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अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)

Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works

अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished297 पृष्ठ

हमारी तरह से है और भी कई दिलगीर,
फिराये देखिये हमको कहाँ-कहाँ तकदीर।
असीरे गर्दिशे लैलो निहार हो के चले।।
• तिरे ही वास्ते आलम में हो गये बदनाम,
तिरे सिवा नहीं रखते किसी से हम कुछ काम,
तिरे ही नाम को जपते हैं हम तो सुबहो शाम,
वतन न दे हमें तर्के-वफा का तू इलजाम।
कि आबरू पे तेरी हम निसार हो के चले।।¹
(5)
• वह असीरे-दामे-बला हूँ मैं जिसे साँस तक भी न आ सके।
वही कतीले-खंजरे-जुल्म हूँ जो न आँख अपनी फिरा सके।।
• मिरा हिन्दूकुश हुआ हिंदूकुश ये हिमालिया है दिवालिया।
मेरी गंगा-जमुना उतर गई है बस इतनी है कि नहा सके।।
• मिरे बच्चे भीख है माँगते, उन्हें टुकड़ा रोटी का कौन दे।
जहाँ गावे कहें परे-परे, कोई पास तक न बिठा सके।।
• मिरे कोहेनूर को क्या हुआ, उसे टुकड़े-टुकड़े ही कर दिया।
उसे खाक में ही मिला दिया, नहीं ऐसा कोई कि ला सके।।²
(6)
• नही अपनी हालत है बताने के काबिल।
नही माज़रा ये सुनाने के काबिल।।

  1. काकोरी शहीद स्मृति, सम्पादक-भगवानदास माहौर, पृष्ठ -230
  2. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विघार्थी, पृष्ठ -85
    184

जुबाँ तक नहीं हम हिलाने के काबिल।
• बुजुर्गों का किस मुंह से हम राग गाएँ।
जब इकगुन भी उसका न अपने में पाएँ।
किसी को नहीं मुँह दिखाने के काबिल।।
• चमन में खिज़ा अपने इठला रही है,
कपायत गुलों-गुंचों पर आ रही है।
जमी चर्ख़ बनकर सितम ढा रही है,
सुनो रो के बुलबुल ये क्या गा रही है।
• कभी खार था इसका बागे-अदन को,
नजर हाय किसकी लगी इस चमन को।।
• कभी यों न उजड़ा था मसकन किसी का,
न यों जल गया होगा खिरगन किसी का।
हरदयाल आता है यूरोप से न पाल आता है,
दिल में रह-रह के बस इतना ख़याल आता है।
भरने जाते हैं कहीं उम्र के पैमाने को,
हिन्द को छोड़ते हैं रंजोअलम खाने को¹
(7)
• उरूजे-कामयाबी पर कभी हिंदोस्ताँ होगा,
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियाँ होगा।
• जुदा मत हो मिरे पहलू से ए दर्दे-वतन हरगिज़,
न जाने वादे मुरदन मैं कहाँ, और तू कहाँ होगा।

  1. अशफाक उल्ला खाँ और उनका युग, सुधीर विघार्थी, पृष्ठ -86
    185

• वचन की आबरू का पास देखें कौन करता है,
सुना है आज मक़्तल में हमारा इम्तहाँ होगा।
• ये आये-दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ खंज़रे-क़ातिल,
बता कब फैसला उनके हमारे दरमिया होगा।
• शहीदों के मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।
• कभी वो दिन भी आएगा जब अपना राज़ देखेंगे,
जब अपनी ही ज़मी होगी, जब अपना आसमाँ होगा।¹
(8)
• जमाना बना यूँ न दुश्मन किसी का,
खिज़ाँ से लुटा यूँ न गुलशन किसी का।
• रहा एक बुलबुल भी जिसमें न बाक़ी,
फ़साना जो उजड़े चमन का सुनाती।
• हमें ख़ाक में वो मिलाये हुए हैं,
ज़माने के रौंदे सताये हुए हैं।
तनज्जुल के चक्कर में आये हुए हैं,
कि अपने ही घर में पराये हुए हैं।
• ये सब कुछ सही है, मगर जान तन में है,
शरारा है ये अपने ठंडे अगन में।।²

  1. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ - 159-160
  2. अशफाक उल्ला खाँ, भवान सिंह राणा, पृष्ठ - 160
    186

(9)
• नहीं गरचे अब वे हरारत दिलों में,
वही खून बाकी है लेकिन रंगों में।
जुनूँ गरचे बाकी नहीं अब सरों में,
मगर अलोगिल है वही हड्डियों में।
• लटे भी तो हाथी लटेगा कहाँ तक,
समंदर घटे से घटेगा कहाँ तक।
• नही गरचे रौनक वो अपने चमन में,
न वो रंग-बू है गुले-यासमन में।
है मुद्दत से गो अपना सूरज गहन में,
मगर खूँ तो है वो ही अपने बदन में।
• वह स्थान गंगोतरी का पवित्तर,
पिथौरा की लाट और उदयपुर के पत्थर।
हिमालय की वे चोटियाँ सर उठाकर-
इक आवाज़ से कह रही है बराबर -
कि, जब तक हैं हम इनको मरने न देंगे।
फना का इन्हें जाम भरने न देंगे।।¹
(10)
• ख्याल आता है जिस दम दिल में चुभता है सिनाँ होकर,
रहे क्यों कब्ज़ा-ए-अग़ियार में हिन्दोस्ताँ होकर।

  1. अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी पृष्ठ 87-88
    187

• शहीदाने-वतन का खून एक दिन रंग लाएगा,
चमन में फूट निकलेगा यह बरगे-अर्गवाँ होकर।
• फ़कत दारोरसन ही कामयाबी का ज़रिया है,
मकासिद तक यह पहुँचाएगी हमको निर्दबाँ होकर
• नहीं वाकिफ़ ये मादर और पिदर इस अमरे-शुदनी से,
कि आफ़त में पड़ेंगे उनके बच्चे नौजवाँ होकर।
• सता ले ऐ फलक मुझको जहाँ तक तेरा जी चाहे,
सितम परवर सितम झेलूँगा शेरे नेसताँ होकर।
• करूँ मैं इन किलाबे दहर का शिकवा मआज अल्लाह,
है तुफ़ मुझे पर डरूँ गर जेल से मैं नौजवाँ होकर।
• दलहता है कलेजा दुश्मनों का देखकर 'हसरत',
चला करते हो जब बेड़ी पहनकर शादमाँ होकर।¹
(11) कुछ शेर-अशआर
• आनी थी हमको मौत सो आई वतन से दूर,
अब देखना ये है कि ये मिट्टी कहाँ की है।
• बहुत ही जल्द टूटेंगी गुलामी की ये जंजीरे,
किसी दिन देखना आज़ाद ये हिंदोस्तां होगा।
• जिन्दगी बादेफ़ना तुझको मिलेगी हसरत,
तेरा ज़ीना तिरे मरने की बदौलत होगा।

  1. अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -88-89
    188

• वतन हमेशा रहे शादकाय और आज़ाद,
हमारा क्या है अगर हम रहे रहे न रहें।¹
• वह जुर्मे-आरजू पै जिस कदर-चाहें सज़ा दे लें,
मुझे खुद ख्वाहिशे-ताजीर है मुलजिम हूँ इकरारी।²
• बुज़दिलों को ही सदा मौत से डरते देखा,
गो कि सौ बार उन्हें रोज़ ही मरते देखा।
वीर को मौत से हमने नहीं डरते देखा,
तख्तये मौत पे भी खेल ही करते देखा।
• मौत इक रोज जब आनी है तो डरना क्या है,
हम सदा खेल ही समझा किये मरना क्या है।³
• तंग आकर हम भी उनके जुल्म के बेदाद से,
चल दिए सूए-अदम ज़िंदाने फैज़ाबाद से।
जबकि गैरों से उन्हें इक दम की भी फुरसत नहीं,
फिर वह क्यों मिलने लगे अब हसरते-नाशाद से।
• बाइसे नाज़ जो थे अब वह फसाने न रहे,
जिन तरानों में मज़ा था वह तराने न रहे।
घर छूटा बार छूटा अहले वतन छूट गए,
माँ छूटी, बाप छूटा भाई बहन छूट गए।

  1. अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -89
  2. भारतीय क्रांतिकारी आन्दोलन का इतिहास, मन्मथनाथ गुप्त पृष्ठ -201
  3. काकोरी शहीद स्मृति, सम्पादक-भगवानदास माहौर, पृष्ठ -230
    189

• अपना यह अहद सदा से था कि मर जायेंगे,
नाम माता तेरे उश्शाक में कर जायेंगे।¹
• कौन वाकिफ था कि यूँ सर पे बला आएगी,
बैठे बिठलाए हुकूमत यह गज़ब ढायेगी।
• फना है सबके के लिए हम पे कुछ नहीं मौकूफ,
बका है एक फकत जाते किब्रिया के लिए।
• तनहाई गुरबत से मायूस न हो 'हसरत',
कब तक न खबर लेंगे याराने-वतन तेरी।²
(12) अशफाक की एक हिन्दी कविता
• हे मातृभूमि तेरी सेवा किया करूँगा।
फाँसी मिले मुझे या हो जन्म कैद मेरी,
बेड़ी बजा-बजाकर तेरा भजन करूँगा।³
(13) अकीदत के फूल
• जुबाने हाल से अशफाक की तुरबत ये कहती है।
मुहब्बाने वतन ने क्यों हमें दिल से भुलाया है।।
बहुत अफसोस होता है बहुत तकलीफ होती है।
शहीद अशफाक की तुरबत है और धूमों का साया है।।⁴

  1. अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ -90
  2. अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 90
  3. अशफाक उल्ला और उनका युग, सुधीर विद्यार्थी, पृष्ठ 91
  4. काकोरी शहीद स्मृति - सम्पादक- भगवानदास माहौर, पृष्ठ -231
    190

अशफाक उल्ला खाँ अपने नाम के आगे वारसी लगाते थे और
'हसरत' उपनाम से कविताएँ लिखा करते थे। उनकी काव्य रचना पर एक
दृष्टि देने पर ज्ञात होता है कि वे उच्च कोटि के शायर थे, शायरी पर
उनका अधिकार था। उन्होंने अच्छी गज़लें कहीं हैं, वही कत्आत, नज़्मों
में भी कम नहीं दिखते। कविता में उनकी आंतरिक वेदना, संवेदना,
भावना का पता चलता है। कुछ रचनाएँ तो दार्शनिक भाव से कही गयी
है तो कुछ आत्मलाप की मुद्रा में। उनकी रचनाओं से स्पष्ट है कि वे
सिर्फ क्रांतिकारी ही नही थे, भावुक हृदय कवि भी थे। कहीं वे सरकारी
वकील पर व्यंग्य करते हैं तो कही बसंत के आगमन की मस्ती। इस्लाम
में उनका विश्वास था लेकिन वे सभी धर्मों का आदर करते थे। यह
उनके व्यक्तित्व की खास पहचान थी। कुल मिलाकर सम्पूर्ण व्यक्तित्व
रेखांकित करने योग्य, प्रेरणा के योग्य और युवाओं के आदर्श।
अशफाक की कुछ अन्य कविताएं भी (गज़लें) रेखांकित करना
आवश्यक है, जो उनके व्यक्तित्व को (काव्य प्रतिभा) निखारता है :-
‘‘पहिनाने वाले अगर बेड़िया पहनाएँगे।
खुशी से कैद के गोशे को हम बसाएँगे।।
जो सन्तरी वीर जिन्दा के सो भी जाएँगे।
वह राग गा के उन्हें नींद से जगाएँगे।
तलब फजूल है काँटे को फूल के बदले।
न ले बहिश्त भी हस होमरूल के बदले।।
सन्तरी देख कर इस जोश को शरमाएँगे।
191

राग जंजीर की झन्कार में हम गायेंगे।।¹
‘ ‘सितमगर अब यह आलम है तेरे बीमारे फुरकत का।
लबों पर दम है दिल में बलबला शौके शहादत का।।
मेरी दीवानगी पर चारागर हैरां न हो इतना।
यही अंन्जाम होना चाहिए नाकाम उलफत का।।
बुताने संग दिल सुनते नहीं फरियाद बेकस की।
निराला ढंग है उन खुदपरस्तों की हुकूमत का।।
मिटाकर जानो दिल अपना किसी जालिम जफाजू पर।
तमाशा अपनी आँखों देखता हूँ अपनी किस्मत का।।
हविस हूरों की हो जिसमें दिलाये याद गिल्मां को।
जनाबे शेख़ मैं कायल नहीं ऐसी रियाज़त का।।
बर आएँ हसरतें हासिल स्कूने कल्ब मुज़तर हो।
कहाँ ऐसा मुकद्दर हाय मुझ बरमश्ता किस्मत का।।
मज़ा जब है कि वह कह उठें ‘अशफाक’ उनका क्या कहना।
गज़ल है या मुरक्का है तेरे वक्ते मुसीबत का।।’’²
अशफाक की काव्य रचनाएँ आजादी के उद्गार हैं। यही नही वे देश
प्रेमी होने का दावा भी करते हैं। अपनी मिट्टी से प्यार की बुलन्दी छूने
वाले अशफाक ऐसे वियोगी जान पड़ते है जिसमें उनका देश प्रेम छूट रहा
है या यूँ कह ले कि वे कुछ और करना चाहते थे। अशफाक की कविताएँ
सदैव प्रेरणा देती रहेंगी और इतिहास की थाती साबित होगी।

  1. रामप्रसाद बिस्मिल, रचनावली, सम्पादक-दिनेश शर्मा, पृष्ठ -188
  2. राम प्रसाद बिस्मिल रचनावली, सम्पादक-दिनेश शर्मा, पृष्ठ -188
    192

अशफ़ाक़ की सम्पूर्ण शायरी (ग़ज़लें, नज्में) एवं अमर बलिदान उपसंहार

अध्याय-दस

अध्याय-दस
उपसंहार
अशफाक उल्ला खाँ का जीवन साम्प्रदायिक एकता और देश को
स्वतंत्र करने की मानसिकता में बीता। यही कारण था कि वे एक आदर्श
युवा की भाँति युवाओं में प्रेरणा के स्तम्भ बने रहे। अशफाक के बलिदान
के बाद तमाम प्रतिक्रियाएं हुई और अशफाक की भरपूर सूचना ली गयी।
वे मिसाल बन गये। यह बात और है कि अशफाक की फाँसी से युवा
वर्ग निराश जरूर हुआ लेकिन वहीं वह ऊर्जा को भरकर नये भारत की
कल्पना में आ गया।
क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा से निराशा व क्षोभ तो हुआ और
इसे बनारस से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र ने जनता की इस
असहाय स्थिति पर खेद भी प्रकट किया। इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका
'चाँद' (नवम्बर 1928) अंक फाँसी विशेषांक के रूप में निकला।¹
अखिल भारतीय कांग्रेस ने अपने अधिवेशन में सरकार की तीव्र
आलोचना की कि उसने जनता की भावनाओं की उपेक्षा करके
क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा दी। क्रांतिकारियों के परिवार के प्रति
कांग्रेस ने अपनी सहानुभूति प्रदान की।²
अशफाक उल्ला खाँ अपने खानदान पर लगे दाग धो देना चाहते
थे और उन्होंने अपने कृतित्व से यह दाग धो भी डाला। अशफाक का
प्रारम्भिक जीवन सिर्फ खेलकूद में ही नहीं वरन् देश की चिन्ता और आम
लोगों को शोषण से निजात दिलाने के वैचारिक मंथन में बीता। वे हमेशा
धीर-गम्भीर बने रहते और कभी अपनी सुन्दरता और देह बल का
अभिमान न करते।

1.स्वतंत्रता आन्दोलन में जनपद शाहजहाँपुर का योगदान-डॉ०एन.सी.मेहरोत्रा पृष्ठ144
2.दि हिस्ट्री ऑफ दि इंडियन नेशनल काँग्रेस, भाग-एक-पृष्ठ 540,पट्टाभि
सीतारमैया
193

हाँ इतना अवश्य था कि उन्हें अपने बल पर विश्वास था। खुद के
विचारों में स्वस्थय मानसिकता बना लेना अशफ़ाक की खूबी थी। देश के
सशस्त्र क्रांति के प्रयास में अपने जीवन की आहुति देने वाले अशफ़ाक
उल्ला ख़ाँ ने जब क्रांतिकारी आन्दोलन में प्रवेश किया तो वे छात्र ही थे।
फाँसी के समय उनकी उम्र मात्र 27 वर्ष की थी। अशफ़ाक का क्रांतिकारी
जीवन लगभग सात वर्ष का रहा और इतने ही अल्पकाल में वे देश की
राजनीति और समाज की धड़कन से परिचित हो गये थे। अशफ़ाक उल्ला
ख़ाँ सिर्फ एक सिपाही ही नहीं थे कि लड़े और मृत्यु को प्राप्त हो गये।
वे हमारे समय के क्रांतिकारियों में प्रखर चिन्तक के रूप में भी हमारे बीच
उपस्थित होते हैं। उनकी कविताएँ एवं उनके वैचारिक लेख और राष्ट्र के
नाम संदेश तथा उनके द्वारा लिखे गये पत्रों से स्पष्ट हो जाता है कि वे
किस हद तक वैचारिक धरातल पर दृढ़ थे। यह स्पष्ट है कि क्रांतिकारी
गतिविधियों, फरारी जीवन, जेल की जिन्दगी में से ऐसा समय ही नहीं
मिला कि वे बाकायदा अपने विचार लिपिबद्ध कर पाते।
इन्ही में से समय निकाल कर जो उन्होंने लिखा है वह बहुत थोड़ा
है, जिसे पढ़कर लगता है कि वे चाहते हुए भी अपने सोचे हुए को कागज
पर उतार नहीं सके। वे बहुत कुछ लिखना चाहते थे, वे बच्चों के लिए
पुस्तकों की रचना करना चाहते थे, उन्हें भावी पीढ़ी की बहुत चिन्ता थी,
लेकिन उनकी इच्छा अधूरी रह गयी। उनके लिखे पत्रों, कविताओं और
डायरी में लिखे अंशों से हमें उनके जीवन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी
मिलती हैं।
देश की स्वतंत्रता और हिन्दू मुस्लिम एकता के लिए शहीद होने वाले
अशफ़ाक ने फाँसी से पहले अपनी डायरी में हिन्दुस्तान का नक्शा भी
बनाया था और देखने से लगता है कि वे खूब रोये थे। सुनने-देखने में
यह भी आता है कि आँसुओं के निशान अभी तक ज्यों के त्यों हैं।
194

आज भी देश के नाम उनका संदेश प्रासंगिक है। उनकी कविताएं
हमें एक सूत्र में बाँधती हैं।
न कोई इंगलिश, न कोई जर्मन,
न कोई रशियन, न कोई तुर्की।
मिटाने वाले है अपने हिंदी,
जो आज हमको मिटा रहे हैं।
यह कहना सर्वथा गलत है कि क्रांतिकारियों के पास कोई विचार
नहीं था। अपने संदेश में अशफाक ने स्पष्ट कहा है कि वे किस तरह की
आज़ादी चाहते हैं। अशफाक की कल्पना समाजवादी थी, जहाँ कोई ऊंच
है न नीच। अशफाक ने किसान, मजदूरों की तरक्की की बात भी कही।
वे कारखानों और गांवों में लोगों के बीच जमकर काम करने में विश्वास
रखते थे। अशफाक शोषण के कारणों की बात करते है और उसके
खिलाफ जंग लड़ने की बात करते हैं।
<u>देश वासियों के नाम भेजा गया संदेश</u>
‘‘बिरादराने वतन की खिदमत में उनके उस भाई का सलाम पहुँचे
जो उनकी इज्जत व नामू से वतन की खातिर फैजाबाद जेल में कुर्बान हो
गया। आज जबकि मैं यह पैगाम बिरादराने वतन को भेज रहा हूँ, इसके
बाद मुझको तीन दिन और चार रातें और गुजारनी हैं और फिर मैं हूँगा
और आगोशे मादी वतन होगा। हम लोगों पर जो जुर्म लगाये गये थे
वह इस सूरत में पब्लिक में लाए गये कि हमको बहुत से लोग
गेरेतालीमय़ाफ्ता या हुकूमत के दस्तरख्वान की पसेखुर्दा हड्डियाँ चचोड़ने
वाले थे, डाकू, खूनी, कातिल के लकब से पुकारा किए। मैं आज इस
फाँसी की कोठरी में बैठा हुआ भी खुश हूँ और अपने उन भाइयों का
शुक्रिया अदा करता हूँ। और कहूँगा -
195

मर मिटा आप पै कौन! आपने यह भी सुना,
आपकी जान से दूर! आप से शिकवा है मुझे।
खैर यह तुम्हारा फैल है कि हमारी कुर्बानियों को कबूल न करो
और यह हमारा फर्ज है कि बार-बार ठुकराओ मगर हम तुम्हारा ही दम
भरे जायेंगे। बिरादराने वतन, मैं उसी पाक व मुकद्दस वतन ही की
कसम खाकर कहूँगा कि हम नंगे नामूसे वतन पर कुर्बान हो गए। क्या
यह शर्म की बात नहीं कि हम अपनी आँखों से देखते कि नित नए
मुज़ालिम हो रहे है और गरीब हिन्दुस्तानी हर हिस्साये मुल्क और
खित्तयेदुनिया में जलील और रुसवा हो रहे हैं और कहीं न ठिकाना है
न सहारा। किस्सा मुख्तसर ये कि हमारा वतन भी हमारा नहीं। हम पर
टैक्स की भरमार, हमारी माली हालत का रोज बरोज गिरते जाना, 33
करोड़ बहादुर हिन्दुस्तानी हिन्दू और मुसलमान भेड़-बकरियों की मानिंद
बनाए गए। हमारे गोरे आका हमें ठोकरे मार दें तो बाज-पुर्स न हो।
जनरल डायर जलियावाला बाग को नमूने हशर बना दे। हमारी माताओं
की बेइज्जती करें। हमारे बूढ़ों और बच्चों पर बम के गोले, गन-मशीनों
की गोलियाँ बरसाएं और हर नया दिन हमारे लिए नई मुसीबते लेकर
आए। फिर भी हम बादये गफलत रहें और ऐशो-इशरत में अय्यायें- जवानी
गुजार देते। यह ख्याल करके -
जनूने हुब्बे वतन का मजा/शबाब में हैं,
लहू में फिर यह रवानी रहे/रहे न रहे।
जो भी किया, भला किया, आज हम नाकाम रहे, डाकू हैं।
कामायाब होते मुहिब्बते वतन के पाक लकब से पुकारे जाते। और जो भी
आज हम पर झूठी गवाहियाँ दे गए, हमारे नाम के जयकारे लगाते -
बहे बहरे फना में जल्द/यारब लाश बिस्मिल की,
196

कि भूखी मछलियाँ हैं/जौहरे शमशीरे कातिल की।
आह! क्या ऐसे दौर की जिन्दगी प्यारी ख्याल की जा सकती है।
जबकि हमारे ही गिरोह-सियासी में खलफिशार मचा है। कोई तबलीग का
दिलददा है, जो कोई शुद्धि पर मर मिटने को बाइसेनिजात समझ रहा है।
मुझे तो रह-रहकर इन दिमागों और अक्लों पर तरस आ रहा है जो कि
बेहतरीन दिमाग हैं और माहरीने सियासत हैं। काश कि वह अज़ादिए
मिस्र की जद्गदोजहद एहरारान मिस्र के कारनामें और बर्तानवी सियासी
चाले स्टडी कर लें और हमारे हिन्दुस्तान की मौजूदा हालत से मुकाबिला
व मवाज़ना करें, क्या ठीक वही हाल इस वक्त नहीं है। गवर्नमेंट के
खुफिया एजेन्ट प्रोपेगेंडा मजहबी बुनियाद पर फैला रहे हैं। इन लोगों का
मकसद मजहब की हिफाजत या तरक्की नहीं है बल्कि चलती गाड़ी में
रोड़ा अटकाना है। मेरे पास वक्त नहीं है न मौका है कि सब कच्चा
चिट्ठा खोलकर रख देता जो मुझे अय्यामे फरारी में और उसके बाद
मालूम हुआ है। यहाँ तक मुझे मालूम है कि मौलवी नियामतुल्ला
कादियानी कौन था कि काबुल में संगसार किया था। वह ब्रिटिश एजेन्ट
था। जिसके पास हमारे करमफरमा खान बहादुर, तसद्दुम हुसैन साहब
डिप्टी सुपरिटेंडेन्ट सी०आई०डी० गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया पैगाम लेकर गए थे
मगर बेदारमगज हुकूमत काबुल ने इलाज जल्द कर दिया और मर्ज को
फैलने न दिया। मैं अपने हिन्दुओं और मुसलमान भाइयों को बता देना
चाहता हूँ कि सब ढ़ोंग हैं, जो सी०आई०डी० के खुफिया खजाने के रूपये
से रचा गया है। मैं मर रहा हूँ और वतन पर मर रहा हूँ। मेरा फर्ज है
कि हर नेको बद बात भाइयों तक पहुंचा दूँ। मानना न मानना उनका
काम है। मुल्क के बड़े-बड़े लोग इससे बचे हुए नहीं हैं। बस आवाम को
आँखे खोलकर इत्तबा करना चाहिए।
197

भाइयों! तुम्हारी खानाजंगी तुम्हारी आपस में फूट, तुम दोनों में से
किसी के भी सूदमंद साबित न होगी। यह गैर मुमकिन है कि 7 करोड़
मुसलमान शुद्ध हो जाएँ और वैसे ही यह भी महमल-सी बात है कि 22
करोड़ हिन्दू मुसलमान बना लिए जाएं। मगर हाँ यह आसान है और
बिल्कुल आसान है कि यह सब मिलकर गुलामी का तौक गले में डाल
लें। ऐ वह कौम जिसका कोई कौमी झंडा नहीं-ऐ वह कि तेरा वतन मेरा
वतन नहीं-ऐ कि दूसरों की तरफ हाथ फैलाए हुए रहम की दरख्वास्त पर
नजर रखनेवाली बेकस कौम तेरी अपनी गलतियों का यही नतीजा है कि
आज तू गुलाम है और फिर वही गलतियाँ कर रही है कि आने वाली
नस्लों के लिए धब्बा गुलामी का छोड़ जाएगी कि जो भी सर जमीने हिन्द
पर कदम रखेगा, गुलामी में रखेगा और गुलाम बनाएगा। ऐ खुदावंदे
कुद्दूस क्या कोई ऐसा सबेरा नहीं आयेगा कि जिस सुबह को तेरा
आफताब आजाद हिन्दुस्तान पर चमके और फिजाए हिन्द आजादी के नारों
से गूँज उठे। कांग्रेस वाले हों कि सौराजिस्ट तलबीगवाले हो कि
शुद्धिवाले, कम्युनिस्ट हो कि रिवोल्यूशनरी, अकाली हो कि बंगाली, मेरा
पयाम हर फरजंदेवतन को पहुँचे। मैं हर शख्स को उसकी इज्जत व
मज़हब का वास्ता देता हूँ। अगर वह मजहब का कायल नहीं तो उसके
ज़मीर को और जिसको भी वह मानता हो, अपील करता हूँ कि हर
काकोरी केस के मर जाने वाले नौजवानों पर तरस खाओ। और फिर
हिन्दुस्तान को सन् 20 व 21 वाला हिन्दुस्तान बना दो। फिर अहमदाबाद
कांग्रेस जैसा इत्तिहाद इत्तिफाक का नजारा सामने हो। बल्कि उससे
बढ़कर हो और मुकम्मल आजादी का जल्द-से-जल्द ऐलान करके इन गोरे
आकाओं को हटा दो कि ये अब केंचुली उतार चुके हैं और अब वह किसी
मंत्र से बस में न होंगे-तबलीग व शुद्धी वालो खुदारा-आंखें खोलो, कहाँ
थे और कहाँ पहुँच गये, अपनी-अपनी शान खत्म करो, सोचो तो मजहब
में जबरदस्ती इखतिलाफे राय पर जंग, एक काम नामुकम्मल छोड़कर
दूसरी तरफ रुजू हो गये।
198

आज कौन ऐसा हिन्दू या मुसलमान है जो मजहबी आजादी इतनी
रखता है कि जितना उसका हक है? क्या गुलाम कौम का कोई मजहब
नहीं होता? तुम अपने मजहब का सुधार क्या कर सकते हो? तुम खुदा
की इबादत पुरसुकून तरीके पर करो। तुम ईश्वर का ध्यान खामोशी से
करो और दोनों मिलकर इस सफेद भूत को मंत्र से जंत्र से उतार भगाओ।
इसी की यह सारी कार्यवाही है। जब यह भूत उतर जाएगा, हमारी आँखें
खुल जायेंगी। आओ हमारी भी सुनो, पहले हिन्दुस्तान को आजाद करो,
फिर कुछ और सोचना, खुदा ने जिसके लिए जो रास्ता मुंतखिब कर दिया
है, वह उसी पर रहेगा। तुम किसी को भी नही हटा सकते। <u>आपस में</u>
<u>मिल-जुलकर रहो और मुत्तहिन्द हो जाओ नहीं तो सारे हिन्दुस्तान की</u>
<u>बद बख्ती का वार तुम्हारी गर्दन पर है और गुलामी का बाइस तुम हो।</u>
कम्युनिस्ट ग्रुप के अशफाक की गुजारिश है कि तुम इस गैरमुल्की
की तसव्वुर करते हो, देसी चीजों से नफरत, विदेशी पोशाक और
तर्जेमआशरत के दिलदादा हो, इससे काम नहीं चलेगा। अपने असली रंग
में आ जाओ। देश के लिए जिओ, देश के लिए मरो। मैं तुमसे काफी तौर
पर मुत्तफिक हूँ और कहूँगा कि मेरा दिल गरीब किसानों के लिए और
दुखिया मजदूरों के लिए हमेशा दुखी रहा है। मैं अपने अय्यामे फरारी में
भी अक्सर इनकी हालत देखकर रोया किया हूँ क्योंकि मुझे इनके साथ
दिन गुजारने का मौका मिला है। मुझसे पूछो तो मैं कहूँगा कि मेरा बस
हो तो मैं दुनिया की हर मुमकिन चीज इनके लिए वक्फ कर दूँ। हमारे
शहरों की रौनक इनके दम से है। हमारे कारखाने उनकी वजह से आवाद
और काम कर रहे हैं। हमारे पंपों से इनके हाथ का पानी निकालते हैं,
गर्ज कि दुनिया का हर एक काम इनकी वजह से हुआ करता है। गरीब
किसान बरसात के मूसलाधार पानी और जेठ-बैसाख की तपती दोपहर में
भी खेतों पर जमा होते हैं और जंगल में मँडलाते हुए हमारी खुराक का
सामान पैदा करते हैं।

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यह बिल्कुल सच है कि वह जो पैदा करते है जो वह बनाते हैं उनमें
उनका हिस्सा नहीं होता, हमेशा दुखी और मफलूकुल हाल रहते हैं। मैं
इत्तिफाक करता हूँ कि इन तमाम बातों के जिम्मेदार हमारे गोरे आका
और उनके एजेन्ट हैं। मगर इनका इलाज क्या है कि उनको उस हालत
पर ले आएँ कि वह महसूस करने लगें कि वह क्या हैं। इसका वाहिद
जरिया यह है कि तुम उन जैसी वज़ा किरा इख्तियार करो और
जेंटलमैनी छोड़कर देहात का चक्कर लगाओ। कारखानों में डेरे डालो
और उसकी हालत स्टडी करो और उनमें एहसास पैदा करो। तुम कैथरीन
ग्रांड मदर ऑफ रशिया की सवानेह उमी पढ़ो और वहां के नौजवानों की
कुरबानियाँ देखो। तुम कालर टाई और उम्दा सूट पहनकर लीडर जरूर
बन सकते हो, मगर किसानों और मजदूरों के लिए फाइदेमन्द साबित नही
हो सकते। दीगर पॉलिटिकल जमाअतों से मुत्तहिद होकर काम करो और
अपनी माद्दापरस्ती से किनारा करो कि यह फिजूल है जो तुम्हे दूसरी
जमाअतों से अलग किये हुए हैं।
मेरे दिल में तुम्हारी इज्जत है और मैं मरते हुए भी तुम्हारे सयासी
मकसद से बिल्कुल मुत्तफिक हूँ। मैं हिन्दुस्तान की ऐसी आजादी का
ख्वाहिशमंद था जिसमें गरीब खुश और आराम से रहते। खुदा मेरे बाद
वह दिन जल्द आए जबकि छत्तरमंजिल लखनऊ में अब्दुल्ला मिस्त्री लोको
वर्कशाप और धनिया चमार, किसान भी मिस्टर खलीकउज्जमा और
जगत नारायण मुल्ला व राजा साहब महमूदाबाद के सामने कुर्सी पर बैठे
हुए नजर पड़े। मेरे कामरेडो मेरे रिवोल्यूशनरी भाइयों -तुमसे मैं क्या कहूँ
और तुमको क्या लिखूँ, बस अब तुम्हारे लिए क्या कुछ कम मुसर्रत की
बात होगी, जब सुनोगे कि तुम्हारा एक भाई हँसता हुआ फाँसी पर चला
गया और मरते-मरते खुश था। मैं खूब जानता हूँ कि जो स्प्रिट तुम्हारा
तबका रखता है - चूँकि मुझको भी फख्र है और अब बहुत ज्यादा फख्र है
कि एक सच्चा रिवोल्यूशनरी होकर मर रहा हूँ।
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मेरा पयाम तुमको पहुँचाना फर्ज था, मैं खुश हूँ-मसरूर हूँ, मैं उस
सिपाही की तरह हूँ जो फायरिंग लाइन पर हंसता चला जा रहा हो और
खंदको में बैठा हुआ गा रहा हो। तुम्हें दो शेर हसर मोहानी साहब का लिख
रहा हूँ -
जान को महवे गम बना दिल को वफा निहाद कर,
बंद ये इश्क है तो यू कता रहे मुराद की।
ऐ कि निजाते हिन्द की दिल से है तुझको आरजू,
हिम्मते सर बुलन्द से यास का इंसदाद कर।
हजार दुख क्यों न आएँ-बहरे जख्खार दरमियान में मौंजे
मारें-आतिशी पहाड़ क्यों न हायल हो जाएँ मगर ये आजादी के शेरों
अपने-अपने गरम खून को मातृभूमि पर छिड़कते हुए और जानों को
मातृवेदी पर कुर्बान करते हुए आगे बढ़े चले जाओ। क्या तुम खुश न
होगे जब तुमको मालूम होगा कि हम हँसते हुए मर गए। मेरा वजन
जरूर कम हो गया है और वह मेरे कम खाने की वजह से हो गया है।
किसी डर या दहशत की वजह से नहीं हुआ है-और मैं कन्हाई लाल दत्त
की तरह वजन न बढ़ा सका मगर खुश हूँ और बहुत खुश हूँ। क्या मेरे
लिए इससे बढ़कर कोई इज्जत हो सकती है कि सबसे पहला और अब्बल
मुसलमान हूँ जो आजादिए वतन की खातिर फाँसी पा रहा हूँ - <u>मेरे</u>
<u>भाइयो! मेरा सलाम लो और इस नामुकम्मल काम को, जो हम से रह</u>
<u>गया है तुम पूरा करना। तुम्हारे लिए यू०पी० में मैदाने-अमल तैयार कर</u>
दिया है, तुम्हारा काम जाने। इससे ज्यादा उम्दा मौका तुम्हारे हजार
प्रोपेगंडे से न होता। स्कूल और कालेजों के तुलवा हमारी तरफ दौड़ रहे
हैं, अब बहुत अर्से तक दिक्कत न होगी -
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उठो-उठो सो रहे हो नाहक/पयामे बाँगे जरस तो सुन लो,
बढ़ो कि कोई बुला रहा है, निशाने मंजिल दिखा-दिखाकर।
ज्यादा क्या लिखूँ, सलाम लो-और कमर हिम्मत बाँध लो और
मैदाने-सियासी लीडरों मेरा सलाम कबूल करो और तुम हम लोगों को उस
नजर से न देखना जिस नजर से दुश्मनाने वतन और खाइनीने कौम
देखते थे। न हम डाकू थे न कातिल -
कहाँ गया कोहेनूर हीरा/किधर गई हाय मेरी दौलत,
वह सबका सब लूटकर कि उलटा/हमीं को डाकू बता रहे हैं।
हमीं को दिन-दहाड़े लूटा, फिर हमीं डाकू हैं। हमारे भाइयों और
बहनों और बच्चों को जलियानवाला बाग में भून डाला और अब हमीं को
कालस बलूट फैसले में लिखा जाता है। अगर हम ऐसे हैं तो वह कैसे हैं
और किस खिताब से पुकारे जाने के काबिल हैं, उन्होंने हिन्दुस्तान का
सुहाग लूट लिया, जिन्होंने लाखों बहादुरों को अपनी गरज के लिए
मेसोपोटामिया और रूस के मैदान में सुलवा दिया, खूँखार जानवर,
जालिम दरिंदे वह हैं कि हम? हम बेवश थे, कमजोर थे, सब कुछ सुन
लिया और ऐ वतनी भाइयों यह सब तुमने सुनवाया। आओ फिर मुत्तहिद
हो जाओ, फिर मैदाने अमल में कूद पड़ो और मुकम्मल आजादी का
ऐलान कर दो। अच्छा अब मैं रुखसत होता हूँ और हमेशा के लिए
खैरबाद कहता हूँ। खुदा तुम्हारे साथ हो और फिजाये हिंद पर आजादी
का झंडा जल्द लहराए। मेरे पास न वह ताकत है कि हिमालय की चोटी
पर पहुँचकर एक ऐसी आवाज निकालूँ जो हर शख्स को बेदार कर दे और
न वह असबाब है कि जिससे फिर तुम्हारे दिल मुश्ताइल कर दूँ कि तुम
उसी जोश से आगे बढ़कर खड़े हो जाओ जैसे सन् 20 या 21 में थे। मैं
चंद सुतूर के बाद रुख़सत होता हूँ : -
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