अमर शहीद अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ: व्यक्तित्व और कृतित्व (काकोरी के अमर शहीद का जीवन व रचनाएँ)
Amar Shaheed Ashfaqulla Khan: Personality & Works
अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ 'वारसी' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 195, कुल 297 में से
संदर्भ में पढ़ेंबहरहाल मैं लिख रहा हूँ अब खुदा आलिम है कि क्या हो। खैर,
आखिरी हुक्म आ गया है अब एक-दो रोज के मेहमान हैं। इन्सान की
कोशिश खुदा बन्दी को टाल नहीं सकती। जिसने बिसाते आलम पर
मोहरे लगाए, वह मौत के हाथों जरूर मात खायेंगे। आज आदम ताईदम
कौन रहा या कौन बाकी रहेगा। एक खानदान के अन्दर दस-पाँच आदमी
होते हैं। वक्तन-फबक्तन जिसका वक्त पूरा हो जाता है वह कूच कर
जाता है। बकिया रोते-धोते हैं जो तकाजाये मुहब्बत हैं। मगर इनमें से
जाना हर एक को है। कोई जल्दी जाएगा कोई बदेर। जिसको आप लोग
समझते हैं कि कबल अवक्त-मर गया वह उम्र ही इतनी लेकर आया था
और बाकी मसलहत खुदा जानता है। जिसको हुक्म उसकी जानिब से
होता है वह लब्बैक कहता है और चला जाता है। तुम्हारे दिलों को रंज
होगा, गम करोगे, मगर खुदा के नाशुक्रे मत बनना। सब्र करना और मेरे
लिए मगफिरत की दुआ करना कि खुदा मुझपर रहम करे और जवारे
रहमत में जगह दे। मैं तुम्हारे लिए सब्र की दुआ करता हूँ। मौत इसी
बहाने थी, सो आयेगी और जो लिखा है वह भी पूरा होगा। उसके हुक्म
में मजाले दमजदन नहीं। उसी की अमानत थी उसी को जानिब वापस
जाती है। आप लोगों के साथ इतना तआल्लुक उसने पैदा कर दिया था,
वह अब रखना नहीं चाहता, तुम लोगों को क्या-क्या लिखकर समझाऊँ।
मुझमें ना इतनी काबिलियत है ना मैं अलिमेदीन हूँ कि मजहबी बातें
लिखूँ या आहादीस या आयत लिखूँ। हाँ, बस इतना ही जानता हूँ और
इतना ही लिखना चाहता हूँ कि सब फानी है और फना होना है। सब
मरेंगे ना कोई रहा है और ना कोई रहेगा, तो बस वही खुदा बन्द कुद्दूस
ही रहेगा, जिसने दुनिया रची हैं। हम लोग खुदा को मानते हैं और
मुनावये जनाबेरसूल करीम है अगर दावा सही है तो बस -
166