरी है
गम करना या खौफ खाना फिजूल व अबस है। मैं अप्रूवर हो सकता था,
मैं इकबाली बन सकता था, मगर दूसरों की जान फंसाने के लिए, अपनी
जिन्दगी बचाने के लिए। वह इन्सान जो अपनी जिन्दगी की खातिर
कमीनी हरकत करता हैं, क्या वह आने वाली नस्लों के लिए बाइजे-नाज
हो सकता है -नहीं, कभी नहीं।
मुझे इत्मीनान है-मुझे खुशी है कि आने वाली नस्ल मुझको डरपोक
और कमीना न कहेगी, बल्कि सच्चा और बहादुर कहेगी। दुनिया महज
इसी पर मरती है कि मरने के बाद उसको बुरे अल्फाज से न याद किया
जाय। मस्जिदें, तालाब, मदरसा, कुएँ बनाकर छोड़ जाते हैं ताकि बाद को
याद रखें जायं। मेरी मासूमियत भी कभी खामोश नहीं की जा सकती।
बस, मुझे कुछ लिखना नहीं। आपको फख्र करना चाहिए कि आपका
बच्चा बहादुरी की मौत मरेगा। अगर मौत से मुकाबला करना पड़े तो
आपको भी एक बहादुर माँ साबित करना होगा-क्या आपकी रगों में
खालिस अफगानी खून नही है। क्या आप मेरी माँ नहीं है। आप पठान
हैं, आप मेरी माँ है। यह आपके ही दूध का ही असर है, जो मैं इन्तहाई
खौफनाक बातों पर भी हँस देता हूँ। आप मुझसे मिलने को आयेंगी,
बोलो व भाभी आयेंगी, मगर बहादुर बनकर आयें, जैसी पहले बनकर
आयी थी। मुझको बहादुर बनाकर वापस जायेंगी। मैं आपसे एक बार
मिलकर जबानी बातचीत करना चाहता हूँ। क्या मौत से पहले खुदा के
हुक्म बिना मुझको कोई मार सकता है या तकलीफ में डाल सकता है।
नहीं, कभी भी नहीं। फिर जो कुछ है सब मिन जानिब अल्लाह
है। इस पर सब्र करना शाने-बन्दगी है। चंद-बंद किसी के याद आ गये,
लिखे देता हूँ। उनको पढ़ लीजिए। लल्लू भैया जब इतवार को आयें तो
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महबूब से मिलते आयें। अगर वह आएं तो हमराह लेते आएँ और बिस्तर
बंद भी जरूर लाये ताकि सामान व बिस्तर वगैरह बाँध कर दे दूँ। बिस्तर
बंद भूलें नही : -
‘‘है अर्ज आज मादरे नाशाद के हुजूर
मायूस क्यों हैं आप अलम का है क्यों वफूर।’’¹
अशफाक ने अपनी माँ को भावुक ही नहीं, वैचारिक पत्र भी लिखा है,
उनके पत्रों में स्पष्ट दिखता है कि वे जुल्म के खिलाफ लड़ने और अपील
करने की बात करते हैं लेकिन अपनी जमीन और हौसला नहीं छोड़ते।
माँ को लिखे पत्र में ढेर सारे शेर और नज़्में लिखकर अशफाक ने अपनी
संवेदना से साक्षात्कार कराया है। उनका एक-एक शेर साहस और प्रेरणा
देता है : -
‘‘सख्ती सही नहीं ईक उठाई कड़ी नही
दुनिया में क्या किसी पे मुसीबत पड़ी नहीं।’’²
अशफाक आगे इसी क्रम में लिखते है- ‘इन अशआर को जो किसी
शायर ने लिखे हैं, पढ़िए और खुदा से मदद माँगिये। आप कभी भी यह
ख्याल न कीजिए कि आप नुकसान में है। यहाँ पर मुझे एक किस्सा याद
आ गया। इंग्लैण्ड के एक बड़े शख्स हिन्दुस्तान आये। वह अपनी बीबी
के हमराह आगरे गये। जब ताजमहल पहुँचे तो उनकी बीबी ने कहा कि
अगर कोई वायदा करे कि मेरे मरने के बाद ऐसी आलीशान इमारत जैसा
यह ताजमहल है, बनवाकर मुझे दफन करेगा तो मैं इसी वक्त अपने
गोली मारने को तैयार हूँ।
- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 128-129
- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -130
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यह बात उस औरत ने कैसे कही, महज इस वजह से कि मरने के बाद
वह ख्वाहिशमंद थी कि याद की जाए। हर शख्स की ख्वाहिश होती है कि
मर जाने के बाद लोग उसको भूले नहीं और याद करें। मैं भी फख्र
करता हूँ कि ख्वाह मैं इस लायक था, या न था, मगर लोग मुझको
समझते हैं और हरगिज फरामोश न करेंगे। मैं सी०आई०डी० का मशकूर हूँ
कि उसने हमेशा की जिन्दगी दे दी, मेरे खानदान को फख्र करना
चाहिए। जो मैं हूँ, वह मैं खुद जानता हूँ और सी०आई०डी० भी खूब
जानती है। खैर, अब खत्म करता हूँ, खुदा आपको सब्र अता फरमाएं
और मुझको इस्तकलाल दे। भाई साहब, अब्दुल कादिर दादा, बूलू-भाभी,
दिल्ली वाली भाभी, शहादत भाई की दुल्हन को सलाम। रज़ी, अनीसा,
खलील, रुक्कय्या, सुल्ताना, माहजबीन सबको दुआ व प्यार।¹
- अशफाक उल्ला खाँ
अशफाक उल्ला खाँ ने परिवार को कई पत्र लिखें हैं। यह पत्र जो
उन्होंने लिखा है, इसमें स्थान अंकित नही है, लेकिन हस्ताक्षर के नीचे
तारीख लिख देने से दिनाँक का पता चलता है। एक बात और खास है
कि उनके पत्र शायराना अन्दाज में लिखे गये हैं और बीच-बीच में शेरो,
नज़्मों से पत्रों की गम्भीरता तो बढ़ती ही है, रोचक भी है। पत्रों की भाषा
का प्रभाव देखते बनता है।
<u>अशफाक उल्ला खाँ का एक और पत्र</u>
मेरी सोगवार माँ - भाइयों बहनों और अजीजो! यह खत जबकि
तुम्हारे हाथ में पहुँचेगे, तब मालूम न तुम्हारा क्या हाल होगा। ना मालूम
उस वक्त मैं जिन्दा रहूँगा या राही-ए-अदम हो चुका हूँगा। मुझे पूरा
इत्मीनान है कि जेल के हुक्काम यह खत जरूर रवाना कर देंगे। जबकि
यह मरने वाले की आखिरी ख्वाहिश है।
- अशफाक उल्ला खाँ, और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -131
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बहरहाल मैं लिख रहा हूँ अब खुदा आलिम है कि क्या हो। खैर,
आखिरी हुक्म आ गया है अब एक-दो रोज के मेहमान हैं। इन्सान की
कोशिश खुदा बन्दी को टाल नहीं सकती। जिसने बिसाते आलम पर
मोहरे लगाए, वह मौत के हाथों जरूर मात खायेंगे। आज आदम ताईदम
कौन रहा या कौन बाकी रहेगा। एक खानदान के अन्दर दस-पाँच आदमी
होते हैं। वक्तन-फबक्तन जिसका वक्त पूरा हो जाता है वह कूच कर
जाता है। बकिया रोते-धोते हैं जो तकाजाये मुहब्बत हैं। मगर इनमें से
जाना हर एक को है। कोई जल्दी जाएगा कोई बदेर। जिसको आप लोग
समझते हैं कि कबल अवक्त-मर गया वह उम्र ही इतनी लेकर आया था
और बाकी मसलहत खुदा जानता है। जिसको हुक्म उसकी जानिब से
होता है वह लब्बैक कहता है और चला जाता है। तुम्हारे दिलों को रंज
होगा, गम करोगे, मगर खुदा के नाशुक्रे मत बनना। सब्र करना और मेरे
लिए मगफिरत की दुआ करना कि खुदा मुझपर रहम करे और जवारे
रहमत में जगह दे। मैं तुम्हारे लिए सब्र की दुआ करता हूँ। मौत इसी
बहाने थी, सो आयेगी और जो लिखा है वह भी पूरा होगा। उसके हुक्म
में मजाले दमजदन नहीं। उसी की अमानत थी उसी को जानिब वापस
जाती है। आप लोगों के साथ इतना तआल्लुक उसने पैदा कर दिया था,
वह अब रखना नहीं चाहता, तुम लोगों को क्या-क्या लिखकर समझाऊँ।
मुझमें ना इतनी काबिलियत है ना मैं अलिमेदीन हूँ कि मजहबी बातें
लिखूँ या आहादीस या आयत लिखूँ। हाँ, बस इतना ही जानता हूँ और
इतना ही लिखना चाहता हूँ कि सब फानी है और फना होना है। सब
मरेंगे ना कोई रहा है और ना कोई रहेगा, तो बस वही खुदा बन्द कुद्दूस
ही रहेगा, जिसने दुनिया रची हैं। हम लोग खुदा को मानते हैं और
मुनावये जनाबेरसूल करीम है अगर दावा सही है तो बस -
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है रजा उसकी तो हम बहरहाल यह फर्ज
शुक्रे हमलब पर रहे शिकवये आदान करें।
मान ले फैसला ये दोस्त को बेचूनों चरा,
फिकरे इमरोज ही रखें गमे फरदा न करें।
बस जाने खुदाबन्दी के सामने सरेनियाज खम कर दें और अपने
को उसकी मर्जी पर छोड़ दें। रोजे जजा का वह मालिक है। इसका भी
गम ना करें क्योंकि गुलाम हैं जनाबें रसुलेकरीम सलल्ला हो अलैहे
वसल्लम के। ये मातम बुनिन्दागाने अशफाक! सब्र करो और दुआ करो
कि वहाँ की मुसीबत आसान हो।....मेरी जिन्दगी इतनी ही थी। ना वह
घट सकती है ना बढ़ सकती है। ना तुम्हारा नाल ओबुका ही काम आ
सकता है। ना आहबाजरी ही जिन्दगी का एक लम्हा बढ़ा सकती है। हाँ
तुम्हारी दुआएँ वहाँ मेरे काम आ सकती हैं। बस सब्र करो और दुआ से
याद करो। मैं नहीं जानता कि मेरी लाश भी तुम लोगों को दी जाएगी
या न दी जायेगी। यूँ तो सब जान निकल गयी है फिर मिट्टी ढेर है।
मगर फिर भी मुझे तसफीश है। खैर मुर्दा बदस्त जिन्दा का मजमून है।
जबरदस्ती जो चाहे करे। उसका हरफेल दुरस्त है। खैर मैं अपने दिमाग
को इस ख्याल से परेशान करना नहीं चाहता। जो भी हो इसमें कोई शक
नहीं कि मैं तख्तये मौत पर खड़ा हुआ यह खत लिख रहा हूँ, मगर मैं
मुतमइन व खुश हूँ कि मालिक की मर्जी इसी में है बड़ा खुश किस्मत है
वह इंसान जो कुर्बाने वतन पर कुर्बान हो जाये। गो कि यह फिकरा मैं
जिस स्प्रिट के साथ लिख रहा हूँ वह आप लोगों में नहीं है। यूं आपको
तकलीफ महसूस होगी। मेरी गजलियात मकान पर मौजूद होंगी। वह
आज से बहुत पहले की लिखी हुई हैं। उनको पेशीनगोई समझिएगा और
वैसा ही होना था जो कलम से निकला।
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मेरे शुकून की वजह मेरी बेगुनाही है और यकीन रखिये कि
अशफाक का दामन इन्सानी खून के धब्बों से पाक व साफ है।
मेरे घर में आने वाले बच्चों और मौजूदा छोटो। तुम सब दुनिया में
आओगे मेरी कहानी सुनते पाओगे और तहरीर देखोगे। मेरे इस तहरीर
में मेरे दिमाग का असर ना समझना मैं बिलकुल सही दिमाग का हूँ और
मेरी अकल ठीक काम कर रही है। मेरा मकसद महज आने वाले बच्चों
के लिए लिखना यूँ है कि वह अपने फरजाइज महसूस करें और मेरी याद
ताजा रखें। प्यारे रजी व खलील-तुम्हारा चाचा चन्द रोज बाद इस दुनिया
में नहीं रहेगा और हमेशा-हमेशा के वास्ते तुम सबों को छोड़ जायेगा।
तुमसे वह कुछ नहीं चाहता और ना ही कहना चाहता है। तुम्हारा खुदा
मददगार रहे। तुम्हें परवान चढ़ाये। आला-तालीम अता फरमाये और तुम्हें
किसी काबिल बनाये। काबिले फखरे खानदान करे।
..............
..............
तुमको बुजुर्गों की राय पर चलना चाहिए और तामील में तन-मन
धन लगा देना चाहिए और बेहतरीन इन्सान अपने को साबित करना।
मेरी तुमसे बस इतनी ख्वाहिश है और मौत का ख्याल रखना। वतन की
मुहब्बत का मुझ पर इलजाम लगाया गया है और यूँ ही मुझे सजाए मौत
मिली। जब तुम इस काबिल होगे तब मेरे मुकदमें की कुल कार्यवाही
पढ़ना। ज्यादा क्या लिखूँ। मेरी दुआएँ तुम्हारे साथ हैं।¹
अशफाक उल्ला खाँ
8 अक्टूबर 1927
- अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ 144-147
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अशफाक पत्रों में आने वाले संतानों का जिक्र करते हैं और उत्साह भरते
है, नेक सलाह तो देते ही हैं, देश प्रेम की प्रेरणा भी देते है। उन्हें यह
पता है कि आने वाली पीढ़ियाँ उनकी कुर्बानी से ऊर्जा पायेगीऔर देश के
लिए कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरित होंगी। अशफाक को बच्चों से प्रेम
था, वे उपदेश देते हैं। उन्हें उम्मीद है कि हमारे बच्चे मेरे मुकदमें की
कार्यवाही पढ़ेंगे तो असलियत का अन्दाजा लगा लेगें।
<u>फैसले के एक दिन पूर्व माँ को लिखा गया पत्र -</u>
जनाबा वालिदा साहिबा,
बखैरियत हूँ और जनाबा की खैरियत का ख्वाहा हूँ। कल फैसला
सुनाया जायेगा। खुदा मुझको हिम्मत दे। ताकत इत्मीनान दे। सुकूने
कल्व अता फरमाए। आप सबको सब्र दे। बीवी दुनिया सराय-फानी है।
कौन रहा है और कौन रह जायेगा। अज आदम-ताईदम मौत व जीस्त
का सिलसिला चला आ रहा है और चला जायेगा। कहाँ तक गम कहाँ
तक रंज किया जाय। मुझे अपनी सजा का कोई गम नहीं, कोई रंज
नही। सजाए कैद या कोई भी हो मेरा ईमान है कि सब मिन जानिब
अल्लाह होगी। फिर 'सरे तसलीम खम है जो मिज़ाजे यार में आए'।
मगर जो दुख है वह तुम्हारी जईफी का है। तकलीफ है वह तुम्हारी
कमजोरी और काबिले-रहम हालत पर। खुदा वाकिफ है कि इस इतवार
की मुलाकात के बाद किसी घड़ी किसी पल तुम्हारा कमजोर चेहरा और
नाउम्मीदी से भरे हुए अल्फाज फरामोश नहीं कर सका। खैर, जो मर्जी
मौला। मेरी गुजारिश और आखिरी गुजारिश यह है कि अगर खुदा ने
जिन्दा मुझको बाहर निकाला, तो आपकी जईफी देखकर जिसकी मुझको
उम्मीद तो है नहीं, वैसे दुआ है कि खुदा आपको उम्रेनूह अता फरमाएं।
आप अपनी तस्वीर हिंगू से खिंचवा लीजिएगा। आप कुछ फिक्र न करें।
वह आपका दामाद है और सामने आता है यानि साफिया का खाविंद।
कम-अज-कम बाहर आकर आपकी तस्वीर से कुछ तसल्ली होगी। आप
बखूबी वाकिफ है कि आपको बिना देखें हुए मैं दो रोज भी नहीं रह
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सकता। मगर यह मसला मजबूरी और इज्जत व जिल्लत का था।
लिहाजा उन लोगों के कहने पर नहीं चला। क्योंकि जिन्दगी जैसी जलील
चीज के लिए दुनिया की नजरों में और अपनी नजरों में गिरकर रहने से
मौत बेहतर व अफजल है। काश कि खुदा एक मौका और अता करता कि
आपकी खिदमत करूँ और कदमों से जुदा न हूँ। मैं निहायत बदकिस्मत
हूँ कि आपकी खिदमत करने का जब मेरा वक्त आया तो आपके कदमों
से दूर हूँ। खैर खुदा की मर्जी यही थी। आप भी सब्र कीजिए और मेरे
लिए दुआ कीजिए। आपको जईफी में जो मुझसे दुख पहुँचा, आप खुदारा
मुझे माफ फरमाइएगा। तब दिल को तस्कीन होगी। ज्यादा क्या लिखूँ।
हाँ एक बात और वह है कि मेरे फैसले के बाद लोगों को ढोंग न फैलाने
देना, जो बिहीख्वाह और दोस्त थे, सब मालूम हो गये। आपके खानदान
वालों को भी देख लिया। मेरा खानदान मेरे हकीकी भाई, मेरी भावज,
बहन व बहनोई हैं और मुल्क के हिन्दू और मुसलमान मेरे भाई व बुजुर्ग
हैं और किसी बदमाश से वास्ता नहीं। जो मुसीबत में शरीक था, वह
बहादुर और दोस्त है। बाकी सब कमीने हैं, जो आरामो-आसाइश के
साथी और दुख दर्द पर अलग। मैं कसम खाकर कहता हूँ कि मैं उन
सबसे नाराज हूँ। अगर बाहर निकलने का मौका मिल गया तो उनसे
कितात आल्लुक करके जानवरों से दोस्ती कर लूँगाँ। साँपों से प्यार
करूँगा। भेड़ियों के गिरोह में बैठा रहूँगा, मगर इन अजीजों से अलग
रहूँगा। फीअमानिल्लाह। अपना फोटो जरूर खिंचवाइएगा और जिन्दा
बाहर निकला तो मेरे लिए वही काफी होगा।
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अगर वक्त बराबर आ गया है तो खैर खुदा के सुपुर्द किया।¹
आपका खादिम
अशफाक वारसी
अशफाक के पत्र संवेदना के स्तर पर काफी महत्वपूर्ण हैं। उनके पत्रों
में विचार और उपदेश के साथ-साथ एक समग्र भारतीय युवा का स्वर भी
निहित है। दिनाँक 15 दिसम्बर 1927 को फाँसी घर से माँ के नाम उन्होंने
अन्तिम पत्र लिखा है। पत्र से स्पष्ट है कि वे दर्द और दुख से बोझिल थे,
लेकिन यह दर्द मौत का डर नहीं है। अशफाक बहुत कुछ कहना चाहते थे
लेकिन तमाम अवरोधों और विवशताओं के चलते वे अपनी सारी बातें
नहीं लिख सके, फिर भी उनका यह माँ को लिखा अंतिम पत्र खासा
महत्वपूर्ण है जो उनकी आन्तरिक वेदना और व्यक्तित्व को समझने में
सहायक सिद्ध हुआ है। यह पत्र कुछ लम्बा अवश्य है लेकिन आवश्यक
है। पत्र निम्नलिखित है -
अज जिंदाने फैजाबाद,
फाँसी की कोठरी
15 दिसम्बर 1927
दुखिया और बूढ़ी माँ की खिदमत में उनके मरते हुए फरजंद का
सलाम पहुँचे, जो इसी हफ्ते में इस फानी दुनिया को अलविदा कहकर उस
मुल्क जावेंदा को जा बसाएगा, जहाँ कि उससे पहले भी सब जा चुके हैं
और हाजी रूह उसके बाद भी जायेगा -
फना है सबके लिए हमपे कुछ नहीं मैकूफ,
बफा है एक फकत जाने किब्रिया के लिए।
- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग - पृष्ठ 135-137
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आप भी बखूबी वाकिफ है और तालीमयाफ्ता है मगर यह जरूर है
बूढ़ी सिनासीदा दुखिया माँ के लिए यह सदमा जरूर बड़ा है कि उसका
जवान बेटा नामुराद दुनिया से उठ जाए और वह उसकी लाश पर दो
आँसू भी न डाल सके या उसकी मरी हुई सूरत देख सके। मगर यह तो
बताओ यह हुक्म किसका है? क्या दुनिया के किसी इनसान का हुक्म है?
क्या मुझे उसके हुक्म के बिला मार सकता है? उसने रोजेअज़ल से ऐसा
ही लिखा था कि अशफाक तुझको फाँसी पर मरना है और जब तू मरेगा
तो कोई तेरे पास तेरे आइञ्ज़ा व अकरूबा व अहबाब में से न होगा। पर
हुक्म खुदाबंदी पूरा होकर रहेगा और ऐसा ही होता चला आया है। मैं यह
लिख देना चाहता हूँ कि मैं ब इतमीनान और पुरसुकून मौत मर रहा हूँ।
हुक्म खुदा ऐसा ही था और वह अटल है, होकर रहेगा। मौत सबके लिए
है और सब मरेंगे। दुनियावी तकलीफ, माद्दी बंदिशें, इनसानी क्यूदात
सब पीर के रोज तक खत्म हो जायेगी और मेरी रूह इस कफ से अंसरी
से आजाद हो जायेगी। तब दूसरी मंजिल सामने है, देखिये वहाँ कैसी
गुजरे। यह उनकी बख्शीश व करम पर मुनहसिर है। सफर दरपेश है,
जादेराह पास नहीं। बस उसी की उम्मीदे करम पर खुश-खुश मर रहा हूँ।
मैं तो आपको अलविदा कहता हुआ आप सबको और खसूसन आपको
बकीया जिन्दगी में वक्फे-नौहा व बुका करके उस तरफ जा रहा हूँ जहाँ से
आया था और फिर वापस जाने का वायदा था। वायदा पूरा करना है।
आप सबके सामने राहे अमल क्या है? मैंने तो बुरा किया या अच्छा। मैं
इकरार करता हूँ कि मेरी जिन्दगी की इतनी बरसें गुमराही, मासियत,
सियाकारी और गुनाहों में गुजरी उसके लिए मेरे दोस्त, मेरे अजीज मेरे
भाई और मुख्तसिर यह कि हर हमदर्द मुसलमान दुआए मगफिरत करे
और आप सब लोग सब्र कीजिए। सब्र तल्खअस्त व लेकिन बरे शीरी
दारद- मुझे डर है कि आप घबरा न उठें और यह न कह बैठे कि जिसकी
जवान औलाद मर जाए वह कैसे सब्र करे तो सुनिए, मेरी प्यारी माँ।
खुदा ने मुझको आपके शिकम से पैदा किया था। मेरी पैदाइश पर
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खुशियाँ मनाई गयी थी। शुक्राने अदा किये गये थे और किस्सा मुख्तसर
यह कि मुझको आँखों का नूर और दिल का सुरूर समझा जाता था।
आपने इस सिले में खुदा को क्या दिया कि उसने आपको एक इनसान
की शक्ल में औलाद दी। आपसे जो भी पूछता था आप यहीं कहती थीं
कि खुदा का बंदा है, खुदा ने दिया है। उसी की अमानत है और मैं
अमानतदार हूँ। बस अब मालिक अपने गुलाम को तलब करता है।
अमानत रखने वाला अपनी अमानत तलब करता है। आप खयानात न
करे, न आपकी चीज थी न आपसे छीनी गई। इतने दिन के वास्ते
आपको दी गई थी कि रखो, बाद को हम वापस ले लेंगे। अब वापस
लिया जा रहा है फिर आपको क्या हक है कि रद्दोकद करें। क्या आपने
हमेशा से यह सोचा था कि मुझे मौत कभी न आएगी। अरे, तुम भी
जानती थी और मुझे भी मालूम था कि हम तुम सब मरेंगे, कोई आगे
कोई पीछे। या तो मुझको रोना पड़ता तुम्हारे लिये या तुम्हें मेरे लिए।
उसका मंशा यह था कि बूढ़ी माँ जवान औलाद को रोयेगी और बाकीया
तीन भाई अपने छोटे भाई का मातम करेंगे। तो क्या कोई, आज इस
दुनिया में इतनी ताकतवाला है कि खुदाबंद के अहकाम पलट दे? कोई
नहीं। अपने खानदान ही में कितनी ऐसी माँएँ हैं जो बुढ़ापे में जवान
औलाद का दाग खोए बैठी हैं और कितने ऐसे भाई हैं जो अपनी आँखें
अपने भाई के लिए सुर्ख कर चुके है और कितनी ही बहनें, भावजें,
भतीजियाँ, भतीजे, भानजियाँ, भानजे हैं जो कि भाई, देवर, चाचा, मामू
के लिए सीनाकोबी कर चुके हैं। दुनिया का यही धंधा है। दुनिया नाम
ही उसका है। अगर मरना न होता तो जिन्दगी का फायदा ही क्या था।
अगर रात न हो तो दिन में लज्जत ही क्या। अगर गम न हो तो
शादी-ब-मंजिले ग़म है। गरज कि दुनिया एक माज़ने मुरक्कब है। जिसमें
सब जाइके हैं। ऐशो मसर्रत, गमों अंदोह, आराम व तकलीफ, गफलत व
बेघणी, नेकी व बदी, मौत व जीस्त, गरज कि हर चीज यहाँ मिलेगी।
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पास खुशकिस्मत वह है जिसने अच्छी बातें कुबूल की और बुराइयों
से परहेज किया। गलफत पर होशियारी की तरजीह दी और माबूदे हकीकी
की याद में लगा और होशियार रहा अपने फराइज़ की अदायगी में। नेकी
को कबूल किया और बदी को ठुकराया। अबदी आराम की खातिर
तकलीफ बरदाश्त की और इबादत में मसरूफ़ रहा, मौत को पेशेनजर रखा
और जीस्त ही में सामाने आसरत जमा कर लिया।
ऐश व इशरत में पड़कर गफलत नहीं की और पेश आने वाले गम
व अंदोह का खटका महसूस करता रहा। जिसने इन बातों को अख्तियार
किया और हर मुसीबत व तकलीफ व आराम व राहत को मिनजानिब
अल्लाह तस्सवर किया और उसकी निआमतों का शुक्रिया अदा किया।
इसाइब व तकलीफ पर सब्र किया और कहा कि यह सब मिन जानिब
अल्लाह हैं।
दोस्त का दिया हुआ जहरेहलाल भी शहद मसफ्फा ख्याल किया
और सब्र किया, शुक्र किया यस राजी का लिया उसे जो कौनैन का
मालिक और मशरिक व मगरिब का रब है। क्या तुम इसके ख्वाहिशमंद
नहीं हो कि खुदा तुम्हारा पैदा करने वाला है और जिसके सामने तुम्हें
जाना है, तुम्हें अपना दोस्त कहकर पुकारे। अरे दुनिया उसकी मुतयन्नी
है और वह हमको अपना दोस्त कहे। आज मौत के सामने बैठा हुआ
अशफाक कुछ ख्वाहिश नहीं रखता, मगर हाँ यह कह दे कि अशफाक मैं
तुमसे राजी हूँ और तू मेरा बंदा है मैंने बंदानी में कबूल किया। वह
कहता है कि ऐ ईमान वालो! बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है।
दूसरी जगह फरमाता है यानी खुशखबरी सुना दो उन सब्र करने वालों
को कि जब कोई उनको मुसीबत पहुँचती है तो कहते हैं कि बेशक हम
अल्लाह ही के हैं और बेशक हम उसकी तरफ लौटने वाले हैं। फिर
फरमाता है यानी यही हैं जिसपर बरकत है उनके रब की तरफ से और
रहमत है। यही लोग हिदायतवाले हैं। यह कौल आपको जनाबे बारी के
लिख दिए। अब समझना न समझना आपका काम है।
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आपका सब्र व शुक्र आपको उसके दरबार में मकबूल व मुकर्रब
करेगा और अगर खुदानाख्वास्तां आप हद से आगे बढ़ गईं तो आप खुद
समझदार और पढ़ी-लिखी हैं। आपका नाल ओशेवन, आहवजारी,
सीनाकाबी, मुझको जिन्दा नहीं कर सकती, न मौत से बचा सकती है।
हाँ सब्र करना, कलमा व दरूद पढ़ना और बख्शना मेरे लिए कुछ सूदमंद
साबित हो जाए।
यस मेरी अच्छी माँ मेरी खताएँ माफ फरमाकर मशगूले-खुदा हो
जाओ। उसकी मर्जी यही थी और कौन है जो उसके हुक्म को टाल सके।
मुझसे आपको दुख पहुँचा। आपका बुढ़ापा बरबाद हो गया। आपकी
जिन्दगी जीक में पड़ गई। मैंने की। हाँ जाहिर असबाब में से एक मैं भी
हूँ। मगर मौला की मर्जी और उसका हुक्म पोशीरा रहता है। समझदार
मिनजानिब अल्लाह हर बात को समझते है और ना समझ इन्साफों की
तरफ ख्याल दौड़ाते हैं। इससे कब्ल एक कार्ड फैसले के मुतमाल्लिक
मिला होगा। कैसे मजे की बात है कि मैं अपने कलम से अपनी मौत
की खबर आपको पहुँचा रहा हूँ। मैंने एक किताब लिखना शुरू की थी
और वह तकमील को न पहुँच सकी। खैर मालिक की मरजी ही न थी
जिसमें मेरा मकसद बच्चों के लिए नसीहत करना था। खैर उनके लिए
जो मैदाने अमल है और जो सामने आए उस पर गामजन न हो। मुझे
जो लिखना है थोड़ा-थोड़ा सब लिख दूँगा क्योंकि अब वक्त मेरे पास
मजमून तिगारी व कलम फरसाई का नहीं हैं मुख्तसर-मुख्तसर सब को
लिख दूंगा। सब अपना-अपना मतलब निकाल लें। मुझे तो सबसे जरूरी
आप को लिखना था और यूँ तो ये मजमून वाहित तस्सवुर किया जाए।
सभी से सब्र की गुजारिश है और सब्र ही खुशी की कुंजी है। मुझे
बूबू की भी परेशानियों का इल्म है और आप सबकी कोफ्त में ऐसे वक्त
में इजाफा नए गम का है। मगर क्या मौला की मर्जी टाली जा सकती
है? नहीं हरगिज नहीं। वह हर सूरत से आजमाइश कर रहा है। तुम सब्र
को हाथ में न जाने दो। जो दोस्त की तरफ की खुशी व गम मिले
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मुस्कराते हुए चेहरे और मुतमइन दिल के साथ कबूल करो कि फलाहे
दीनी व दुनयवी हासिल कर सका। मैं कोशिश करूँगा कि यह खत
तुमको मेरी मौत से पहले ही मिल जाए ताकि तुम्हारे दुख में कमी हो
जाए और तुम सोच सको कि मरने वाला क्या बात है कि मरते हुए भी
मुतमइन व खुश है-'फना है सबके लिए हमपे कुछ नहीं मौकूफ, बका है
एक फ़क़त जाते किब्रिया के लिए'। आदम अलेहिस्सलाम से लेकर इस
वक्त तक कौन ऐसा है जो मरा न हो? जिसने बिसाते-आलम पर जिन्दगी
के मोहरे बसाए और मौत के हाथों के सामने जरूर मात खाई, यस
उसका गम बेकार है और आने वाली जरूर आने वाली बात के लिए
परेशान होना सरासर गलती है। अब रहा मुहब्बत, डाह, मोह, प्रेम-ये सब
दुनियाबी धंधे हैं। खुदा से मुहब्बत करो। उसको पूजो जो हमेशा जिन्दा व
कायम रहेगा। तुम्हें अपनी बकीया जिन्दगी में कभी तो उसके लिए रोना
नहीं पड़ेगा। बस उसी से मुहब्बत करो और उसी को समझो। अक्ली
दलाइल, महजब़ी मसाइल, फलसफियाना बहस दुखे हुए दिल पर
नमक-मिर्च का काम करते हैं। मैं खूब जानता हूँ कि आप सोंचेगी कि
मैंने अपनी करतूतों से आपका बुढ़ापा खराब किया और भाइयों और
दीगर आइज्जा की जिन्दगी दुख की जिन्दगी बना दी। मैंने क्या किया।
मैंने कुछ नहीं किया। उसका हुक्म रोजेअजल से ऐसा ही था, सो होकर
रहा। जो बात होने वाली होती है असबाब उसमें पेशतर से होना शुरू
होते हैं और असबाब जब पायए तकमील को पहुँच जाते हैं, बात पूरी हो
जाती है। यस मेरे लिए यह मौत और यह दिन था। सो मुझे मिला।
और तुम्हारे लिए दुख, बुढ़ापे का धक्का और सीना सोबी लिखी थी वह
तुम्हें मिल रही है। जो इसके लिए उसने मुनासिब समझा वह उसे
तकसीम कर दिया। यस कौन है जो शिकवा करे और लब शिकायत के
वास्ते खोले ....................
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तुम सबको गम उठाने के लिए इंतखाब किया और मुझे मन्सूरे वक्त
बनाने का चुन लिया। मगर तुमको गिरिए याकूब अता किया तो मुझको
सुन्नते यूसफी अदा करने के लिए पुकारा। अगर तुमको मातम कुनाँ
मिस्ल खानदाने नबवी बनाना चाहा, बना दिया और मुझे मुत्तबए हुसैन
शहीदेतेगेजफा के खिताब से नवाजा! उसकी शान निराली। उसकी अदा
अनोखी, हर जगह नए रंग में हर तरफ नए रूप में, जलवागर है जो कुछ
हुआ और जो होगा और हो रहा है उसकी मरजी से हो रहा है और
होगा। पस कौन है जो सरताबी करे। और कौन है जो उसके हुक्म से
बाहर जा सके। बस उसी पर नजर रखो और सब्र-करार हाथ से न जाने
दो। शुक्र करो उसकी अमानत उसकी तरफ जा रही है और सानआ अपने
मननूअ को बिगाड़ना चाहता है। फिर तुम कौन रोने वाली, तुम कौन
तड़पने वाली? उसकी चीज थी उसको अखतियार है। सब्र करो, सब्र करो
और बकीया जिन्दगी का बेशबहा वक्त मेरे लिए रोने में न सर्फ करो
बल्कि उस सफ़र की तैयारी में लगाओ जो एक दिन दरपेश है। अबावत में
मगफिरत है। गुनाहों में वक्त न गुजार दो क्योंकि यही काम आएगा।
गफलत छोड़ो और उसको पकड़ो। दुनिया फना होने वाली है और तुम्हारा
भी बुढ़ापा है। अच्छा मेरी खताएं माफ करो और मुझे अपने हकूक से
सुबुकदोश करो। तुमको खुदा की अमान में दिया। तुम्हें नेक बीवी और
साबिरा बीवी बनाए। आमीन!
भावजों और भाइयों! अलफराक बीनी व बीनकुम-तुम आपस में
मिल-जुलकर रहना और दुनिया व बदकिस्मत माँ की खिदमत में लगी
रहना और बकीया जिन्दगी को सकून से गुजरने का मौका देना। अगर
तुम लोग ऐसे ही जो आपस में शिकवा व शिकायत करते रहे और
शकररंजी तुम्हारे दरम्यान रही तो कुछ लुत्फ नहीं। शीरो शकर बनकर
रहना और जुदा न होना। मेरी तो यही ख्वाहिश है और मुझे माफी
देना। खुदा की मरजी यही थी।
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भाइयों! तुमने इंतहाई कोशिश की मगर मौत और खुदा का हुक्म
टाले से नहीं टलता और पूरा होकर रहेगा। तुम भी मजबूर हो रहे।
सब्र-शुक्र करो। खुदा की मरजी ही यह है। मैं बताए देता हूँ कि मैं एक
पुरसुकून मौत मर रहा हूँ। मैं नहीं कह सकता कि कौन ख्याल मुझे मस्त
बनाए हुए है। फिर अंदर से फूला चला जाता है। मुझे कतई ख्याल ही
नहीं गुजरता कि मुझे फाँसी दी जायेगी। मरेंगे तो सब ही, कुछ, मैं ही
नहीं मर रहा हूँ। तुम खुदा पर नजर रखो और बजाए रोने-धोने के मेरे
ईसाले सवाब में लगे रहना कि वहाँ काम आए। अब ज्यादा क्या लिखूँ।
खुदा तुम सबको सब्रे जमील अता फरमाए और मुझ गुनहगार को जवारे
रहमत में जगह दें।¹
फकता अशफाक उल्ला खाँ
जेल की कोठरी से अशफाक द्वारा लिखे गये पत्रों को पढ़ने से
उनकी मानसिकता को ठीक से समझा जा सकता है। अशफाक का
व्यक्तित्व बहुत बड़ा था। वे परिवार के माध्यम से पूरे देश को देखते थे
और अपनी संवेदना, अपना सच बयान करते थे। वे चिन्ता करते थे
आने वाली पीढ़ियों का।
- अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग-सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 135-144
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बनारस बम काण्ड में गिरफ्तार हुई शचीन्द्रनाथ बख्शी की बड़ी बहन
नलिनी से भी खूब प्रभावित थे। अशफाक नलिनी को 'दीदी' कहते थे।
नलिनी क्रांतिकारियों को आवश्यक संदेश भिजवाती थी। फाँसी घर से
अशफाक ने नलिनी को एक मार्मिक पत्र लिखा है जो निम्नवत् है -
फाँसी घर
फैजाबाद जेल
16.12.1927
अलविदा
मेरी स्नेहमयी दीदी,
मैं अब दूसरी दुनिया में जा रहा हूँ जहाँ दुनियावी मुसीबतें नही
रहेंगी और जीवन को ज्यादा उत्तम बनाने के लिए संग्राम करने की
जरूरत होगी। जहाँ न मौत होगी न मरने का प्रश्न! दीदी! मैं मरने जा
रहा हूँ वरन वस्तुतः अमरत्व प्राप्त करने जा रहा हूँ। जब कभी मेरे साथी
बख्शी जी रिहा हों, उन्हें बताइएगा कि मैंने स्थिर मन तथा प्रसन्नचित्त
होकर जिन्दगी की आखिरी साँस पूरी की है।
अगला सोमवार मेरे जीवन का अन्तिम दिन होगा। आपको मौका
मिले, तो अंतिम बार इस भाई से मुलाकात कर जाइएगा। अगर अनुकूल
परिस्थिति न हो, तो आप सब लोगो से हमेशा के लिए यही से विदा
लेता हूँ। मेरा आखिरी प्रणाम स्वीकार कीजिए और विदा दीजिए। आपको
बाद में पता चलेगा कि मैंने मृत्यु को कैसे अपनाया है। खुदा आप सबके
साथ रहे। बाबा को मेरा विनम्र प्रणाम कहिएगा। सावित्री, गौर, कानू
तथा अन्य बच्चों को प्यार। नेपाल को मेरा नमस्कार। सब बड़ों को
प्रणाम तथा छोटो को प्यार। मेरी यह अभिलाषा है कि आप सबको एक
बार फिर से देखूँ। अगर सम्भव हो तो आप लोग आ जाइएगा। खुदा का
ख्याल कीजिए और मेरे लिए दुखी न होइएगा। मेरे विषय में बख्शी जी
को खबर दीजिएगा।
179
मैं आपको अपनी दीदी मानता हूँ। आप मुझे भूलेंगी नहीं।
प्रसन्नचित रहिए यह भी जानिए कि मैं वीरगति प्राप्त कर रहा हूँ। सबको
प्रणाम।¹
आपका,
अशफाक उल्ला खाँ
वारसी,
(मूल हस्ताक्षर अंग्रेजी में)
अपठनीय हस्ताक्षर --------------------
मोहर
ले०कर्नल आई०ए०एस
सुप० जेल, फैजाबाद।
अशफाक उल्ला की समझ व्यापक है वे एकता के पक्षधर थे
खासतौर पर साम्प्रदायिक एकता के। राम प्रसाद बिस्मिल के विषय में
उनकी मित्रता और विचार उल्लिखित ही है और यह पत्र-भाषा से ही ज्ञात
होता है कि वे हिन्दुस्तानी होने का गर्व महसूस करते हैं। हिन्दू को हिन्दी
शब्दों से सजा कर पत्र लिखने वाले अशफाक में साम्प्रदायिक एकता की
कितनी मजबूत संवदेना पल रही थी, यह ज्ञात होता है। अशफाक अपने
परिचितों के परिवार का भी हाल चाल लेना, संदेश देना नही भूलते।
अशफाक उल्ला खाँ की काव्य रचनाएँ -
(1)
• बहार आई हुई शोरिश जुनूने फितना सायाँ की,
इलाही खैर करना तू मेरे ज़ेबो गरीबाँ की।
• सही जज़बाते हुर्रियत कहीं मेटे से मिटते हैं,
अबस हैं धमकियाँ दारोरसन की और ज़िंदाँ की।
- अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 145
180
• वह गुलशन जो कभी आजाद था गुज़रे जमाने में,
मैं शाखे खुश्क हूँ हाँ हाँ उसी उजड़े गुलिस्ताँ की।
• नहीं तुमसे शिकायत हम सफीराने चमन मुझको,
मेरी तकदीर ही में था कफस और कैद जिंदाँ की।
• करो जब्ते मुहब्बत गर तुम्हें दावाएं उलफत है,
खामोशी साफ बतलाती है ये तस्वीरे-जानाँ की।
• यू ही लिक्खा था किस्मत में चमन पैराये-आलम ने,
कि फसले-गुल में गुलशन छूटकर है कैद जिन्दाँ की।
• जमीं दुश्मन जयाँ दुश्मन जो अपने थे पराये हैं,
सुनोगे दास्ताँ क्या तुम मेरे हाले-परीशाँ की।
• ये झगड़े और बखेड़े मेटकर आपस में मिल जाओ,
थे तफरीके अगस है, तुम में हिन्दू और मुसलमा की।
• सभी सामाने-इशरत थे मजे से अपनी कटती थी,
वतन के इश्क ने मुझको हवा खिलवाई जिंदाँ की।
• खुदा वाकिफ है जैसी भी गुज़रती है गुज़रती है,
सुनोगे दास्ताँ क्या यार तुम बीमारे-हिजराँ की।
• मिसाले-कैस दीवाना किसी लैला की खातिर में,
महीनों ठोकरें खाया किया को हो बियाबाँ की।
• बहमदल्ला चमक उठ्ठा सितारा मेरी किस्मत का,
कि तकलीदे-हकीकी की अता शाहे-शहीदाँ की।
• इधर खौफे-खिजाँ है आशियाँ का डर उधर दिल को,
हमें यकसाँ है तफ़रीहे-चमन कैद और जिंदा की।
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• ज़िब हसाई दरे-हज़रत की हसरत अपना ईमाँ है,
मुबारक हज़रते वाइज़ को ख्वाहिश बागे-रिज़बा की।¹
(2)
• वह रंग अब कहाँ है नसरीनो नसतरन में,
उजड़ा पड़ा हुआ है क्या ख़ाक वतन में।
• कुछ आरज़ू नहीं हैं, है आरज़ू तो यह है,
रख दे कोई ज़रा-सी खाके-वतन कफ़न में।
• ऐ पुख्ताकारे उलफ़त हुशियार डिग न जाना,
मेराज़े आशिकाँ है इस दार और रसन में।
• था नाराए-अनहलक़ और दवाए मुहब्बत,
रखा हुआ था और क्या मन्सूरो कोहकन में।
• मौत और जिंदगी है दुनिया का एक तमाशा,
फरमान कृष्ण का था अर्जुन को बीच रन में।
• जिसने हिला दिया है दुनिया को एक पल में,
अफ़सोस क्यों नहीं है वह रूह अब वतन में।
• ऐ खायनीने मिल्लत ये खूब याद रखना,
हैं बोस और कन्हाई अब भी बहुत वतन में।
• सैयाद जुल्म पेश आया है जब से हसरत,
ऐ बुलबुले क़फ़स में जाओ ज़रा चमन में।²
- काकोरी शहीद स्मृति, भगवान सिंह माहौर पृष्ठ -228
- काकोरी शहीद स्मृति, सम्पादक-भगवानदास माहौर पृष्ठ -227-228
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